hundred dates
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Hindi Love Story: यायावरी का चसका ज़िंदगी उम्दा कर देता है। पहाड़ियों से जिसे लगाव हो, उसे रह-रहकर पहाड़ों की फ़रियाद बेचैन करती है।

बात उन दिनों की है जब मैं कॉलेज स्टूडेन्ट हुआ करता था। किसी अलगाववादी साँझ, अचानक तय किया कि, ट्रैकिंग पर ‘हर की दून’ चला जाए। ट्रेन मुझे बनारस से देहरादून की लेनी थी। थ्री ए.सी. की काउंटर वेटिंग टिकट पर जाना तय किया। लगभग 24 घंटो का सफ़र था जो एक सुबह से दूसरी सुबह तक चलना था। अपनी मस्ती और बैकपैक लिए, हंटर शू की फ़ीलिंग्स से लबालब मुझ जैसे को कभी-कभी परेशानियों में ज़ायका आता है।

बनारस से लखनऊ तक के सफ़र के बारे में तो मुझे कुछ याद नहीं, पर शाम पाँच के आसपास ट्रेन जब लखनऊ से छूटने वाली थी, मुझ जैसे ही वेटिंग टिकट की मारी एक ख़ूबसूरत हसीना, मेरी उस ख़ूबसूरत शाम और सफ़र की साथी हो गई; जो ट्रेन के गेट पर बैठकर की जानी थी। मामूली पहचान और बग़ैर इंडियन रेलवे को गाली-गलौच दिए हम अपनी दुनिया में थे; जहाँ उसने मुझे मेरे हंटर शू देखकर मुझे सेना का कोई ट्रेनी वैगरह समझा, जो देहरादून जा रहा हो।

तुलिका ने मुझे बताया कि, वह देहरादून की रहने वाली है और लखनऊ में मॉस कम्यूनिकेशन और जर्नलिज़्म की स्टूडेन्ट है। जैसे-जैसे रैन गहराने लगी, हमारी आँखें भी निंदयाने लगीं। मैंने आसपास के डिब्बों में घूम कर देखा; एक स्लीपर कोच मिला, जिसमें दरवाजों के पास अपेक्षाकृत अधिक जगह थी। मैं और वह अख़बार की चादर बिछाकर, वहाँ बैठे देर रात तक दुनिया जहान की पॉजिटिव बातें करते रहे; जो औपचारिकताओं से भरी हुई थीं। जैसे उसका कोर्स और मेरी ट्रैकिंग। नींद से बोझिल हुए मैंने उससे कहा कि, मैं जाग नहीं पाऊँगा और वहीं फ़र्श पर अख़बार और भी फैलाते हुए लेट गया। तुलिका मेरे बगल में एक लड़के के साथ होने की हिचकिचाहट लिए ऊँध रही थी।

सुबह शायद हरिद्वार स्टेशन पर मेरी आँख खुली। मैंने देखा वह मेरे बगल में, मेरी ही रंगत लिए बेसुध सोयी पड़ी थी। अब बहुत सी सीटें खाली हो चुकी थीं। मैंने उसे उठाया और हम पास की ही साइड लोवर में बैठ गए। मैंने चाय के दो कप लिए और एक उसकी ओर बढ़ा दिया। उसके चेहरे पर शायद अब तक नींद और उस झिझक को भुला बैठने की हया थी, जिसने उसे सोने पर मजबूर कर दिया था।

हरिद्वार से देहरादून तक की एक घंटे की सुबह, उसने अपने परिवार के बारे में मुझसे सब साझा किया और घर चलने के लिए न्यौता भी दे दिया। मैंने उसे बताया कि, मुझे मसूरी बेस कैंप में आज रिपोर्ट करना है, वापसी में उसके घर ज़रूर आऊँगा। मुझे याद है, उसकी हथेलियाँ देखते हुए मैंने ज्योतिष पर पढ़ी कुछ किताबों का भरपूर फ़ायदा उठाया और अपने पहले के हिमालयन ट्रेकिंग के थोड़े बढ़े-चढ़े एडवेंचर के किस्सों से उसके सामने ख़ुद को ज़िन्दा दिल पेश किया।

ना चाहते हुए भी देहरादून स्टेशन का आना तय था। उसकी कार और ड्राइवर उसे लेने आए हुए थे। उसने मुझे मसूरी की एक टैक्सी तक पहुँचाया और हम, तब तक टैक्सी के पीछे खड़े अनजान रिश्ते निभाते रहे, जब तक टैक्सी वाले ने चलने के लिए नहीं कहा। इतने दिनों बाद कोई शब्द, शब्दशः याद है तो वह है “बॉय तुलिका।” मैंने या उसने ना एक दूसरे का नम्बर माँगा, ना पता।

परवरदिगार! नावाक़िफ़ नातेदारियों का सुकून और इश्क़ उस हयात को भी रंग क्यों नहीं देता, जिसकी शिनाख़्त फ़क़त ताक़त और लहू की सुर्ख़ी है।