kali dopahar
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

रामराज और अशरफी देवी पढ़े-लिखे नहीं थे। रामराज गाँव में ही मज़दूरी किया करता था। उसको कभी कोई मिस्त्री दिहाड़ी पर ले जाता, तो कुछ रुपए हाथ में आ जाते थे। अशरफी देवी सारा दिन घर का काम करती थी। उन्होंने एक गाय भी बांध रखी थी। अशरफी गाय के लिए जंगल से चारा और चूल्हे में आग जलाने के लिए सूखी लकड़ियाँ बीन कर लाती थी। गाय भी बस इतना ही दूध देती कि सभी के मुँह नहीं लग पाता था। फसल के समय खेतों में काम मिल जाता तो कुछ महीनों का अनाज घर में पड़ जाता था।

गरीबों के पास मनोरंजन के कोई साधन तो होते नहीं। ना ही हर समय कोई कामधाम होता। ज्यादातर समय खाली रहने के कारण पति-पत्नी को आपस में ही मनोरंजन सूझता है। इसी मनोरंजन के चक्कर में रामराज और अशरफी के गृहस्थी जीवन में जल्दी-जल्दी दो लड़कियाँ हो गयी थी। दो लड़कियाँ होने के कारण अब उन्हें अपने वंश चलाने की चिन्ता हो रही थी और इसी चक्कर में लड़के की उम्मीद बांध कर एक ओर प्रयास किया। रिश्ते में चाची लगने वाली गाँव की ही एक बुजुर्ग औरत ने अशरफी को इस बार भ्रूण जांच करवाने की सलाह दी, अरी अशरफी! दो छौरियाँ तो हो चुकी हैं। शहर जाकर अपनी जांच करवा आ, कहीं अबकी बार भी छोरी ही न हो? अगर छोरी हुई तो सफाई करवा आना। क्यों खामखाह छोरियों की लाइन लगानी।

अशरफी, अरी ताई तू कह तो सही रही है। पर हम गरीबों के पास तो पेट भरने लायक भोजन ही मुश्किल से मिल पाता है। अब पेट की जाँच करवाने के रुपए कहाँ से लाएँ?

ताई, तू एक बार मन तो बना, रुपयों का जुगाड़ तो मैं करवा दूंगी।

अशरफी, ना ताई, ना। तू तो रुपयों का बन्दोबस्त कर देगी। लेकिन मैं इस लिंग जांच जैसे पाप कर्म के लिए कर्जा कभी नहीं लूँगी। कहते हैं कर्जा कब्र के साथ ही जाता है।

ताई, देख ले अशरफी मैं तो तुम्हारे भले के लिए कह रही थी। कहीं अबकी बार भी लड़की हो गयी तो खामखाह तुम्हारे गरीब परिवार पर बोझ बढ़ जाएगा।

अशरफी, ताई तू भी तो लड़की ही थी, क्या तू अपने परिवार पर बोझ थी?

अशरफी की यह बात सुनकर ताई सकपका गई। उसे कोई जवाब देते नहीं बन रहा था। उसने अशरफी से आगे इस बारे में बात न करने में ही भलाई समझी।

इधर कुदरत ने उनके लिए कुछ ओर ही लिख रखा था। इस बार भी उन्हें लड़की ही हुई। वंश चलाने के चक्कर में वह बार-बार प्रयास करते और हर प्रयास में सन्तान रूप में उन्हें लड़की ही मिलती। जिसका परिणाम था कि लगातार सात लड़कियों का भरापूरा कुनबा उनका हो गया। वह लड़कियों के नाम रखते-रखते भी थक चुके थे। जब सातवीं सन्तान भी लड़की ही हुई, तो उन्होंने भगवान से मनुहार की कि भगवान अब बहुत हो चुका अब तो लड़कियाँ देना बन्द कर।

उन्होंने अपनी सातवीं लड़की का नाम भतेरी रखा। भतेरी बहुत खूबसूरत थी। उसके चेहरे पर एक अलग ही नूर था।

लड़कियाँ पैदा करते-करते अशरफी भी थक चुकी थी। वह अब और सन्तान नहीं चाहती थी। परन्तु एक लड़के की चाह दिल में कहीं न कहीं दबी हुई थी। उन्होंने एक ओर प्रयास करने का निश्चय किया। इस बार भगवान ने उनकी सुन ली। लड़का होने के कारण दोनों प्रफुल्लित हो रहे थे। साथ में काम करने के लिए एक कमाऊ पूत आ गया। घर की मुंडेर पर थाली बजा कर गाँव भर में ये खुशख़बरी दी गई थी। लाला की दुकान से उधार में लाकर बताशे बाँटे गए। औरतों ने मंगल गीत गाए। साहूकार से कर्ज के थोड़े से रुपए लेकर रामराज ने अपने साथियों को हाथ की निकाली हुई शराब पिलाई। क्योंकि उसने भी अपने साथियों की खुशियों में शराब पी थी, अब अपनी खुशी में भी तो पिला कर उनकी शराब का कर्ज बराबर करना था। फिर इतने दिनों बाद वे छोटी-छोटी खुशियों की तलाश में रहते हैं। लाला या साहूकार से कर्जा उठा कर भी इन खुशियों का जश्न मनाते हैं।

भतेरी के बाद लड़का पैदा हुआ तो माँ-बाप को वह सबसे प्यारी लगने लगी थी। उसे भी थोड़ा सा दुलार मिलने लगा। इस लड़के का नाम उन्होंने बड़े प्यार से ‘रामदिया’ रखा।

एक गरीब मज़दूर के परिवार में इतने सारे बच्चे होने के कारण हर वक्त हर मूलभूत वस्तु, लत्ता-कपड़ा, खाना आदि, का अभाव ही बना रहता था। पूरा परिवार मिलकर फसल के समय खेत में मजदूरी करके साल भर का अनाज जुटा लेता था। अभी गाँव में आपसी सौहार्द बना हुआ था, तो सुबह रोटियों के साथ घूंटने के लिए छाछ पड़ोस से मिल जाती थी। शाम को कभी किसी के घर से तो कभी किसी के घर से एक कटोरी सब्जी का जुगाड़ हो जाता था। इसी एक कटोरी सब्जी से सभी रोटियाँ खा लेते थे। कभी-कभार मौका लगता तो खेतों से हरा शाक तोड़ कर लाया जाता। उस दिन सभी भूख से ज्यादा खा लेते। गाँव में किसी की शादी होती तो न्यौता आया हो या न आया हो बच्चे मौका लगाकर खाने पर हाथ साफ कर आते थे। इन्हीं शादी ब्याहों में मिठाई खाने को मिल जाती और आँख बचा कर अपनी माँ के लिए भी ले आते थे।

घर में कमाई के नाम पर कुछ भी नहीं था। ऊपर से दस जन खाने वाले। अभावों में ही परिवार का गुजर-बसर हो रहा था। एक लड़के की चाह में इसके माता-पिता ने अपनी आर्थिक हालात स्वयं ही खराब कर लिए थे। आर्थिक हालात ठीक न होने के कारण ही उन्होंने किसी भी लड़की को स्कूल में दाखिल नहीं करवाया था। उलटे जैसे ही कोई लड़की थोड़ी सी बड़ी होती माता-पिता उसे मज़दूरी के काम पर लगा देते।

गरीब माँ-बाप की बेटियाँ समय से कुछ पहले ही बड़ी हो जाती हैं। कहीं ऊँच-नीच न हो जाए इसी डर के चलते उनकी शादी जल्दी कर दी जाती है। भले ही उसके लिए इन्हें साहूकार से कर्जा ही क्यों न लेना पड़े। बार-बार कर्ज़ा लेने से बचने के लिए एक ही मंडप में दो-तीन लड़कियों की शादी कर दी जाती है। जब इनकी बड़ी लड़की 16 वर्ष की हुई तो उसकी शादी कर दी गयी। शादी का खर्चा बचाने के चक्कर में उसी खर्चे में उससे छोटी दो लड़कियों को भी लपेट दिया गया। जिसमें एक की आयु 14 वर्ष तथा दूसरी की आयु महज 12 वर्ष थी। कहते हैं हर आदमी अपना भाग्य अलग से लिखवा कर लाता है। अशरफी और रामराज के घर में अभावों भरी जिन्दगी जीने को मजबूर इन तीनों लड़कियों को अच्छा ससुराल मिला।

कुछ दिन बाद गाँव में आंगनबाड़ी खुली। आंगनबाड़ी वाली बहनजी मुहल्ले के सभी छोटे बच्चों को सुबह इकट्ठा करती और अपने साथ ले जाती। वहाँ बच्चों को पौष्टिक खाना तो मिलता ही साथ ही उन्हें थोड़ा अक्षर ज्ञान भी मिल जाता। आंगनबाड़ी जाने का एक लाभ यह हुआ कि अब घर में खाने की किल्लत नहीं होती। बच्चे आंगनबाड़ी में ही इतना खाना खा आते कि अक्सर शाम को खाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। एक दिन सुबह अरी अशरफी!… क्या कर रही है?

आओ बहन जी!… क्या करना है?… वही रोज़-रोज़ का चूल्हा-चौका, बर्तन-भांडे… ऐसे ही दिन कट जाना है।

ये तो कोई जिन्दगी न हुई। बस चूल्हे-चौके में ही फंसी रहो।

अब करें भी तो क्या करें? हमें आता ही यह है। अब आपकी तरह पढ़े-लिखे तो हैं नहीं। तो क्या तुम्हारी बेटियाँ भी अपना जीवन ऐसे ही बिताएंगी?… इन्हें कुछ अलग नहीं करना चाहिए।

लड़कियों को तो चूल्हे-चौके ही करने होते हैं, इन्हें कोई क्लेक्टर थोड़े ही बनाएगा। चेहरे पर हल्की सी हंसी ओर दिल में दर्द लिए हुए अशरफी बोली।

क्यों? चूल्हा-चौका सिर्फ लड़कियों की ही जिम्मेदारी थोड़े ही है। तुम्हें मालूम है… शहर में छोटे-छोटे ढाबों से लेकर बड़े-बड़े होटलों में आदमी ही चूल्हा-चौका करते हैं।

हैं… बहन जी!… क्या बात करती हो?

मैं सही कह रही हूँ, अब तुम्हें तो अपने से फुर्सत नहीं जो तुम बाहर की बातों को समझ सको।

अरी बहन जी!… हमें बाहर कौन ले जाए जो हम बाहर का कुछ सीख सकें। जब से ब्याह हुआ है, तब से बस यही चूल्हा-चौका और हर साल बच्चे पैदा करना यही काम रह गया है मेरे जिम्मे तो। बाहर की दुनिया की जानकारी लेने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं होती अशरफी! वह तो शिक्षा से ही मिल जाती है। अब तुम यदि दो अक्षर पढ़ना-लिखना जानती तो तुम्हें अखबार पढ़ना आ जाता, अखबार से देश-दुनिया की सब जानकारी मिल जाती है।

हम गरीबों को कौन पढ़ाएगा बहनजी। यहाँ दो जून की रोटी जुटानी मुश्किल हो जाती है। फिर यह पढ़ाई का खर्चा गले में कौन डाले।

तुम्हें मालूम नहीं। आजकल सरकार पढ़ाई के लिए बहुत सुविधाएँ दे रही हैं। इतना ही नहीं जो बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते हैं उन्हें पढ़ने के लिए मुफ्त में किताबें तो मिलती ही हैं। साथ ही सर्दी की वर्दी, गर्मी की वर्दी, जूते भी मुफ्त मिलते हैं… और सुनो सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को दोपहर में खाना भी मिलता है।

हैं… बहन जी… सच कह रही हो।

हाँ मुझे तुमसे झूठ बोलकर क्या मिलेगा?

हमारे बच्चों को भी खाना मिलेगा स्कूल में?

हाँ… हाँ…

कपड़े-लत्ते, जूते भी मिलेंगे?

हाँ बाबा हाँ, सब मिलेगा, लेकिन उसके लिए तुम्हें इनका दाखिला सरकारी स्कूल में करवाना होगा।

फिर तो मैं अपने रामदिया को स्कूल में जरूर भेजूंगी।

सिर्फ रामदिया को ही क्यों, अपनी सभी बेटियों को भी क्यों नहीं?

अरी ना… बहन जी… ना। लड़कियों को स्कूल ना भेजने के हम।

क्यों ऐसा क्यों कह रही हो तुम।

कुछ ऊँच-नीच हो गया तो। हम तो गाँव में मुँह दिखाने के ना रहेंगे।

स्कूलों में शिक्षा के मन्दिर होते हैं, वहाँ विद्या का दान मिलता है, ऐसा-वैसा कुछ नहीं मिलता।

ना बहन जी… ना लड़की जात तो घर में ही ठीक रहती है, अच्छे से चुल्हा-चौका संभाल ले। उसी में उसके जीवन की गति है।

अरी चुल्हा-चौका भी तो तभी संभाल सकेगी जब दो पैसे की आमदनी होगी। अनपढ़ आदमी को तो कोई मजदूरी भी पूरी नहीं देता।

अशरफी बड़े गौर से आगनबाड़ी वाली बहनजी के मुँह की तरफ देख रही थी।

…और हाँ देख रही हूँ, तुम्हारे जीवन की गति कितनी अच्छी है, तुम तो इस जीवन को जी रही हो तुमसे अच्छी तरह कौन समझ सकता है तुम्हारे जीवन को। क्या यही जीवन अपनी बेटियों को भी देना चाहती हो?

मैं कौन होती हूँ इनको ऐसा जीवन देने वाली, वो तो जैसा ये अपने भाग्य में लिखवा कर लायी हैं, वैसा इनको जीवन जीना है।

अरे दो अक्षर पढ़-लिख लेगी तो कहीं ढंग की मजदूरी मिल जाएगी और पैसों का हिसाब ठीक से लगा सकेगी।

अशरफी को लगा बहनजी ऐसे पीछा नहीं छोड़ने वाली, तो उसने उनसे पीछा छुड़वाने के लिए सहमति देनी ही उचित समझी।

ठीक कह रही हैं बहनजी आप। मैं आज ही इनके बापू से बात करती हूँ।

आंगनबाड़ी वाली बहनजी जाते हुए बोली, तुम्हारी बेटियाँ बहुत होनहार हैं। तुम इन्हें स्कूल में दाखिल करवा दो।

भगवान ने चाहा तो एक दिन तुम्हारा नाम रोशन करेंगी।

अशरफी अपने परिवार की आर्थिक हालत ज्यादा बेहतर जानती थी। लेकिन आंगनबाड़ी वाली बहनजी की स्कूल वर्दी और दोपहर के खाने वाली बातें कुछ-कुछ समझ में आयी। उसने, आज रामराज से इस बारे में सलाह करने की बात कहकर अपना पीछा छुड़वाया। शाम को अशरफी ने रामराज से बच्चों को सरकारी स्कूल भेजने के बारे में चर्चा की।

मैं क्या कहती हूँ कि… बच्चों को स्कूल में भेजने लगें तो कैसा रहे?

बावली हो गयी है क्या… यहाँ अपने खाने के तो लाले पड़े रहते हैं, ना बाबा ना… स्कूल का खर्चा गले नहीं बांध सकते।

अरे कुछ खर्चा नहीं लगने वाला… अपनी आंगनबाड़ी वाली बहनजी कह रही थीं बच्चों को सरकारी स्कूल भेजोंगे तो उन्हें वहां वर्दी मिलेगी और दोपहर को खाना भी मिलेगा।

हूं…, तो ये बात है। ये स्कूल वाला फितूर उस मेम साहब का भरा हुआ है…। अच्छा ये बता इन बच्चों को स्कूल भेज भी दें तो इसमें हमारा क्या फायदा? उल्टे हमारे घर से तो मेहनत करने वाले कम हो जाएंगे।

अजी…, स्कूल में कोई सारा दिन थोड़े ही रहना होता है। सुबह गए, दोपहर को खाना खाया और डंगर-ढोर के वक्त तक वापिस घर आ गए।

रामराज ने ज्यादा बहस करना उचित नहीं समझा और अशरफी के सामने हथियार डाल दिए।

चल ठीक है रामदिया को स्कूल भेजना शुरू कर देंगे।

सिर्फ रामदिया को ही क्यों, लड़कियों को भी स्कूल भेजना है।

नहीं बिलकुल नहीं। स्कूल जाने वाली लड़कियाँ बिगड़ जाती हैं। तुमने देखा नहीं वो सुरते की लड़की कैसे बाल कटवाए हुए मोटी पैंट (जींस) पहने बिना चुन्नी के सारा दिन घूमती फिरती है।

वो सारा दिन नहीं घूमती फिरती। सुबह तैयार होकर शहर के बड़े स्कूल जाती है और शाम को सीधे अपने घर आती है… मुझे तो उसे देख कर अपनी जिन्दगी पर रोना आता है। एक वह है लड़की होकर भी अकेले शहर में आती-जाती है और एक मैं हूँ… सारा दिन घर, जंगल, जोहड़ ही मेरी किस्मत में लिखे हैं।’

हाँ तो… कौन-सी कमी है तुम्हें, सारा दिन काम में लगी रहती हो यह कम है क्या?

यही सब काम है क्या एक औरत के हिस्से में?

अरे नहीं बावली इसके इलावा एक काम और है… रामराज ने अशरफी को अपनी बाहों में खींचने की कोशिश की। अशरफी ने रामराज को झड़कते हुए कहा, तुम्हें तो बस यही एक काम आता है। जब से ब्याह हुआ है तब से हर बरस एक बच्चा जनमने की फैक्टरी बना रखी हूँ। अब तो शर्म भी आती है। वो आंगनबाड़ी वाली बहन जी मुझसे उम्र में बहुत छोटी नहीं है तो बड़ी भी नहीं है। उसको देखो और मुझको देखो उसके सामने बिलकुल बुढ़िया लगने लगी हूँ।

अरी बावली हो गयी है क्या? उसको देख कर अपनी हड्डियाँ तुड़वानी हैं क्या? वह ठहरी पढ़ी-लिखी। खामख्वाह कोई बखेड़ा खड़ा हो जाएगा… तुम्हें याद है… जब दरिया के लड़के ने उसके साथ थोड़ी-सी छेड़खानी करने की कोशिश की थी तो किस तरह सबके सामने गली में उसको थप्पड़ मार दिया था।

यही तो मैं भी कह रही हूँ। बहनजी पढ़ी-लिखी हैं। तभी तो उनमें ऐसी हिम्मत आ गयी। उसने उस मनचले को सबक सिखा दिया। ऐसी हिम्मत हम अनपढ़ औरतें नहीं कर सकतीं।

रामराज को लगा कि अशरफी अब मानने वाली नहीं है। आज उसने जो ठान लिया उसे पूरा करवा कर ही मानेगी। यही सोच कर रामराज रामदिया और भतेरी को स्कूल में दाखिल करवाने पर राजी हो गया। दोनों बच्चों का गाँव के ही प्राइमरी स्कूल में दाखिला करवा दिया गया। अब घर में पढ़ने वाले दो बच्चे थे। समय अपनी गति से गुज़र रहा था।

चन्द्रकलाओं की भाती बढ़ती हुई लड़कियाँ जवान हो रही थीं। 16 साल की उम्र तक आते-आते अन्य तीन लड़कियों की भी शादी कर दी गयी।

गाँव का स्कूल प्राईमरी तक ही था। आगे की पढ़ाई के लिए पड़ोस के गाँव जाना होता था। रामलाल ने लड़की को दूसरे गाँव पढ़ने के लिए न भेजा। अशरफी के माध्यम से भतेरी ने आगे पढ़ने के लिए बहुत जोर लगाया। परन्तु इस बार रामलाल ने साफ मना कर दिया। फिर घर के हालात को देखते हुए अशरफी ने भी हथियार डाल दिए थे। माँ को हार मानते देख और घर के आर्थिक हालातों को देखते हुए भतेरी ने घर के कामकाज में लगाना उचित जाना। वह जल्दी ही घर के कामकाज में निपुण हो गयी थी। लेकिन पढ़ाई में रुचि होने के कारण समय निकाल कर थोड़ा बहुत पढ़-लिख भी लेती थी। स्कूल में न सही घर में ही सही पढ़ाई तो जारी रही। बहनजी के माध्यम से उसे अच्छी-अच्छी किताबें पढ़ने को मिलती रहीं। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी फिर भी रामदिया स्कूल में जाता था।

एक दिन भतेरी चूल्हा जलाने के लिए जंगल से सूखी लकड़ियाँ बीनने गयी हुई थी। जब वह लकड़ियों का गट्ठड़ लेकर घर पहुंची तो घर में पिता जी के साथ चार अजनबी भी बैठे थे। पिताजी की आवाज़ उसके कानों में गूंजी, साहब बहुत मेहनती है हमारी बेटी। घर का सारा काम स्वयं ही संभालती है। बहुत बढ़िया रोटी-टूका तो कर ही लेती है, साथ ही पशुओं की देखभाल भी बहुत अच्छे से करती है। इसकी सेवा के कारण हमारी गाय ने दूध भी ज्यादा देना शुरू कर दिया है।

बाहर की तरफ झांकने की कोशिश करते हुए उनमें से एक, हाँ लड़की तो मेहनती लगती है। नहीं तो आजकल की लड़कियाँ इतना भारी लकड़ियों का गट्ठड़ कभी नहीं लाती।

बस साहब हमारे पास तो लड़की ही धन है इसके अलावा देने को कुछ नहीं है। आप देख ही रहे हैं हमारी गरीबी की हालत। आप चिन्ता न करें रामराज जी हमारे लड़के के साथ इसकी जोड़ी खूब जचेंगी। हमारी बिरादरी में तो क्या सारे गाँव में इसके मुकाबले की कोई बहू नहीं आयी होगी आजतक। हमें लड़की पसंद है। लड़की पसंद है तो कुछ लेन-देन…।

क्या बात करते हो रामराज जी…। हमें कुछ नहीं चाहिए। बस आप बारात का स्वागत बढ़िया कर देना और जो कुछ लेना-देना है वह तो आप अपनी लड़की के लिए करोगे। उसमें हमारा कोई दखल नहीं।

तय समय पर भतेरी की शादी मंगलू के साथ हो गयी। भतेरी बहुत खूबसूरत थी। किसी गरीब के घर ऐसी सुन्दर स्त्री पहली बार ब्याह कर आयी थी। सारे गाँव में उसकी खूबसूरती की चर्चा होने लगी थी। गाँव की औरतों में उसकी मुँह दिखाई करने की लगभग होड़-सी लग गयी थी। पुरुषों में भी उसकी खूबसूरती की कानाफूसी चल रही थी।

शादी के तीन-चार दिन बाद ही उसकी सास ने उसे खेतों से चारा लेने के लिए मुहल्ले की औरतों के साथ भेजना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे मुहल्ले की कई औरतें उसकी सहेली बन गयी थीं। बातों-बातों में उन्होंने उसे गाँव भर के मर्दों के चरित्र के बारे में बता दिया था। कौन-कितना चरित्रवान है और कौन कितना। जमींदारों के खेतों में अकेले जाने का साहस किसी का भी नहीं होता था। गरीब घरों की औरतें चारा लेने समूह में ही जाने पर स्वयं को सुरक्षित समझती थीं। वैसे तो गाँव भर के सभी जमींदार चरित्रवान व व्यवहारिक थे। लेकिन जंगल में अकेली हिरनी देख शिकार करने के गुण उनमें मौजूद थे। इनकी कोशिश रहती थी कि कब कोई गरीब हिरनी अकेली उनके खेत में फंसे और वह उसे अपना बना लें। सभी जमींदारों में सामंजस्य भी खूब था। इनमें से कोई किसी गरीब हिरनी का शिकार कर लेता तो वह उसकी ही सम्पत्ति स्वरूपा हो जाती थी। सभी चरित्रवान थे, अपने शिकार के अतिरिक्त किसी अन्य गरीब हिरनी का शिकार नहीं करते थे। इसलिए गाँव में शांति और आपसी भाईचारा खूब था। गरीबों की बस्तियाँ भी इस शांतिपूर्ण वातावरण में खूब शांति से अपना जीवन व्यतीत करती थीं। क्योंकि हर किसी का किसी न किसी जमींदार के साथ पारिवारिक सेवा-सत्कार का रिश्ता बना हुआ था। कोई, किसी की शिकायत किसी से नहीं करता था। सभी आपसी सामंजस्य के साथ जीवन व्यतीत करते थे। वैसे भी इन शिकारों की कानों कान किसी को खबर नहीं होती थी। जमींदारों का आपसी व्यवहार बड़ा शान्तिपूर्ण और एक दूसरे के कार्य में दखल न देने का था।

कहते हैं शादी के बाद लड़की का दूसरा जन्म होता है। भतेरी को भी लगा शादी के बाद का जीवन कुछ बदलाव लिए हुए आएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। जैसे वह अपने पिता के घर पर सुबह से शाम तक कोल्हू के बैल की भांति घर के काम में जुटी रहती थी, उसी तरह यहाँ ससुराल में भी उसे जुटे रहना पड़ता था। हाँ एक बदलाव जरूर आया था।

पिता के घर उसके काम में कोई दखल नहीं देता था। यहाँ उसे कोई काम ठीक से करने नहीं देता। सुबह ठीक से नींद खुलने से पहले ही सास की कर्कश आवाज़ कानों में पड़ने लगती थी। भतेरी बहुत कोशिश करती कि सास की आवाज़ आने से पहले उठ ले लेकिन मंगलू हर रोज़ उसे देर करवा ही देता था। नींद भी ठीक से पूरी नहीं होती थी।

जोरावर सिंह गाँव में सबसे बड़े जमींदार का बड़ा बेटा था। उसकी पत्नी भी उन्हीं की तरह एक बड़े जमींदार, जिनका परिवार राजनीतिक रसूख भी रखता था, की पढ़ी-लिखी खूबसूरत लड़की थी। उनकी शादी को तीन बरस बीत चुके थे। लेकिन कोई संतान नहीं थी। जोरावर सिंह ने भी भतेरी की खूबसूरती की बहुत तारीफ सुन रखी थी। वह भी भतेरी की खूबसूरती को देखने के प्रयत्न में रहता था।

आज सुबह उठने में ‘भतेरी’ को देर हो गयी थी। वह जल्दी-जल्दी घर का सारा काम निपटा रही थी। क्योंकि इसके बाद खेतों से पशुओं की लिए चारा और शाम को चूल्हा जलाने के लिए जंगल से लकड़ियाँ बीन कर लानी थीं। साथ ही उसे डर लग रहा था कि कहीं मुहल्ले की औरतें उसे छोड़ कर खेत में न चली जाएं। वैसे तो घर का काम बहुत ज्यादा भी नहीं था, फिर भी आज न जाने क्यों उसका बदन हरारत में था। घर का काम था कि निपटने का नाम ही नहीं ले रहा था और सूरज अपनी निर्बाध गति से अपने मार्ग पर अग्रसर था। काम निपटा कर भतेरी ने दराती और गठड़ी बांधने के लिए कपड़ा उठाया और खेत की तरफ रुख किया। अभी आधे रास्ते ही पहुंची थी कि सामने से मुहल्ले की औरतें सिर पर चारे की गठरी उठाए वापस आ रही थीं, जब वह सभी नजदीक पहुंची तो- ‘अरी… भतेरी! तू आज इतनी देर से कैसे आ रही है’?

क्या बताऊँ छोटू की माँ!… सुबह आँख ही नहीं खुली। फिर घर का सारा काम तो मुझे ही करना पड़ता है।

मेरी सास तो सुबह लाठी उठा कर निकल जाती है। फिर उसका शाम तक पता नहीं चलता कहाँ बैठती है, कहाँ खाती है?

हाँ बहन यह बात तो है, सास तेरी ही क्या हमारी भी ऐसी ही है। फिर तेरी भी गलती नहीं अभी नई-नई शादी हुई है, तो सुबह रामप्रसाद भी नहीं उठने देता होगा? छोटू की माँ ने उसे छेड़ते हुए कहा।

ना… ना… ऐसा कुछ नहीं है। शरमाते हुए भतेरी बोली।

अच्छा हम चलती हैं। सिर पर बोझ रखा है, इसे घर तक भी पहुँचाना है। तू भी जरा जल्दी आना सूरज बिलकुल सिर पर चढ़ता आ रहा है।

ठीक है तुम चलो, मैं भी अभी जल्दी-जल्दी घास काट लाती हूँ। उसके बाद मुझे तो साँझ को लकड़ियाँ भी बीन कर लानी हैं।

ठीक है! जल्दी आना, और हाँ लकड़ियाँ लेने जाए तब मुझे बुलाना मत भूलना। हमारी भी लकड़ियाँ खत्म होने को हैं।

जरूर बुलाऊंगी, जैसे आज सुबह तुमने मुझे बुलाया था। सभी खिलखिला कर हंस पड़ी।

अन्य औरतों ने गाँव की राह पकड़ी और भतेरी ने खेतों की राह। खेतों तक पहुँचते-पहुँचते सूरज अपने शिखर पर पहुँच चुका था। भतेरी ने एक खेत की मेढ़ पर जल्दी-जल्दी घास काटनी शुरू की। घास काटती-काटती वह खेत के थोड़ा अन्दर तक चली गयी। अभी उसने लगभग आधा गठड़ी ही घास काटी थी। अचानक पीछे से दो मजबूत हाथों ने उसके कंधों को पकड़ लिया। अचानक हुई इस घटना से वह भय के कारण पसीने-पसीने हो गयी। उसने पलट कर देखा तो जमींदार जोरावर सिंह उसके सिर पर खड़ा था। जोरावर सिंह को देख कर वह घबराहट से काँपने लगी। भतेरी चीखना चाहती थी, लेकिन उसकी आवाज हलक में ही अटक कर रह गयी। उसकी दरांती भी छटक कर उससे दूर जा गिरी। उसने स्वयं को जोरावर की पकड़ से छुड़वाने का पुरजोर प्रयास किया, परन्तु जोरावर सिंह की पकड़ और भी मजबूत होती चली गयी। इस रस्साकशी में काटी गयी सारी घास ज़मीन पर बिखर गयी थी। जोरावर ने भतेरी को उसी घास पर पटक लिया।

जोरावर की पकड़ से छूटने के लिए भतेरी ने एक बार फिर से अपनी भरपूर ताकत लगाई। परन्तु वह सफल नहीं हो सकी।

वह उस हिरनी की तरह तड़प कर रह गयी जिसकी गर्दन को शेर ने अपने मजबूत जबड़े में पकड़ लिया हो। एक तो भतेरी को जोरावर ने अपने बलिष्ठ शरीर के नीचे दबा रखा ऊपर से सूरज की चमकीली धूप के कारण उसकी आँखें में पड़ती चमक उस पर दोहरी मार कर रही थी। वह छटपटा रही थी कि काम-पिपासु पुरुष की सहायता यह प्रकृति भी कर रही है। उसकी आँखें खुलने की नाकाम कोशिश कर रही थी लेकिन सूरज था कि अपनी चमक बिखेरने के चक्कर में उसके लिए काली दोपहर परोस रहा था। जोरावर सिर्फ अपने शिकार को मजबूती से पकड़े हुए था। वह चाहता था शिकार अपनी भरपूर ताकत का इस्तेमाल पहले ही कर ले ताकि बाद में वह आराम से उसका भोग कर सके। जोरावर की पकड़ से छुटने की जद्दोजहद में भतेरी का शरीर थक कर चूर-चूर हो गया। उसका हलक सूखने लगा तो उसने पकड़ से मुक्त होने के अपने प्रयास छोड़ कर जोरावर को समर्पण कर दिया। अब जोरावर अपने शिकार का आनन्द ले रहा था। उधर भतेरी के ज़हन में तूफान उठ रहा था, कैसे एक ब्याहता पुरुष अपनी पत्नी के होते हुए किसी पराई स्त्री को भोगने के लिए लालायित हो उठता है? कैसे उसे समाज की परवाह नहीं होती? क्यों उसे भगवान से डर नहीं लगता?

शिकार को भोगने के बाद जोरावर अपनी कपड़ों को ठीक कर मूँछों पर ताव देते हुए, तू अब आराम से घास काट सकती है। मैंने अपने खेत से घास काटने का परमिट दे दिया है। मेरे खेतों में बेफिक्र आया-जाया कर। आज के बाद तुझे कोई आँख उठाकर देखेगा भी नहीं।

भतेरी के मुँह से कोई शब्द नहीं निकले। वह आत्मग्लानि से भरी हुई थी। उसे किसी असहाय जानवर की भांति रौंदा गया था। जोरावर चला गया। जोरावर के जाने के बाद भी भतेरी बिखरी घास पर अस्त-व्यस्त पड़ी रही। वह चाह कर भी उठ नहीं पा रही थी। उसकी आँखों के आगे अंधेरा सा छाया जा रहा था। कुछ देर बाद संभल कर उठी, अपने कपड़ों को ठीक किया। उसका शरीर और दिमाग आपसी तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे। कदम भी साथ नहीं दे रहे थे। फिर भी किसी तरह खड़े होकर लड़खड़ाते कदमों से वह खेत से बाहर की तरफ निकली। खेत से बाहर आकर खेत के साथ-साथ बह रहे नाले के पानी से अपना मुँह धोया और चुल्लू भर पानी पिया। अचानक उसे ध्यान आया कि वह किस काम से आयी थी। उसके शरीर में से बिजली का करंट सा गुज़र गया। वह खेत के अन्दर गयी बिखरी हुई सारी घास समेट कर गठरी बांधी और बड़े प्रयास के बाद सिर पर उठा सकी। वह बड़ी मुश्किल से अपने कदम उठा पा रही थी। उस पर सूरज अपनी गर्मी से सब कुछ झुलसा देने पर उतारू था। उसका हलक अब भी सूखा जा रहा था।

खेतों से बाहर की तरफ ट्यूब्वैल की होद और कोठड़ा बना हुआ था। भतेरी का दिल तो बहुत था पानी पीने का परन्तु उसे दूर ट्यूब्वैल के हौद पर बैठा जोरावर दिखाई दे रहा था, जो वहाँ बैठा अब भी अपनी मूँछों पर ताव दे रहा था।

भतेरी ने अपनी राह बदल ली। वह किसी तरह घर पहुँच ही गयी।

घर पहुँच कर उसने गठरी एक तरफ पटक दी और अन्दर जाकर औंधे मुँह चारपाई पर जा गिरी। उसके दिमाग में अब एक अलग ही तूफान उठा जा रहा था। खेत वाली घटना किसी ने देखी तो नहीं? कहीं जोरावर इस घटना को गाँव भर में उड़ा तो नहीं देगा? कहीं उड़ते-उड़ते यह घटना उसके घर वालों तक पहुँच गयी तो क्या होगा? उसके दिमाग में ऐसे ही अनेकों प्रश्न उठ रहे थे, जिनका जवाब उसे स्वयं ही देना था। वह इस विचार में खोयी हुई थी कि क्या इस घटना को अपने पति व घर वालों को बता दे? और बताए भी तो क्या बताए? उसका यकीन करेगा कौन? यदि किसी ने इसका कुछ अलग ही अर्थ लगा लिया तो क्या होगा? इन प्रश्नों के वज्रपात से उसे छुटकारा नहीं मिल रहा था। बार-बार स्वयं ही प्रश्न खड़े कर उनका समाधान खोजने के प्रयास में न जाने उसे कब नींद आ गयी।

साँझ के पाँच बज चुके थे। बाहर से भतेरी की सास ने बाहर से ही आवाज लगाई।

अरी सोती ही रहेगी क्या?… भतेरी का कोई जवाब नहीं।

…साँझ हो गई है, न तूने पशुओं को चारा डाला। देख सारा घर बिखरा पड़ा है… वह बड़बड़ाती हुई घर के अन्दर चली आयी।

…अब उठ भी ले। बिलकुल घोड़े बेच कर सो रही है। सारा घर खुला पड़ा है। कोई चोर-चुकेरा कुछ उठाकर ले जाता तो?… भतेरी ने अपनी आँखें खोलने का प्रयास किया। उसकी सास बिलकुल उसे पास आ पहुँची, उसके कपड़ों की हालत देख कर उसने प्रश्न किया।

…ये तेरे कपड़े गंदे कैसे हो गए?

क… कुछ नहीं। व… वो… वो खेत में मेरा पैर फिसल गया था तो गिर गयी। उसके चेहरे के भाव और शब्द मेल नहीं खा रहे थे।

ओ हो, तो आते ही बदले क्यों नहीं? इतना आलस भी अच्छा नहीं। पता नहीं इतनी आलसी बहू मेरे ही लड़के के माथे क्यों मढ़ी गयी?

भतेरी चारपाई से उठी और शीघ्रता से बाथरूम में जा घुसी। सास के कटुवचनों से बचने का उसे अपने बचाव का यही एक रास्ता नज़र आया था। बाथरूम का तो नाम ही था बस। चार फुट ऊँची दिवारे खड़ी कर रखी थीं। जिसके सामने चारपाई को खड़ा कर रखा था। उस जगह पर ढंग से बैठा भी नहीं जा सकता था। फिर घर की ये औरतें तो उसमें नहाती थी। कपड़े टांगने की भी जगह ठीक से नहीं थी। कपड़े भी दिवार पर ही रखने पड़ते थे। एक गरीब का महल ऐसा ही होता है। मोहल्ले के दूसरे घरों से तो फिर भी ये थोड़ा-सा ठीक था। इधर भतेरी अपने बदन से मैल उतार रही थी उधर उसकी सास अपनी जुबान का मैल फैला रही थी।

भतेरी नहा कर निकली और घर के काम-काज में जुट गयी। लेकिन उसके मस्तिष्क में द्वन्द्व छिड़ा हुआ था। वह मंगलू को आज दिन वाली घटना बताए या न बताए। बता देगी तो क्या होगा? नहीं बताएगी तो वह स्वयं घुट-घुट कर जियेगी। इसी उधेड़-बुन में उसने घर का सारा काम निपटा दिया। सास-ससुर को खाना खिला दिया। गाय के लिए भी शाम का चारा डाल आयी। अब तो उसे मंगलू के आने का इंतजार था। वैसे तो मंगलू हमेशा जल्दी ही घर आ जाता है। लेकिन आज न जाने उसे क्यों इतनी देर हो गयी है। आज ही भतेरी को उसके साथ की ज्यादा आवश्यकता महसूस हो रही थी और आज ही वह देर कर रहा है। इंतजार करते-करते उसे झपकी भी आने लगी थी। तभी उसे आँगन में किसी के लड़खड़ाने की आहट महसूस हुई। बाहर निकल कर देखा तो वह मंगलू ही था। उसने पास जाकर मंगलू को संभाला। मंगलू के मुँह से शराब की दुर्गंध आ रही थी। तुमने शराब पी है?

अरे पगली नहीं। मैंने शराब नहीं पी है, मुझे तो पिलाई गयी है।

भतेरी मंगलू को संभाल कर अन्दर ले गयी और चारपाई पर लिटा दिया। उसे डर था कहीं सास-ससुर को पता चल गया तो खामख्वाह रात में हंगामा खड़ा हो जाएगा। मंगलू की इस हालत को देख कर भतेरी अपने साथ हुई घटना को भूल सी गयी। अब उसे मंगलू की चिंता सता रही थी। आज से पहले उसने कभी भी मंगलू को शराब पिये हुए नहीं देखा था।

तुम्हें किसने पिलाई?

तुम नहीं जानती। बड़ा ही अच्छा आदमी है। हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहता है। उसका कोई नाम भी तो होगा?

आज वह बहुत खुश था। उसने मुझे देखा तो अपने साथ अपने पास बैठाया। बहुत जोर दिया मुझे शराब पीने की लिए। वह बोला आज मेरे मन की मुराद पुरी हुई है। मेरी खुशी में तुम भी शामिल हो। उसने बताया यह शराब सबसे बढ़िया वाली शराब है। साथ में खाने के लिए मुर्गा भी बनवा रखा था।’

तुमने मुर्गा खाया…?

न… न… मैंने मुर्गा नहीं खाया। नमकीन काजू भी थे। मैंने तो सारे काजू खा लिए।

अच्छा तो तुम वहाँ काजू खा रहे थे। तुम्हें ध्यान नहीं था, मैं यहाँ तुम्हारे लिए भूखी बैठी होगी?

अच्छा… तुम अभी तक भूखी हो?… चलो तुम भी चलो तुम्हें भी काजू खिला लाता हूँ।

मुझे नहीं जाना कहीं। तुम चुपचाप लेट जाओ।

अच्छा तुम नहीं जाओगी?… लेकिन तुम भूखी हो… मैं तुम्हें भी काजू खिला कर लाता हूँ।…

मुझे नहीं खाने काजू-वाजू। मेरे लिए तो मेरे घर की रूखी-सूखी रोटी ही काजू से ज्यादा अच्छी है। किसी के काजू खा कर अहसान नहीं लेना।

अरे इसमें अहसान कैसा? फिर जोरावर ने कोई अहसान नहीं किया है वह तो आज उसकी कोई मुराद पूरी हुई थी। उसी की खुशी में दारू की दावत दे रहा था।…

जोरावर का नाम सुन कर भतेरी सन्न रह गयी। उसका बदन अचानक पसीने से तर हो गया। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। इधर मंगलू बड़बड़ाए जा रहा था।

…बड़ा ही अच्छा आदमी है जोरावर। इतना बड़ा जमींदार होकर भी जरा-सा भी घमण्ड नहीं। आज मुझ जैसे गरीब आदमी के साथ भी अपने छोटे भाई की तरह व्यवहार कर रहा था। नहीं तो आज के समय में कौन-किसे इतनी महंगी शराब पिलाता है?…

मंगलू को महसूस हुआ कि भतेरी पसीने से तर-बतर हो रही है। उसका सीना भी जोरों से धड़क रहा है।

…अरे तुम तो बिलकुल पसीने-पसीने हो गयी हो। चलो कपड़े उतार दो। थोड़ा बदन सूख जाएगा।…

और मंगलू बिना किसी देरी के स्वयं ही उसके कपड़े उतारने लगा। भतेरी तो इस समय एक बुत के समान हो गयी थी। उसका जिस्म तो वहाँ मौजूद था परन्तु दिमाग भटक रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि मंगलू उसके कपड़े उतार रहा है लेकिन वह किसी भी प्रकार का प्रतिरोध नहीं कर रही थी। मंगलू अब वैवाहिक सुख भोग रहा था। भतेरी का दिमाग काबू से बाहर हुआ जा रहा था। मंगलू अपने काम में मग्न था और भतेरी सोचे जा रही थी।

यह सब पुरुष एक जैसे क्यों होते हैं। औरत को सिर्फ भोग की वस्तु ही समझते हैं। क्या औरत का अपना कोई वजूद नहीं? अपनी कोई इच्छा नहीं? अपना कोई मान नहीं?… कहाँ तो मैं आज मंगलू के कांधे पर सर रख कर अपने दुःख को भुलाना चाह रही थी। कहाँ यह उसी आदमी के साथ बैठ कर शराब पीकर आ रहा है जिसने मेरे सम्मान को रौंद डाला था। यह उसी आदमी के गुण गा रहा है जिसने इसकी पत्नी के साथ दुराचार किया है। अब इसको क्या बताऊँ जिस आदमी की शराब पीकर उसकी शराब के गुण गा रहा है वह उस शराब की कीमत से कहीं ज्यादा तो आज खेत में वसूल कर चुका है।… उसकी आँखों पर पानी उभर आया ओर अपनी सीमा लांघ कर एक तरफ लुढ़क गया।

…इसे आज खेत वाली घटना के बारे में बताऊँगी तो भी यह यकीन नहीं करेगा। हो सकता है उल्टे मुझे ही दोषी ठहराकर मेरे साथ ही दुर्व्यवहार करने लगे। नहीं… नहीं जिस घटना पर पर्दा पड़ा है उस पर पर्दा पड़ा ही रहने देती हूँ। …यह सोचकर भय से भतेरी का जिस्म पीला पड़ गया।

इधर मंगलू अपना काम खत्म कर निढ़ाल हो एक तरफ खर्राटे भरने लगा। मंगलू को खर्राटे भरता देख भतेरी की आँखों से अंगारे बरसने लगे। उसे मंगलू भी किसी वहशी दारिन्दे से कम नज़र नहीं आ रहा था। उसे जोरावर और मंगलू में कोई अन्तर नहीं दिख रहा था। दोनों ही सिर्फ जिस्म के भूखे दिख रहे थे। जिसमें से एक ने सामाजिक मर्यादा को लांघते हुए बलपूर्वक तो दूसरे ने सामाजिक मर्यादा के तहत अधिकार पूर्वक उसकी इच्छा के विरुद्ध उसका मर्दन किया था। भतेरी की आँखों की नींद फ़ाक्ता हो चुकी थी। वह स्वयं अपने वजूद को टटोल रही थी। क्या वह सिर्फ एक भोग की वस्तु मात्र है? उसकी स्वयं की इच्छा-अनिच्छा का कोई महत्त्व नहीं है? क्या किसी भी पुरुष को उसका मान-मर्दन करने का खुला अधिकार है? इसी उधेड़-बुन में न जाने कब सुबह हो गयी। उसके कानों में सास के कर्कश स्वर पड़े।

अरी महारानी!… क्या राजा के घर की बेटी है? सूरज सिर पर चढ़ आया है। घर का काम-काज कुछ करना है या नहीं?

भतेरी जल्दी से उठी, सास के किसी भी सवाल का जवाब दिए बिना ही अपने सारे काम निपटाने में लग गयी।

वह घर के काम-काज तो निपटा रही थी। लेकिन कल वाली घटना उसके मन-मस्तिष्क में घूमे जा रही थी। निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी। अभी वह काम निपटा ही रही थी कि मोहल्ले के औरतें उसे चारा लाने के लिए बुलाने आ पहुंची।

उसने उनको यह कह कर मना कर दिया कि कल वह कुछ ज्यादा ही चारा ले आयी थी। उन औरतों के जाने के बाद घरेलू काम-धंधा निपटाते-निपटाते उसने एक निर्णय लिया।

…नहीं, नहीं मैं सिर्फ इस काम के लिए नहीं बनी हूँ। जिस तरह मेरी माँ सिर्फ बच्चे पैदा करने की मशीन बन कर रह गयी और उनकी परवरिश के चक्कर में स्वयं को ही भूल गयी। अपने लिए तो उसने शायद कोई एक पल जिया हो। मुझे अपने जीवन में कुछ करना है। उसके लिए चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े। मैं इस तरह के नर्क भरे जीवन को जीवनभर नहीं जीने वाली।

उसने जल्दी-जल्दी सारे काम निपटा लिए और नहा-धोकर गाँव के विद्यालय की अध्यापिका जी से मिलने जा पहुँची। उनको अपना परिचय देते हुए कहा, बहन जी! मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ। आप मेरी मदद करें।

अध्यापिका- तुम्हारे बात करने के ढंग से तो लगता है तुम पढ़ी-लिखी हो।

भतेरी- जी थोड़ा-बहुत पढ़-लिख लेती हूँ। आठवीं तक अपने गाँव के स्कूल में पढ़ी भी थी। लेकिन उससे आगे पढ़ने के लिए दूर दूसरे गाँव जाना पड़ता इसलिए पिताजी ने मेरी पढ़ाई छुड़वा दी और शादी कर दी। लेकिन मुझे बहुत पढ़ना है दसवीं, बारहवीं, बी.ए. … बहुत-बहुत पढ़ना है।

अध्यापिका- शादी के बाद औरत का स्कूल, कॉलेज में जाकर पढ़ना बड़ा मुश्किल होता है। ससुराल वाले पढ़ने की इजाजत तो दे देते हैं लेकिन पढ़ने की आज़ादी नहीं देते। सास-ससुर, पति सबकी सेवा करते हुए शिक्षा ग्रहण करना बड़ा कठिन कार्य होता है।

भतेरी- मैं सब बाधाओं से टकराने के लिए तैयार हूँ। मैं चूल्हे-चौके, घर-गृहस्थी में दूसरे की मोहताज होकर घुट-घुट कर अपनी जिन्दगी समाप्त नहीं करना चाहती। मैं इन सबके साथ-साथ एक स्वाभिमानी जीवन जीना चाहती हूँ।

अध्यापिका- बहुत खूब। यह तुम्हारा दृढ़ निश्चय है?

भतेरी- जी!… इस पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था में अपना एक अलग मुकाम हासिल करना है मुझे। अगर मुझे सही मार्गदर्शन मिलता है तो इसके लिए हर कुर्बानी करने को तैयार हूँ।

अध्यापिका- तुम्हारे हौसले को देखकर मुझमें भी एक नया संचार हुआ है। मैं भी प्रण करती हूँ तुम्हारे जैसी हौसले वाली महिला को अपने जीवन के रहते किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आने दूंगी। सरकार भी तुम्हारे जैसे होनहार विद्यार्थियों के लिए पत्राचार से पढ़ाई करने की सुविधा उपलब्ध करवाती है। मैंने भी शादी के बाद ही अपनी उच्च शिक्षा पत्राचार के माध्यम से पूरी की थी। …भतेरी की आँखों में चमक आ गयी और भीतर से एक अलग ही साहस का संचार अनुभूत हुआ।

…तुम मेरे सम्पर्क में रहना। जब भी पत्राचार के फार्म भरे जाएंगे मैं तुम्हारे फार्म भरवा दूंगी।… कुछ पुस्तकें भतेरी को देते हुए …फिलहाल पढ़ने के लिए ये कुछ पुस्तकें ले जाओ। वहीं अटक जाओ तो मुझसे आकर समझ लेना।

भतेरी ने पुस्तकें लेकर अपने सीने से लगा लीं। अध्यापिका जी के रूप में उसे अपनी सशक्त व नेक दिल मार्गदर्शिका मिल गयी थी। इन पलों को जीकर वह आत्मविभोर हो रही थी। उसकी पलकों पर खुशी के दो मोती उभर आए थे लेकिन वह उनको गिरने नहीं देना चाहती थी, इसलिए उन्हें अपने पल्लू में लपेट लिया और अध्यापिका जी की चरण धूली लेने के लिए झुकने लगी तो अध्यापिका जी ने उसे गले से लगा लिया। गले से लगते ही उसे महसूस हुआ कि जो सूरज कल उसकी आँखों में अपनी चमक चुभोकर उसे अंधकार में धकेल गया था, उस पर से आज सम्बल सी छाँव के बादल आकर सुकून दे रहे हैं।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’