रजनी ने अपनी घनेरी काली लटें बिखेरीं ही थी। कि चमकता हुआ चांद उसके जूड़े में गजरा बनकर लिपट गया। यह देखकर तारे शरमा गये। गर्मी की ऋतु थी नीले आकाश में चांदनी चारो ओर बिखर गई थी, मानो आज किसी की बारात आने वाली हो। हां हां बारात ही तो आने वाली थी राधा की। लेकिन राधा आज विगत दिनों की यादों में खोई कुछ इस तरह से बेचैन बैठी थी मानो उसे अपना कोई होश ही न हो।
माधव अभी तक नहीं आया था, बारात आने वाली थी, राधा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा वह सोचने लगी, हाय! अब क्या होगा। क्या वह माधव से बिछड़ जाएगी। यह सोचकर वह बार-बार कांप जाती थी। अपने कमरे में बैठी वह अपने आप से मानो लड़ रही थी। माधव उसे लेने क्यों नहीं आया और उसकी शादी हो गई तो वह माधव के बिना जी नहीं पाएगी उसकी दुनिया लुट जाएगी। वह कहीं की न रहेगी। ऐसे ख्याल उसके मन को विचलित कर रहे थे। बाहर हलचल थी जैसी शादी वाले घर में होती है।
तभी किसी ने उसके कमरे का दरवाजा खटखटाया, सुनकर उसकी जान कब से वह फोन की घंटी सुनने का अधीर थी। दरवाजे पर कौन है यह जानने के लिए वह उठी और धीरे से उसने दरवाजा खोला। देखा रूपा थी उसकी सहेली, राधा की जान में जान आई। अरी यह क्या रोनी सूरत बना रखी है। रूपा ने कहा, राधा ने कहा, राधा बोली, माधव आया क्यों नहीं, उसने तो आने का वादा किया था। पता है आज मेरे दिल पर बिजलियां गिर रही हैं, सिर चकरा रहा है लगता है रूपा आज मैं पागल हो जाउंगी। तभी किसी ने जोर से पुकारा । राधा-राधा आवाज उसके पिता की थी जो उसे पुकार रहे थे।
पिता की आवाज सुनते ही उसके कानों में बम फूटने लगे, उसने कोई जबाव नहीं दिया, चुपचाप बैठी रही। पिता ने दरवाजे पर दस्तक दी, राधा ने दरवाजा खोल दिया, देख राधा ने अभी तक श्रृंगार नहीं किया था। वह वैसे ही बैठी थी, उदास, बेचैन। राधा तुम अभी तक तैयार नहीं हुई, जल्दी करो बारात आने वाली है। यह कहकर वहचले गये। रूपा भी भयभीत हो गई जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो।
राधा की समझ में नहीं आ रहा था। कि वह क्या करे, तभी रूपा बोली, राधा तू ऐसा मत कर, राधा की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें, तभी रूपा बोली, राधा तू ऐसा मत कर, अगर तू माधव के साथ चली जायेगी तो क्या होगा। तेरे घर की इज्जत मिट्टी में मिल जायेगी। लोग कैसी-कैसी बातें करेंगे, ताने देंगे पता है तुझे, राधा जैसे कुछ सुन ही नहीं रही थी। वह तो माधव के बारे में सोच रही थी जो अभी तक नहीं आया था। तभी फोन की घंटी बजी, राधा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने जल्दी से फोन उठाया, उधर से आवाज आई राधा फोन माधव का ही था। हां माधव कहां थे, इतनी देर से बताओ क्या करें।
तुम घर की पिछली सीढ़ियों से नीचे आ जाओ मैं सड़क पर खड़ा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं माधव ने कहा, राधा तुरंत कमरे से निकल कर बाहर जाने लगी। रूपा ने समझाया राधा एक बार फिर सोच ले लेकिन वह नही ंमानी । वह धीरे से पीछे की सीढ़ियों से उतर कर सड़क पर चली गई जहां माधव इंतजार कर रहा था। रूपा देखती ही रह गई। राधा ने माधव को देखा तो उसकी जान में जान आई। बोली इतनी देर कहां लगा दी थी। राधा ने पूछा यह बातें करने का समय नहीं है चलो माधव ने कहा। वहां से दोनों स्टेशन की ओर चले गये।
उधर बारात बस दरवाजे पर ही पहुंचने वाली थी। राधा के पिता ने घर को खूब सजाया था। रंगीन झालरें लटक रही थीं। बिजली के दुधिया बल्बों की रोशनी चोरों ओर बिखर रही थी मानों रात में दिन निकल आया हो। पंडाल में कुर्सियां सजी थीं। मेहमान खूब रंगबिरंगे कपड़ों में सजे-धजे बैठे थे। खूब हलचल थी। राधा के पिता खूब हंस हंसकर अतिथियों का स्वागत कर रहे थे, अच्छा इंतजाम किया था। सारे लोग खुशी में मस्त थे। कुछ ही देर में बारात दरवाजे तक आ गई। बाजों के शोर से कान फटे जा रहे थे । शहनाइयां बज रही थी। जैसे बारातों में बजती हैं। आकाश दूल्हा बना घोड़े पर बैठा था। द्वाराचार हो गया दुल्हन को बुलाओ पंडित जी ने कहा, राधा के पिता ने राधा की मां से राधा को लाने को कहा रूपा ओ रूपा राधा को तो ले आ, पंडित जी बुला रहे हैं।
राधा की मां ने कहा, रूपा ने सुना तो जैसे उसे एक साथ हजारों बिच्छुओं ने डंक मार दिए हो उसका लगा जैसे उसे चक्कर आ जायेगा वह समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या करे, सांसों पर काबू पाकर उसने कहा ठीक है, मौसी बुलाती हूं अभी। लेकिन राधा का कमरा तो खाली था, राधा तो माधव के साथ जा चुकी थी। रूपा की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। हिम्मत समेट कर उसने कहा मौसी राधा अपने कमरे में नही है । सुनकर राधा की मां पर तो जैसे पहाड़ टूटकर गिर पड़ा हो। सभी को पता चल गया, पूरे घर में चकचक होने लगी। राधा के पिता ने जब यह सुना तो उन्होंने अपनी छाती पीट ली।
बारातियों में खलबली मच गई। लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। बारात लौट गई। राधा के पिता और मां बहुत देर तक जाती हुई बारात को देखते रहे। फिर घर में जाकर जोर-जोर से रोने लगे। लेकिन उनके आंसू उनकी सिसिकियां कोई सुनने वाला नहीं था। उनका जीवन बेकार हो गया था। अब वह किसके लिए जियें। एक राधा ही तो इकलौती सन्तान थी और उसने भी अपने माता-पिता के बारे में कुछ भी नहीं सोचा, क्या इंसान को सिर्फ अपने बारे में ही सोचना चाहिए क्या परिवार उसके लिए कुछ भी नहीं है। काश! यह बात राधा समझ पाती तो आज वह दिन न देखना पड़ता किन्तु नियति को कौन टाल सकता है। जो होना था वह हो गया। दुख और बदनामी के कारण राधा के माता-पिता ने आत्महत्या कर ली। उसका घर एक बदनुमा दाग बनकर रह गया था।
शाम धीरे-धीरे ढल रही थी आसमान में नन्हें नन्हें तारे झांक रहे थे मानो अपनी मां रात को खोज रहे हों और शाम धीरे-धीरे रात की बाहों में समाती जा रही थी। उधर राधा दरवाजे पर खड़ी माधव की प्रतीक्षा कर रही थी। आज दिल्ली से आये उसे दो महीने बीत गये थे। रानीखेत की स्मृतियां उसके मस्तिष्क में आज भी फेरी लगाती रहती हैं। रानीखेत में ही तो था उसका घर जिसे वह छोड़कर चली आई थी। माधव किसी आॅफिस में काम करता है। शाम ढले जब तक वह वापस नहीं आ जाता था। राधा उसका दहलीज पर खड़ी इंतजार करती रहती थी। आज भी कर रही है। माधव आया, तो राधा के होठों पर मुस्कराहट आ गई। माधव ने आते उसे प्यार से देखा और बोला चलो आज पिक्चर देखने चलते हैं। राधा बोली ठीक है।
थोड़ी देर में दोनों तैयार होकर चले गए। पिक्चर देखकर दोनों देर रात घर लौटे। सवेरा हुआ दैनिक कार्यों से निवृत होकर माधव तैयार होकर आॅफिस चला गया। राधा घर में अकेली रह गई। आज उसे जानें क्यों अपने माता-पिता और अपने घर की याद आने लगी। न जाने मेरे माता-पिता का क्या हुआ होगा, लेकिन वह क्या करे। उसने जो गलती की थी उसका प्रायश्चित तो उसके करना ही है। उसे क्या पता था कि उसके माता-पिता आत्महत्या कर चुके हैं। अचानक उसे रूपा का ध्यान आया। उसका मोबाइल नंबर उसके पास था। उसने साहस करके रूपा का नम्बर मिलाया, उधर से रूपा की आवाज आई हैलो-रूपा ने कहा, राधा कुछ बोली नहीं बस एक आह उसके होठों पर आकर लौट गई।
हैलो-फिर रूपा ने कहा, र-र रूपा में राधा बोल रहा हूं, राधा तुम कहां हो तुम, राधा तुमने जाकर अच्छा नहीं किया। पता है चाचा और चाची ने आत्महत्या कर ली है, सभी तुमको बुरा-बुरा कह रहे हैं। राधा ने सुना तो उसके पैरों तले जमीन खिसकती चली गई। उसका सर चकराने लगा। फोन उसके हाथों से छूट कर गिर पड़ा। रोते-रोते कब शाम हो गई उसे पता ही नहीं चला। छुट्टी के बाद जब माधव लौटकर आया तो जानकर उसे भी दुःख हुआ लेकिन अब क्या हो सकता था जाने वाले चले गए अब उन्हें वापस तो नहीं लाया जा सकता। राधा की एक भूल ने दो जिन्दगियां जला दीं। इसका फल तो उसे भुगतना ही पड़ेगा।
क्या इंसान को अपने मन की करने की छूट है, नहीं, यह तो गलत है। धीरे-धीरे दिन बीतते गये। एक दिन की बात है माधव की अपने मालिक से किसी बात को लेकर कहासुनी होने लगी। बात इतनी बढ़ी कि मालिक ने उसे नौकरी से निकाल दिया। राधा को पता चला तो वह भी दुखी हुई। फिर काफी दौड़धूप करके भी माधव को कहीं कोई नौकरी नहीं मिल पाई। वह परेशान था, घर में खाने-पीने के लिए कुछ भी नहीं था। वह न चाहकर भी टैक्सी चलाने लगा, क्या करता था, घर में खाने -पीने के लिए कुछ भी नहीं था।
एक दिन टैक्सी की टक्कर हो गई। टक्कर इतनी तेज थी कि टैक्सी के परखच्चे उड़ गये, साथ ही माधव ने भी दम तोड़ दिया। राधा को जब पता चला तो उसे दुनिया घूमती हुई नजर आने लगी और वह अपना होश खो बैठी और जब कुछ देर बाद उसे उसकी चेतना लौटी तो कुछ लोग उसे घेर कर बैठे थे, संवेदना व्यक्त करने के लिए लेकिन अब क्या हो सकता था। माधव तो चला गया। राधा के कांधों पर एक और अर्थी का बोझ आ गया था। वह विवश थी और अपराधबोध से ग्रसित थी। वह अब क्या करे क्या न करे। उसकी कुछ समझ में न आता था। मनुष्य जीना ना भी चाहे तो भी उसे जीना पड़ता है।
काश राधा भी माधव के साथ मर जाती लेकिन ऐसा कहां होता है, उसकी दुनिया लुट चुकी थी। आज वह बिल्कुल अकेली है। उसकी आत्मा उसे धिक्कार रही थी तू कलंकिनी है, अभागी है, तेरी सूरत देखना भी पाप है ऐसे विचार आ रहे थे। उसमें अब बिल्कुल भी शक्ति नहीं बची थी धीरे-धीरे वह बीमार रहने लगी। पड़ोसी अच्छे थे जो उसकी देखभाल कर देते थे। लेकिन ऐसे कितने दिन तक चलता और एक दिन राधा भी इस दुनिया को छोड़कर चली गई तो उसकी अधूरी कहानी।
आज न राधा है, न माधव है न राधा के माता-पिता हैं। क्या राधा इन सबको ढूंढने के लिए प्रेतनी बनकर मंडराती रहेगी। यह किसे पता है।
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