जब मैं अधिक न पढ़ सका तो मैंने अपने पुश्तैनी धंधे को ही चलाने में भलाई समझी। स्वयं जेवर बनाने शुरू किए तो धंधा ठीक-ठाक चलने लगा। फिर भी मन में यह बात कचोटती रहती कि पढ़ाई कर अफसर न बन सका। अत: मन ही मन निश्चित किया कि अपने बेटे को पढ़ा-लिखा कर अफसर अवश्य बनाऊंगा।

बेटा अभी छोटा ही था फिर भी मैं उसे थोड़ा-बहुत पढ़ा देता। असर यह हुआ कि कि जब उसका दाखिला कराया तो अध्यापक ने कहा कि आपका बेटा तो हीरा है। यह सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई। धीरे-धीरे यही बात पड़ोसी एवं रिश्तेदार भी कहने लगे, क्योंकि बेटा कक्षा में प्रथम श्रेणी लाता। अब तो मुझे भी लगने लगा कि मेरा बेटा हीरा ही नहीं, पूरा हीरों का हार है। शायद पांचवी पास करने के बाद ही यह घटना है। एक दिन बेटा, मेरी दुकान पर आया। जब मैंने उसके आने का कारण पूछा तो उसने बताया कि मम्मी ने खाना भेजा है। हां, उस दिन रविवार था। कुछ देर वह दुकान पर बैठ गया।

पता नहीं क्यों, पर मैंने उसे कुछ नहीं कहा। शाम को हम दोनों साथ-साथ घर गए। उसके बाद पत्नी लगभग हर रविवार उसे खाना देकर दुकान भेज देती। हो सकता है, उसे स्वयं यह अच्छा लगता हो। एक दिन मेरा सहायक छुट्टी पर था मैंने उससे चांदी का कुछ जेवर उठवाया। उसने बड़ी खुशी से उठा दिया। उस दिन से वह हर रविवार 2-3 घंटे मेरे सहायक का काम करने लगा।

पता नहीं क्यों, उसमें अब कुछ बदलाव नजर आने लगा था। वह अधिक से अधिक दुकान पर बैठने की चेष्ठा करता। वैसे मैं उसे 2-3 घंटे रविवार को ही बैठने देता, परंतु उसका परिणाम उसके परीक्षाफल के रूप में नजर आया। बेटा प्रथम दस में भी नहीं था। हीरों के हार में शायद एक ही हीरा बचा था। मैंने उसे समझाया, डांटा भी परंतु कोई खास असर नहीं हुआ। अब मैंने उसके लिए ट्यूशन की भी व्यवस्था कर दी। फिर भी वह 2-3 घंटे रविवार एवं छुट्टी के दिन मेरा सहायक बना रहता। मैंने उसे इसके लिए मना नहीं किया।

आठवीं परीक्षा का जब रिजल्ट आया तो स्पष्ट था कि मेरा हीरों का हार सोने का भी नहीं रह गया था। अब वह घर में भी मुझसे सोने-चांदी के भाव मालूम करता, जेवर बनाने में सहायता कर देता। बताने की आवश्यकता नहीं कि उसने कैसे दसवीं एवं बारहवीं की परीक्षा पास की। आगे तो उसने पढऩे से साफ मना कर दिया। वैसे भी पढ़ता भी तो अफसर तो बनने से रहता।

आज वह पूर्ण रूप से मेरा भागीदार है। उसका विवाह भी हो चुका है एवं उसका एक बेटा है। बेटा भी अब पांचवी कक्षा में है। लगता है वह भी चाहता है कि उसका बेटा बड़ा अफसर बने। संयोग से आज उसका बेटा दुकान पर खाना लेकर आया। मुझे पुराना दिन याद आ गया और उत्सुकतावश उसे देखने लगा। उसे देखते ही मेरा बेटा चिल्लाया कि दुकान पर क्यों आया है?

बेटे ने उत्तर दिया कि मम्मी ने खाना भेजा है। मैं हैरान था, बेटे ने उसे खाने सहित तुरंत घर वापस भेज दिया और दुकान आने के लिए स्पष्ट रूप से मना कर दिया। लगा, मैंने ही अपने हीरे को खराब कर दिया था।