सर्द सुबह की लम्बी सड़क कोहरे से लिपटी थी…सुबह 9:30 बजे भी धुन्ध ने अपना आंचल नहीं समेटा था… ऋचा का स्कूटर धुंध को चीरते हुए लम्बी सड़क पर चल रहा था… चश्मे पर जमी धुंध की कणिकाएं रास्ते को और धुंधला बना रही थी… काश! कार की तरह चश्मे पर भी वाइपर लगे होते… कल्पना करके ऋचा की हंसी छूट गई। वैसे भी ऋचा की खूबसूरत कल्पनाएं इस स्कूटर के सफर पर खूब चलती हैं। पूरे 30 मिनट का रास्ता इन कल्पनाओं के सहारे कैसे कट जाता है, पता ही नहीं चलता…।
कमबख्त जब से शहर में विकास के नाम यह पुल निर्माण का काम चला है, पुल के इस पार वाले लोगों का तो वाहन ही चलाना दूभर हो गया है। हर दिन रास्ता बदलने के फेर में ऑटो रिक्शा वालों ने आना जाना ही बंद कर दिया।
लम्बी सड़क पर पैदल चलने वाला ऑटो के लिए पीछे मुड़-मुड़ कर देखते-देखते बनते हुए पुल के खम्बों पर सर्पाकार उस पार हो ही जाता।
ऋचा जानती है कि लम्बी सड़क पर चलने वाला 4 किमी की दूरी तक तो सीधा ही जाएगा। बस अपना स्कूटर उस पैदल यात्री के सामने रोक लेती है, ‘कहां जाओगे बहनजी? बैठो ना स्कूटर पर मुझे जाना है उस तरफ अपनी कॉलोनी से पुल पार के 4 किमी के रास्ते में एक अस्पताल, एक कॉलेज एक फैक्ट्री और एक स्कूल तक जाते लोग जाते मिलते हैं।
ऋचा के मन में क्या है कोई नहीं जानता। पर ऋचा खुद तो जानती है कि उसके स्कूटर ने तो 10 किमी चलना ही है तो चाहे कोई पीछे बैठे या ना बैठे, क्या फर्क पड़ता है। वो किसी के काम आए तो उसे अच्छा ही लगता है। पर ऋचा तेरी ये मानव सेवा कहीं उलटी ना पड़ जाए। जमाना खराब है। मालूम है यह भी ऋचा को। लेकिन वो इतनी एहतियात बरतती है, बावजूद इसके वो अपने स्कूटर के पीछे किसी सवारी को बैठा ही लेती है। एहतियात में वो केवल महिला सवारी को ही स्थान देती है उस पर भी बच्चों और लड़कियों को बिल्कुल नहीं… ऋचा बताने से पहली ही हंस पड़ती है। अरे बच्चों को बैठा लिया तो लोग पीछे हो लेंगे कि बच्चा भगा कर ले जा रही है और लड़कियों के आगे स्कूटर रोक दो तो कई सवाल करेंगी वो…कौन हो? आप हमें जानती हो आण्टी?… नहीं… तो हमें क्यों बैठा रही हो?… या बिल्कुल मना कर देंगी। हो सकता है उन्होंने अपने ब्वाय फ्रैण्ड को इस लम्बी सड़क पर आने का वादा किया हो। फिर से हंस देती है ऋचा…।
सबसे ज्यादा उसे दुआ देती हैं अस्पताल जाने वाली महिलाएं जिनका एक-एक कदम भारी हो रहा होता है। वह या तो स्वयं बीमार होती हैं या अपने किसी प्रियजन को मिलने जा रही होती हैं जिनकी सेवा में उन्हें दिन में चैन होता है ना रात में।
ऐसी ही एक सर्द सुबह में वो एक-एक कदम रखते हुए चल रही थी। सर्द हवा जब बदन को काटकर चल रही थी तब उसके पांवों में चप्पल भी ठीक से पहनी हुई नहीं थी। उसकी एड़ी घिसी हुई चप्पल से बाहर आ रही थी। बदन पर पतली सी शॉल उसकी सर्दी ढकने का महज स्वांग कर रही थी। हाथ में गन्दला सा थैला जिसमें ग्वारपाठे की दो फांके झांक रही थी। ऋचा ने अपना स्कूटर उसके आगे रोक दिया। उसने एक क्षण को ऋचा की तरफ देखा तो ऋचा बोली, ‘कहां जाओगे बाइ-सा?
‘बस यहीं इमली फाटक तक वो नहीं जानती थी कि उसका यह जरा-सा इशारा 2-3 किमी तक का है।
ऋचा अब और एहतियात नहीं बरतती कि उसकी महंगी चप्पल देखी या महंगे शॉल देखे या नफीज़ एसेसरीज़ पर ध्यान दे। उसका ध्येय तो सवारी को मंजि़ल तक पहुंचाना होता है। ‘आप कहां नौकरी करते हो? उसने बैठते ही ऋचा पर सवाल दागा था। चेहरे पर हेल्मेट की कसी बेल्ट में ऋचा की हंसी ने बेल्ट को खिंचाव दिया था। गनीमत है कि उसकी बिन्दास हँसी ने खटाक से खोल नहीं दिया।
‘यहीं सरकारी दफ्तर में… ‘ऋचा ने आधा मुंह पीछे घुमाते हुए कहा था।
‘मैं तो यही फैक्ट्री में काम करती हूं, बोरियां सिलती हूं… ‘ऋचा के बिना पूछे ही उसने बता दिया था।
‘चार पैसे आ जाते हैं… गुजारा चल ही जाता है… उसका रेडियो फुल स्पीड पर था। ऋचा को मजा आ रहा था। वो मुड़-मुड़ कर अपना कान पास करने की कोशिश करती, फिर हवाओं में घुलती उसकी आवाज को अपने कानों में खींचने का प्रयास करती। उसका स्कूटर फर्राटे से चल रहा था कि पीछे से आवाज हवा में घुली- …’बस-बस मेम साहब… आ गया फाटक ऋचा ने तेजी से ब्रेक लगाए तो वो उतरी। ऋचा ने मुड़कर देखा तो ढलकी हुई शॉल से ऋचा की पैनी नजर ने झांक ही लिया कि  उसका घिसा हुआ कुर्ता अपनी अंतिम सांस के साथ उसकी पीठ को ढके रखने का प्रयास कर रहा था।

‘अरे! मैंने तो नाम भी नहीं पूछा ऋचा ने स्कूटर चलाते हुए खुद को ही धौल जमाई।
फिर ना जाने कितने ही दिन बीत गए, ऋचा को वो सवारी नहीं मिली। ना सही! ऋचा के पास सवारी की कोई कमी थोड़े ही है… मानो वो टैक्सी-ड्राइवर हो और उसका सरोकार किराए से हो…ऋचा फिर अपने उसी अन्दाज़ में हंस पड़ी।
एक दिन ऋचा को दूर से वही जानी पहचानी पीठ दिखाई दी… वही खसर-खसर चलने का अन्दाज़… वही थैला… ऋचा ने स्कूटर रोका तो वो बड़े ठसके से वो बैठ गई। मानो उसका अधिकार हो। ऋचा ने आज उसका नाम पूछना नहीं भूला क्या नाम है तुम्हारा?
यास्मीन, ओह! यानि हज से सम्बन्धित… बेहद पवित्र…मन ही मन ऋचा बुदबुदाई… तो इतने दिन कहां थी… यास्मीन बोली, ‘आज गुरुवार है ना तो 1 घण्टा जल्दी छुट्टी हो जाती है इसलिए आप मिल गए उसने हिसाब समझाया। ऋचा को याद आया कि पिछली बार यास्मीन मिली थी तब गुरुवार ही तो था। तो इसका मतलब हर दिन इसका समय मेल नहीं खाता मेरे समय के साथ। ‘यास्मीन कितने बच्चे हैं तुम्हारे?
‘तीन… एक बेटी ब्याह दी और दो बेटे हैं। बड़ा 12वीं में छोटा 8वीं में
‘पति क्या करते हैं?
‘वो खुली मजदूरी करते हैं आज ऋचा ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी।
‘ओह! लो फाटक आ गया यास्मीन ने ऋचा के प्रश्नों पर जैसे विराम लगा दिया।
ऋचा ने ब्रेक लगाया तो यास्मीन ने उतर कर स्कूटर का स्टेप समेटने लगी। ‘आपको तकलीफ दी ना मेम साहब!
 
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‘नहीं…नहीं ऐसी कोई बात नहीं है ऋचा मानों प्रसन्न थी। ऋचा को भले ही और सवारियां मिलती रहती पर यास्मीन के साथ का मजा कुछ और ही था। उसे गुरुवार की महत्ता समझ आ गई थी। हर गुरुवार को पीले और सफेद चन्दन की महक से ज्यादा उसे यास्मीन से आती जूट की बोरियों की महक का इंतजार रहता। हर बार लगभग गणेश मन्दिर के मोड़ पर ऋचा का स्कूटर यास्मीन के सामने हाजिर हो जाता और यास्मीन उचकते हुए स्कूटर का स्टेप खींच कर बैठ जाती। उस गुरुवार ऋचा ने पूछा था ‘यास्मीन कुछ सूट पड़े हैं लोगी?
‘हां! हां! मेम साब जरूर लूंगी और मेरी बेटी के लिए भी… ऋचा को लगा कि उसका प्रश्न गलत तो नहीं था। उसे जरूरत है। अगले गुरुवार से पहले ही ऋचा ने स्कूटर की डिक्की में दो सूट और दो गाउन रख लिए थे।
वह गुरुवार… यास्मीन की पीठ… यास्मीन का स्कूटर पर बैठना और ऋचा का चहकना जारी

था। इमली फाटक पर जब ऋचा का स्कूटर रुका तो डिक्की से निकाल कर कपड़ों की थैली पकड़ाई तो उसकी आंखों में चमक थी।
दो गुरुवार निकल गए, यास्मीन दिखी नहीं तो चिंता होना स्वाभाविक था। इस गुरुवार ठण्ड का दौर खत्म हो चुका था। हवा की चुभन कम होकर सुखद हो गई थी।
दूर से ही यास्मीन की चाल देख कर ऋचा ने स्कूटर की रेस बढ़ा दी थी। यास्मीन के सामने स्कूटर रुकते ही हाज़रा चहक कर बैठी तो ऋचा के कन्धे पर जोर से हाथ रख कर बैठी- ‘चलो मेम साब!
‘अरे कहां थी तुम इतने दिन तक यास्मीन!
‘लड्डू खिलाउंगी मेम साहब! मेरे दोहता हुआ है।’अच्छा!!! ऋचा चहक उठी।
‘एकदम गोरा है, आपकी तरह.. पूरे तीन किलो का, चंचल भी बहुत है, खूब मोटी-मोटी आंखें हैं ऋचा अपनी पीठ पर खुशी के थपेड़े महसूस कर रही थी। ऋचा उसकी किसी बात को रोकना नहीं चाह रही थी। कितनी खुश थी यास्मीन आज। ऋचा को लग रहा था आज वो यास्मीन को लॉग ड्राइव पर ले जाए और स्कूटर रुके ही नहीं, पर ऋचा को तो स्कूटर रोकना ही था… इमली वाला फाटक जो आ गया था।
‘चलो मेम साहब लड्डू खिलाऊं। हाज़रा आग्रह कर बैठी।
‘नहीं ऑफिस को देर हो रही है ऋचा ने कहा और अपना स्कूटर फर्राटे से दौड़ा दिया। आज ऋचा भी बेहद खुश थी यास्मीन की तरह।
फिर हर गुरुवार यास्मीन से मिलना होता ऋचा उसके दोहते की बातें करती। कभी उसके लिए कपड़े लाती तो कभी बिछोने के कपड़े। कभी उसकी बेटी के लिए घी-बादाम देती जैसे उसी के घर में बच्चा हुआ हो।
कितने ही गुरुवार बीत गए और शहर का पुल भी बन गया था। कुछ दिन तो ऋचा का पुल पर से जाना हुआ पर गुरुवार के दिन वो अपने पुराने रास्ते पर उतर आती। वो यास्मीन को मिलने का लोभ संवरण नहीं कर पाती थी। ऋचा की पीठ को सुख के सुखद थपेड़े खाने की आदत हो गई थी।
वो मिलती थी अपनी उसी शैली में… चप्पल घिसती हुई, हाथ में थैला, सिर पर रखा सूती दुपट्टे का एक सिरा पीछे लटकता हुआ, हर गुरुवार का इंतजार रहने लगा था। शायद उसे भी ऋचा का इंतजार रहता था क्योंकि मैंने उस सड़क पर मुड़-मुड़ कर पीछे देखते हुए कई बार देखा था।
समय हमेशा एक सा नहीं रहता। समय की मिट्टी से कभी टिब्बा तो कभी पहाड़ बनता दिखाई देता है।
किसी गुरुवार को ऋचा छुट्टी पर रह गई और किसी गुरुवार को वो नहीं मिली तो यादों की चुनरी पर धूल के कण जमने शुरू हो गए। फिर भी कभी-कभी गुरुवार को उसकी याद की हूक मन में उठती थी, लम्बी सड़क पर अब गुरुवार को कोई नहीं मिलता था। वैसे भी पुल बनने की वजह से सबने अपना रास्ता बदल लिया था।
एक गुरुवार, दो गुरुवार, तीन गुरुवार, पूरे आठ गुरुवार बीत गए थे। इस सावन में यास्मीन नज़र नहीं आई थी। आज सावन का आखरी गुरुवार था। बादलों की आवाजाही और बूंदों को रोकता आसमान मुझे खतरनाक लग रहा था। ऋचा ने आसमान को शिकायती नजरों से देखा कि अब तो बरस जाने दो बूंदों को… क्यों बांधते हो, धरती प्यासी है, फसलें खड़ी हैं, पानी को तरस रही हैं, स्कूटर स्टार्ट करके गुरुवार की सड़क पकड़ी थी कि दूर से साया दिखाई दिया था। खसर-पसर चप्पलों को घिसता, सूती दुपट्टे का एक छोर हवा से पीछे लहलहाते हुए उसके सिर से उतरने को आतुर था। हाथ में थैला पर ग्वारपाठे की कोई फांक नहीं दिखी। थकी मांदी चाल यास्मीन ही लग रही थी फिर भी पास जाकर स्कूटर रोका तो कुम्हलाया चेहरा दिखाई दिया। ऋचा खुशी से चिल्ला उठी यास्मीन तुम कहां थी, कितने गुरुवार निकाल दिए, क्यों नहीं आई, मुझे तुम्हारा घर भी नहीं मालूम था, मैं सड़कों पर तुम्हें ढूंढ़ती रही।
ऋचा थी कि आज रुक ही नहीं रही थी, उसकी इस बातचीत में कब यास्मीन स्कूटर पर बैठी और कब स्कूटर फर्र-फर्र चल पड़ा किसी को मालूम ही नहीं चला। ऋचा फिर चहक उठी- ‘बोलो ना यास्मीन! चुप क्यों हो?
मेम साहब ‘मेरा पति खत्म हो गया पिछले महीने उसके बाद के शब्द सन्नाटे में बदल गए।
ऋचा का हाथ रेस से हट कर ब्रेक पर चला गया था।
‘कैसे यास्मीन? ऋचा ने रुक कर पीछे मुड़ते हुए यास्मीन का चेहरा देखने की कोशिश की तो आंखों की ओट में नमी थी।
‘उन्हें क्या हुआ यास्मीन?
‘पता नहीं मेम साहब! रात को सोया तो सुबह उठा ही नहीं। दिल का दौरा पड़ा था शायद? ऋचा को लगा वो स्कूटर को रोक ले और यास्मीन से लिपट कर रो ले। यास्मीन की बातचीत रुआंसी हो गई थी।
‘अब कैसे गुजारुंगी जिन्दगी उनके बिना।
उसका फाटक आ गया था। ऋचा को स्कूटर रोकना पड़ा। यास्मीन उतरी तो आज ऋचा ने उसका चेहरा पहली बार निहारा था। उसके कन्धे पर हाथ रख कर बोली- ‘शाम को मिलती हूं तुम्हारे घर पर यास्मीन ने दूर बस्ती में हरे रंग की दीवार वाले मकान की तरफ मौन इशारा किया था।
ऋचा को ऑफिस जाने भी तो जल्दी थी। उसने स्कूटर को रेस दी।
उसकी आंखों से दो बूंद आंसू ढुलक कर हवा मे नमी बन कर तैर गए थे। आज ऋचा की पीठ आंसुओं से तरबतर थी। 
 
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