इधर उसके सभी रेखाचित्रों का विषय नाभि था। मगर कोई भी चित्र दूसरे से मेल नहीं खाता था। एक ही चीज की तस्वीरों में इतनी विविधता लाना ही उसकी विशेषता थी। नाभि, यानी उसका चित्रण कोई आसान बात नहीं है। इसका महत्व तब बढ़ता है, जब हम इस बात पर ध्यान देते हैं कि अभी तक किसी ने भी नाभि को प्रधान विषय के रूप में नहीं लिया है। आम लोग अगर नाभि की तस्वीर खींचने लगे तो वह कुछ और ही बन जाती है। मगर यह चित्रकार जो भी तस्वीर खींचता, सब के सब नाभि बन जाते थे। सब तरह के माध्यमों का वह इस्तेमाल करता था-जलवर्ण, तैल, आक्रिलिक, पेंसिल, चाॅरकाॅल, चूना, स्याही आदि। कभी-कभी माॅडलों का उपयोग करता था तो कभी-कभी सिर्फ यादों से नाभियां सामने आ जाती थीं। कुछ ही दिनों में ऐसी सैंकड़ों नाभियां उसकी तूलिका से उभरकर आयीं। कभी-कभी उनके प्रदर्शन भी होते थे, जिन्हें कई लोग आकर देखते थे।
एक प्रदर्शनी के दौरान कुछ प्रमुख पत्रकारों को भी आंमत्रित किया गया था। उनमें महिलाएं भी थीं। वे गैलरी में एक बार घूमकर आयीं और उन्होंने कलाकार से इंटरव्यू लेने के लिए कलम पैड हाथ में लिया। वे बाद में वहां बैठी जहां उनके लिए उपयुक्त कुर्सियां डालीं गयीं थीं। कलाकार उनके सामने बैठ गया। उसके चेहरे पर दाढ़ी थी, जिसे उसने कई दिनों से नहीं बनाया था। सिर के बाल भी झुरमुट के समान थे। लगता था, कोई अफ्रीका वाला हो।
आंखें ऐसी थीं कि तेल के खत्म होते जलते दीप हों, संक्षेप में ऐसा लगाता था कि उसके हाथ से जो चित्र निकलते थे, उनमें और उसमें कोई रिश्ता ही नहीं है। किसी ने उसे लाकर बैठा दिया हो, जो अस्वस्थ हो, इसी भाव से उसने अखबारवालों की ओर देखा। वे तुरंत चालू हो गए, कई तरह के सवाल दागे गये।
‘‘इस नाभि की थीम आपको किस प्रकार सूझी?” उसे पता था कि इस प्रकार के सवाल पूछे जाएंगे, मगर जब यह सवाल सीधा आया तो उसे जवाब देने में कठिनाई हुई। उसने कहा, ‘‘शायद” और सामने वाले उसकी आगे की बात का इंतजार करने लगे, उन्हें कोई जल्दी नहीं थी, ऐसा लगा।
नाभि, द अंबिलिकल काॅर्ड, जैविकता का संकेत? कोई उसकी मदद के लिए आया।
‘शायद, तुम्हारी माता’
‘फ्रायड।”
कलाकार ने उसका चेहरा देखा। युवती, जिसने फ्राॅयड का नाम लिया था, उससे सकारात्मक उत्तर की अपेक्षा कर रही थी।
‘‘मां मेरी नाभि गुदगुदाया करती थी और मुझे हंसाती थी। मुझे नहलाकर कपड़े से पोंछते वक्त… मगर वह अब नहीं है…….
‘‘इस नाभि का ऑबसेशन शायद तभी से शुरू हुआ है न?
‘‘ऑबसेशन तो नहीं है…….”
‘‘आपको इन्सान के और अंग क्यों नहीं भाये?
‘‘ऐसी बात तो नहीं है…?
‘‘चेहरा, आॅंख, नाक, कान आदि।”
दीर्घ मौन। लग रहा था कि वह अपनी अंगुलियों का अध्ययन कर रहा है, अंगुलियों को खोलता, फिर बंद करता।
‘‘क्या आप माॅडलों का इस्तेमाल करते हैं?”
‘‘कभी -कभी।”
‘‘स्त्री या पुरुषों के? क्या फर्क है”
इसके लिए भी उसके पास सही उत्तर नहीं था। उसने कहा कि यह समय की बात है, मगर उस व्यक्ति को जिसने सवाल किया था, खुशी नहीं हुई। समय और इसका क्या संबंध है पूछना पड़ा। ‘किसी से प्यार किया है? फिर सवाल आया। लगा कि कलाकार घबरा गया है, उसने अपनी दृष्टि उपर की और मौन हो गया। बहुत बड़ी चिंता में डूब गया, ऐसा लगा। ऐसे और सवाल आये। मगर किसी के लिए उससे सही जवाब नहीं आया। और साक्षात्कार तो शोरगुल में खत्म हो गया।
अगले दिन कुछ अखबारों में इस प्रर्दशनी का समाचार छपा था। एक अखबार में कलाकार के ‘इंडिपस कौम्पेक्स’ पर जोर देकर खबर छपी थी तो दूसरे में कलाकार की माता के बारे में लंबा समाचार छपा था। तीसरे अखबार में नाभि के बारे में कलाकार के मन में जो रोचक विचार थे, उसका वर्णन किया गया था।
कुछ में कलाकार के फोटो छपे थे। कुछ एक में वह जैसा था, उससे भी घिनौना लगता था। एक अखबार में तो उसका पूरा फोटो काली स्याही से भरा पड़ा था। एक और अखबार में उसका साक्षात्कार छपा था, मगर उसके लिए तो उसने साक्षात्कार ही नहीं दिया था।
एक दिन उस पर सरकार की ओर से मुकदमा दायर किया गया। उस पर आरोप था कि वह अश्लील और कामोत्तेजक तस्वीरों को बनाकर बेच रहा है। उसके स्टूडियों नामक कोठरी में जो कुछ भी था, उसे पुलिस वाले ले गये। कलाकार ने तर्क दिया कि नाभि तस्वीर में कामोत्तेजक चीज क्या है?
मगर कोई भी लाभ नहीं हुआ। सरकारी वकील ने कामसूत्र से लेकर अब तक के कामोत्तेजक विषयों से संबंधित देश-विदेश के ग्रंथों के उदाहरण देकर समझाया कि कामकला में नाभि ने किस प्रकार सदा प्रधान भूमिका निभायी है और उसका वर्णन मन की चाह लेने जैसे था। ‘‘माई लाॅर्ड!
इतना ही नहीं है और अगर इतना ही था तो इस सम्मानननीय न्यायालय का अमूल्य समय सरकार नहीं लेती। यहां पर नाभि के नाम पर जो व जिसकी तस्वीर खींची जा रही है, वह अंग दूसरा ही है, माई लाॅर्ड। उसका मैं यहां पर उल्लेख करने के लिए भी शरमा रहा हूं। कला के नाम पर यहां दूसरा ही व्यापार चल रहा है। यह कलाकार ही जिसने इन तस्वीरों को खींचा है, एक अखबार के साक्षात्कार में गूढ़ बातों के बारें में बताया है। इसके कतरनों को न्यायालयों के सामने हाजिर किया गया है…………….”
सरकारी वकील का तर्क इतना असरदार था कि उसके आगे बचाव पक्ष को हाथ बांधकर बैठ जाना पड़ा। कलाकार पहले ही कम बोलने वाला था और वह न्यायलय में पूर्णरूप् से खामोश रह गया। न्यायालय ने फैंसला सुनाया कि कलाकार को भविष्य में ऐसे चित्र नहीं खींचने चाहिए और अब तक खींचे गये सारे चित्रों को इकट्ठा करके उनको नष्ट किया जाए। उसने यह भी कहा कि इसी में सार्वजनिक हित निहित है। आदेश भी दिया गया कि सार्वजनिक हित के आगे किसी भी कला को सर झुकाना पड़ता है।
उसने कहा ‘‘न्यायालय कलाकार के ऑबसेशन का अर्थ निकालता है। वह माता के बारे में है या प्रेयसी के बारे में, इसमें द्वंद प्रतीत होता है। कलाकार हमेशा सोचता हुआ उनके विविध अंगों का चित्र खींचना चाहे तो इस बारें में न्यायलय या सरकार क्या कर सकती है। हम इतना ही कह सकते हैं कि उस प्रकार के चित्रों को आमजनों के लिए बेचना नहीं चाहिए कोई यह भी नहीं समझे कि यह सृजनशीलता का हनन है। सृजनशीलता सिर्फ नाभि में नही हैं या सरकार जो कहती है उसमें ही नहीं है। जब इन बातों की सीमा पार की जाती है, वहीं सृजनशीलता है।
श्री रविन्द्रनाथ ठाकुर, श्रीअरविदों, श्री रवि वर्मा आदि ने कर दिखाया है कि यह कैसे संभव है। हमें आश्चर्य हो रहा है कि आज के कलाकारों का ये आदर्श क्यों नहीं हुए। इस मामले के संबंध में इससे और ज्यादा कहने की आवश्यकता नहीं है।”
बाद में कलाकार को अपनी जगह बदलनी पड़ी। उसकी कला की विषयवस्तु भी बदल गयी। अब वह मूक जानवरों की तस्वीरें खींचने लगा। गालियों में खुराक के लिए भटकने वाले सुअर, कुत्ते और बकरी जैसे जानवर, घूमती गायें और भैंसों के पास जाता और उनकी संरचना और गुणों का अध्ययन करता। वे कभी-कभी अपने ही या अन्य जानवरों के साथ लड़ते थे। ऐसे दृश्य भी उसके केनवासों पर उभर आये।
एक दिन कलाकार ने देखा कि पुलिस स्टेशन के सामने गरमी में तीन चार गधों का झुंड खामोश खड़ा है। उनमें कोई हलचल नहीं थी। वे ऐसे खड़े थे, मानो तपस्या कर रहे हों। इस दृश्य ने उसे बरबस खींचा । उसने सोचा कि भविष्य में इन्हीं तस्वीरों को खींचेगा। उनकी आंखों में भी काफी धुंधलापन था।
