गृहलक्ष्मी फरवरी २०१६
अनाड़ी जी! आजकल ई-बुक्स का शोर है, इसके क्या फायदे हैं?
दिव्या कौशिक
बीकानेर (राजस्थान)
पंडित अपने ज्ञान का, चले न पोथा ढोय।
फटने का झंझट नहीं, पल में शेयर होय।
ई-बुक लेनी है अगर, टाइप कर दो नाम।
कुछ मिल जाएं मुफ्त में, कुछ के आधे दाम।
पर्यावरण सुधार में, योगदान प्रत्यक्ष।
कागज़ के निर्माण को, कटें न लाखों वृक्ष।
नहीं बनें अल्मारियां, नहीं चाहिए रैक।
बुक कम्पयूटर में रखो, सुलभ रहेगा ट्रैक।
जगह घेरती ही नहीं, रखो हज़ारों पास।

पैकिंग, लोडिंग, पोस्ट सब, बन जाएं इतिहास।

प्रौढ़ावस्था में पहुंचने पर गर्लफ्रेंड, बॉयफ्रेंड बनाने वाले व इस पाश्चात्य शैली को अपनाने वाले प्रेमी-युगलों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
नेहा
मयूर विहार फेज-1, दिल्ली
प्रेम का उम्र से कोई नाता नहीं है,
उन्हें धिक्कार है
जिन्हें प्रेम करना आता नहीं है।
लेकिन अगर प्रेम में कोई हेर-फेर है,
तो उनके लिए मेरा एक शेर है…
‘आती नहीं है उनके जीवन में कोई बाधा
राधा ही रुक्मिणी हो और रुक्मिणी ही राधा।
प्रेम आंत देखता है न दांत,
अवस्था देखता है न जात-पांत।
संभ्रांत, शिष्ट, शालीन और
समर्पित रहना उसकी डगर है,
कोई हजऱ् नहीं है
किसी भी उम्र में अगर है।
मां, प्रियतमा और पत्नी में क्या अंतर है?
भारती अमन पटोल
वलसाड, (गुजरात)
कहा जाता है कि
मां सिर पर हाथ फिराती है तो
बाल बढ़ जाते हैं
पत्नी फिराती है तो
हाफ हो जाते हैं,
मैं इसमें जोड़ता हूं कि
पत्नी के बाद प्रेमिका फिराती है तो
साफ हो जाते हैं।
पर मैं ऐसा
अंदर से नहीं मानता,
हर घर की अलग स्थितियां हैं
जिन्हें मैं नहीं जानता।

अनाड़ी जी, ऐसा क्यों कहा जाता है कि बॉस हमेशा सही होता है? घरेलू महिलाओं का बॉस तो उनका पति ही होता है।

दीप्ति वर्मा
गाजियाबाद (उ.प्र.)
दफ्तर का बॉस
बिना बात रौब झाड़ता है,
क्रोध में कागज़ फाड़ता है।
होता है थोड़ा सा झक्की,
पर चाहता है संस्थान की तरक्की।
वह आधा गलत आधा सही होता है,
पर घरेलू महिलाओं का पति तो
कभी सही नहीं होता है।
यह भी भ्रम है कि पति बॉस है,
बॉस तो पत्नियां होती हैं
जैसे ऑमलेट के ऊपर सॉस है।
पत्नियां अण्डे का अनिष्ट करती हैं,
लेकिन भोजन को स्वादिष्ट करती हैं।

पति अपनी पत्नी से हर छोटी-छोटी बात पर नाराज़ क्यों हो जाते हैं?
भावना शर्मा
मयूर विहार फेज-1, दिल्ली
अनाड़ी प्राय: इस बात पर शोध करता है,
कि पति घर में अपनी पत्नी की
छोटी-छोटी बातों पर
क्यों क्रोध करता है।
शोध का परिणाम ये कहता है कि
पति बाहरी समाज का क्रोध
और ताने-तिश्ने निरीह बनकर सहता है।

घर आकर अपना गुबार निकालता है,
जैसे गमों की धरती से छोटे-छोटे
अंडमान नीकोबार निकालता है।
अब तो स्त्री-पुरुष दोनों
काम पर जाते हैं,
इसलिए सोच-समझ कर गुस्साते हैं।

अनाड़ी जी, भारत में लड़के और लड़कियों में बचपन से इतना भेदभाव क्यों किया जाता है?
रानू
गाजियाबाद (उ.प्र.)
हमारी प्राचीन संस्कृति का
मूलभाव है वेदभाव,
उसने अगर कुछ अच्छा किया है
तो ये भी दिया है.. भेदभाव।
लड़कियों को दान की वस्तु मान कर
पराए घर भेजा,
इसलिए घर की निगरानी में
हर तरह सहेजा।
लेकिन अब बदल रहा है ज़माना,
अनाड़ी ने तो दोनों को बराबर माना।