रामगढ़ का इलाका, दूर-दूर तक फैला हुआ। सुबह की किरणें फूटकर चप्पेे-चप्पे पर अपना जाल बुन चुकी थी। वातावरण स्वच्छ था। नीले गगन की चादर पर पक्षी उन्मुक्त उड़ रहे थे। किसान अपने हल संभाले बैलों की जोड़ी सहित खेतों पर निकल चुके थे। ऊबड़- खाबड़ पगडंडियां, टेढ़े- मेढ़े रास्ते, छोटे-बड़े झोपड़े, खपरैल के मकान, ईंट और पत्थर के मकान। बच्चों ने धूल और मिट्टी में खेलना आरंभ कर दिया था।
और राधा, राजा विजयभान सिंह के साथ उनके राजमहल की सबसे ऊंची मंजिल पर एक किनारे खड़ी इस कस्बे का पूरा नक्शा आज पहली बार देख रही थी, जिसकी वह एक साधारण-सी गोरी थी। पलकों पर आंसू मोती के समान टंके हुए थे, जिसके चारों ओर फैला काजल उसके जीवन के समान अंधकारमय बन चुका था।
माथे की बिंदिया फैली हुई, लटें बिखरी, होंठ सूखे, दिल पर दर्द की चोट लगी हुई और मस्तक सिलवटों से भरा हुआ था। इन सिलवटों में किसी निर्दयी के प्रति घृणा झलक रही थी। मन के अंदर नफरत की आग भभक रही थी, उसकी कनपटी के समीप चोट लग जाने के कारण रक्त जम गया था।
कलाइयां चूड़ियां टूट जाने के कारण कट गई थीं। ब्लाउज के बटन टूटे हुए थे, कपड़े कई जगहों से फटे थे। उसकी सांसें मानो अंदर-ही-अंदर गहरी होकर घुट जाना चाहती थीं। ऊपर से देखने पर वह उसी नदी के समान गंभीर और खामोश थी, जिसकी गोद में अनगिनत अरमानों की लाशें दम तोड़कर चुपचाप बैठ जाती हैं।
‘यह देख रही हो राधा’? राजा विजयभान सिंह ने अपने दायें हाथ से पूर्व दिशा की ओर गांव की दूर तक फैली हुई सरहद की तरफ इशारा करते हुए कहा। ऐसा करते हुए उनकी अंगुलियों में पड़ी हीरे की अंगूठियां सूर्य की किरण से टकराकर चमक उठीं। उन्होंने बात जारी रखी‒यह सारा इलाका जहां भी तुम्हारी दृष्टि पहुंच सकती है, सब हमारा है, ‘मेरा’….. शब्द पर उन्होंने विशेष जोर दिया‒मैं इसका एकमात्र मालिक हूं, राजा हूं और यहां के लोग मेरी प्रजा। यह सब मैं तुम्हें दे दूंगा। तुम्हारे कदमों में बिछा दूंगा।
राधा कुछ नहीं बोली, केवल सामने देखती रही, जहां कुछ ही दूरी पर एक विशाल वृक्ष था। इसकी जड़ में सीमेंट का एक बड़ा चबूतरा बना हुआ था, जिसकी सतह पर खून से हज़ारों बेगुनाहों की कहानियां लिखी हुई थीं। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं और होंठ भींचे।
उसकी आंखों में अपनी छोटी बहन कम्मो की तस्वीर घूम गई, जो चौदह वर्ष की भी नहीं हुई थी कि विजयभान सिंह की वासना का शिकार हो गई और फिर किसी को अपना मुंह न दिखा सकने के कारण उसने एक रात इसी वृक्ष की एक टहनी से लटककर फांसी लगा ली थी।
सुबह जब उसके बापू ने विजयभान सिंह से इंसाफ मांगते हुए दुहाई दी थी तो उसकी जुबान बंद करने के लिए इस जालिम ने उसे दूसरे इल्जाम में फंसाकर इसी वृक्ष से बंधवा दिया था और कोड़ों से मार- मारकर उसकी खाल खींच ली थी। इतनी भयानक यातना पाकर वह दूसरे ही दिन मर गया था। राधा के बापू के इस भयानक अंजाम को देखकर गांववालों के दिल में विजयभान सिंह का अत्यधिक भय समा गया था। राधा ने विजयभान सिंह को दिल की गहराई से बद्दुआ दी।
यदि उसके बस में होता तो वह इस चांडाल का मुंह नोच लेती, परंतु एक गरीब लड़की थी वह, केवल तड़पकर रह गई। ………………
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कांटों का उपहार- पार्ट 2
कांटों का उपहार – पार्ट 3
कांटों का उपहार – पार्ट 4
कांटों का उपहार – पार्ट 13
कांटों का उपहार – पार्ट 14
कांटों का उपहार – पार्ट 16
कांटों का उपहार – पार्ट 17
कांटों का उपहार – पार्ट 19
कांटों का उपहार – पार्ट 55 (अंतिम)
