भतीजी की शादी थी। हम सब लोग शादी में गए हुए थे। मेरे दूसरे नंबर वाले जीजाजी बहुत ही बातूनी हैं। भाभी शादी के काम में व्यस्त थी। मैंने दीदी से कहा कि भाभी दूसरा काम कर रही हैं। अत: आप नाश्ता बना लें, मैं कमरा साफ कर लेती हूं। दीदी ने कहा, ‘ठीक है। मैं धीरे-धीरे कमरा साफ कर रही थी कि इतने में जीजाजी कमरे में आए, मुझे कमरा साफ करते देख कर बोले, ‘अरे साली जी, यह क्या कर रही हैं। तुम्हारा तो हाथ दर्द कर रहा है। तुम्हारी दीदी कर लेगी। मैंने कहा, ‘नहीं नहीं, झाडू-पोंछा तो हो गया है। चादर की सिलवटें ठीक कर रही हूं। जीजाजी बोले, ‘मैं कुछ मदद कर दूं। यह तुम्हारे अकेले के बस की बात नहीं है। मैंने कहा, ‘ठीक है, कर दीजिए मदद, लेकिन जरा जल्दी करना। वह बोले, ‘ठीक है। कह कर मंद-मंद मुस्कुराने लगे। तभी मेरे पतिदेव अंदर आ गए। बोले, ‘साली जीजा में सवेरे-सवेरे क्या गपशप हो रही है। जीजाजी बड़ी मासूमियत से बोले, ‘अरे भाई साहब! साली जी, सिलवटें निकालने को कह रही थी, और ठहाका लगा कर हंस पड़े, साथ में पतिदेव भी जोरों से हंस पड़े। जब मुझे अपनी कही बात का अर्थ समझ में आया तो चेहरा शर्म से लाल हो गया और मैं किचन की तरफ भाग गई। कमरे में फिर दोनों का मिला-जुला ठहाका गूंज उठा।

 

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