एक राजा को अध्ययन का बहुत शौक था, लेकिन राजकाज की व्यस्तता के कारण वह पढ़ाई के लिए ज्यादा वक्त नहीं निकाल पाता था। धीरे-धीरे वह अधेड़ हो गया। एक दिन उसने अपने मंत्री को बुलाकर कहा कि वह अध्ययन करना चाहता है, लेकिन बढ़ती उम्र के कारण यह संभव प्रतीत नहीं होता। मंत्री ने कहा कि तब तो आपको दीपक बन जाना चाहिए। राजा को लगा कि मंत्री उसका उपहास कर रहा है। उसने जब नाराजगी जाहिर की तो मंत्री ने स्पष्ट किया कि वह मजाक नहीं कर रहा। उसने राजा को समझाया कि यदि कोई युवावस्था में अध्ययन में रुचि लेता है तो उसका भविष्य सुबह के सूरज की तरह होता है, यदि वह
अधेड़ावस्था में रुचि लेता है तो उसका भविष्य दीपक की ज्योति जैसा होता है। यदि कोई सूरज न बन पाया हो तो उसका दीपक बनना भी अच्छा है। क्योंकि घने अंधेरे में भटकने से थोड़ा प्रकाश भी बेहतर होता है।
सारः अच्छे कार्य के आरंभ के लिए कोई आयु कम या अधिक नहीं होती।
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