सन् 1936, बापू वर्धा से सेवाग्राम चले गये थे। वहीं आसपास के ग्रामीणों से उन्होंने सम्पर्क करना प्रारम्भ कर दिया। उन लोगों को सफाई का महत्व बताते और नियमित रूप से उस क्षेत्र में सफाई का कार्य भी स्वयं करते। कभी गलियों में झाडू लगाते तो कभी मैले कुचौले नौनिहालों को स्नान कराते और गन्दे कपड़े धोते।
सप्ताह दो सप्ताह की कौन कहे वहाँ बापू को महीनों निकल गये, पर चिकने घड़ो पर जैसे कोई असर ही नही, वहाँ के ग्रामीणों की प्रवृत्ति में कोई खास अन्तर दिखाई न दे रहा था। एक दिन एक कार्यकर्ता अवसर देखकर बापू से पूछ ही बैठा- ‘बापू! आपको इन व्यक्तियों की सेवा करते महीनों बीत गये पर कोई परिणाम दिखाई नहीं देता। मुझे तो यहाँ के लोग पूरे गंवार ही दिखाई देते हैं। यह अज्ञानी अपने स्वभाव को तनिक भी बदलने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।
“बस इतने में ही धैर्य खो दिया आपने। अरे भाई! जिस ग्रामीण जनता की हम शताब्दियों से उपेक्षा करते आ रहे हैं उनकी निस्वार्थ भाव से सेवा कुछ वर्षाे तक तो करनी ही चाहिए” आपको बड़े धैर्य से काम लेना होगा। देश इसी प्रकार प्रगति-पथ पर अग्रसर होता है। समाज के नवनिर्माण में किसी चमत्कार की आशा नहीं करनी चाहिए। आज स्वच्छता के प्रति इनके मन में उपेक्षा का भाव भले ही हो पर एक दिन अवश्य ऐसा आयेगा, जब स्वच्छ रहना इनके जीवन का एक अंग बन जायेगा। “बापू ने मुस्वफ़ुराते हुए कहा।”
ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं– Indradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)
