Knee Pain: सर्दियों का यह मौसम जोड़ों के दर्द से पीड़ित लोगों की मुश्किलें और बढ़ा देता है। ऐसे में इस मौसम में रोगियों को अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता रहती है। इसलिए हम यहां पर आपको बता रहे हैं जोड़ों के दर्द से मुक्ति पाने के आसान घरेलू उपाय।
शरीर में होने वाली व्याधियों के मुख्य कारण वात, कफ और पित्त हैं। इन्हीं की अधिकता से शरीर में रोगों का जन्म होता है। इन्हीं रोगों में से होने वाला एक रोग है बुढ़ापे में होने वाला जोड़ों का दर्द। यह रोग वायु (वात) की अधिकता के कारण उत्पन्न होता है। इसे और भी अन्य नाम गठिया, वात, संधिवात से जाना जाता है। इस रोग के कारण हाथों, पैरों, कमर के जोड़ों में दर्द रहता है। इसके कारण दुर्गंधयुक्त पसीना, प्यास, सिर-दर्द रहता है।
जोड़ों का दर्द अनेक प्रकार का होता है। ठोड़ी का जकड़ना, स्वाद नष्ट होना, गर्दन, कमर, हाथ-पैर अकड़ना, पक्षाघात होना भी संधिवात में ही शामिल है। जब जोड़ विकृत अवस्था में, टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं तो ‘रूमैटाइड संधिशोथ कहलाता है। इसमें प्रात: उठने पर उंगलियों, हाथों, पैरों, कमर में अकड़न होती है। जो शरीर को थकावट का एहसास कराती है।
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जोड़ों के दर्द का कारण
मुंह की गंदगी, चिंता, अशांति, भय, शोक, अनिच्छा का काम, पानी में भीगना, ठंड लगना, आतशक, सूजाक, अधिक स्त्री प्रसंग, ठंडी-रूखी चीजें खाना, ज्यादा रात्रि-जागरण, चोट लगना, अधिक रक्त-स्राव, अधिक श्रम, मोटापा, ज्वर होना, खून की कमी, धूप लगने आदि कारणों से संधिवात होता है।
जोड़ों में यूरिक एसिड जमा होने, पोषक तत्त्वों की कमी, यक्ष्मा, विभिन्न रोगाणुओं के आक्रमण, शरीर में प्रतिरोधक क्षमता की कमी, भोजन में खनिज-लवण और विटामिनों की कमी से यह रोग पैदा होता है।
उपचार
संधिवात में सेक, मालिश, भाप-स्नान, व्यायाम लाभदायक है। अक्सर संधिवात के साथ निमोनिया भी हो जाता है। निमोनिया हो जाए तो पहले निमोनिया की चिकित्सा करें। रक्तशोधक भोजन चिकित्सा करें। दही, दाल, चावल आदि वायु बढ़ाने वाली चीजें न खाएं। इसमें अंकुरित अन्न का सेवन लाभदायक है। इसके सेवन से पेट में वायु नहीं बनती है।
इनके सेवन से बचें
सामान्यत: संधिवात में व्यक्ति को कब्ज की शिकायत रहती है। रोगी को चाहिए कि वह शरीर में कब्ज न होने दे। इसके लिए एरंड-तेल का उपयोग लाभप्रद होता है।
रोगी को तेल, मक्खन, घी आदि में तले गए पदार्थों से परहेज करना चाहिए। इसी प्रकार भिंडी, कटहल, भात (चावल) का निषेध करना चाहिए। गेहूं, ज्वार, जौ का प्रयोग करना उपयुक्त होता है। अपने आहार में अत्यंत मध्यम मसालों का प्रयोग लाभदायक होता है।
अचार, इमली, सिरका आदि पदार्थों से रोगी को दूर रहना चाहिए। रोगी की इच्छा हो, तो वह थोड़ी मात्रा में छाछ ले सकता है, परंतु वह खट्टी न हो।
क्या खाएं और क्या न खाएं?
नींबू- मौसम के अनुसार ठंडे या गर्म पानी में नींबू निचोड़ कर नित्य नींबू पानी पीना लाभदायक है। स्वाद के लिए इसमें शहद मिला सकते हैं, अर्थात् नींबू, शहद, पानी मिला कर पीएं। हरी पत्ते वाली सब्जियां यथा पालक, बथुआ, चौलाई का रस हानिकारक है। अखरोट, पेठा, लौकी, खीरा, खरबूजा खाना लाभदायक है।
गेहूं- गेहूं के छोटे पौधे का रस पीना इस रोग में बहुत लाभदायक है। खट्टे फलों के रस, सब्जियां जैसे- लौकी, टमाटर का रस पीकर रहने से यह रोग ठीक हो जाता है।
दही- आमवात के रोगी के लिए दही का सेवन हानिकारक है। ताजा मीठा दही अल्प मात्रा में केवल दोपहर के भोजन में लिया जा सकता है। मांस, मसूर की दाल भी इसमें हानिकारक है।
कैल्शियम, फास्फोरस- यदि रोग का प्रभाव हड्डियों पर पड़े तो कैल्शियम, फास्फोरस वाले पदार्थ अधिक लें। अंकुरित अन्न का सेवन भी संधिवात में लाभकारी है।
टमाटर- गठियावात के रोगी के लिए टमाटर लाभदायक है।
पुदीना- हरा पुदीना पीसकर या सूखा पुदीना एक गिलास पानी में उबालें। उबालते हुए आधा पानी रहने पर छानकर नित्य दो बार पीएं। यह गठिया के दर्द में लाभ करता है।
गाजर- गाजर का रस संधिवात, गठिया को ठीक करता है। गाजर, ककड़ी, चुकंदर तीनों का रस समान मात्रा में मिलाकर पीने से शीघ्र लाभ होता है। यदि तीनों सब्जियां उपलब्ध न हों तो जो मिलें उन्हीं का मिश्रित रस पीना चाहिए।
आलू- पजामे या पतलून की दोनों जेबों में लगातार एक छोटा-सा आलू रखें तो यह गठियावात में रक्षा करता है। आलू खिलाने से भी बहुत लाभ होता है। कच्चा आलू पीसकर वातरक्त में अंगूठे पर लगाने से दर्द कम होता है। दर्द वाले स्थान पर लेप भी करें।
प्याज- स्नायविक व वात रोग में प्याज लाभदायक है। प्याज का रस तथा सरसों का तेल समान मात्रा में मिला कर दर्द ग्रस्त अंगों पर मालिश करने से लाभ होता है।
लहसुन- एक गांठ लहसुन छील कर रात को एक कप पानी में डाल दें। प्रात: पीस कर उसी पानी में घोल कर पीजिए। इसके बाद एक चम्मच मक्खन खाएं। इस प्रकार इसका सेवन एक सप्ताह तक करें। एक सप्ताह बाद दो गांठ इसी प्रकार दूसरे सप्ताह में, तीसरे सप्ताह में तीन गांठ नित्य इसी प्रकार लें। वात रोग में लाभ होगा। लहसुन के तेल की मालिश प्रतिदिन करनी चाहिए। लहसुन की एक बड़ी गांठ को साफ करके, दो-दो टुकड़े दूध में उबाल लेना चाहिए। इस प्रकार तैयार की गई लहसुन की खीर 6 सप्ताह तक पीने से गठिया दूर हो जाता है। यह देर रात को पीना चाहिए। दूध की खीर, लहसुन को दूध में पीसकर, उबालकर भी ले सकते हैं।
दूध की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाते जाना चाहिए। खटाई, मिठाई का परहेज रखना चाहिए। लहसुन को पीसकर तिल के तेल में मिलाकर खाने से वात रोगों में शीघ्र लाभ होता है।
आधा चम्मच लहसुन का रस एक चम्मच गर्म घी में मिला कर सुबह-शाम दो बार नित्य पीने से आमवात में लाभ होता है।
किस दर्द में क्या खाएं?
हींग- जोड़ों में दर्द हो, पैर में दर्द हो तो चने की दाल के बराबर हींग की फंकी पानी के साथ एक बार नित्य एक महीना लें।
नमक- गठिया के रोग में रक्त में खटाई की प्रधानता हो जाती है, नमक खाने से यह खटाई बढ़ती है। अत: गठिया के रोगी को नमक का सेवन नहीं के बराबर करना चाहिए।
मेथी- वायु एवं वात रोगों में मेथी का साग लाभ करता है। मेथी को घी में भूनकर पीसकर छोटे-छोटे लड्डू बनाकर दस दिन सुबह-शाम खाने से वात-पीड़ा में लाभ होता है। गुड़ में मेथी का साग बनाकर खिलाने से गठिया मिटती है। चाय की चार चम्मच दाना मेथी रात को एक गिलास पानी में भिगो दें। प्रात: पानी छानकर हल्का गर्म करके पीने से लाभ होता है। भीगी मेथी को अंकुरित करके खाएं। दो चम्मच दाना मेथी को दो कप पानी में उबालकर जब आधा पानी रह जाए तो पानी नित्य दो घंटे बाद लगभग एक महीना तक पीएं। इससे गठिया, कमर-दर्द और कब्ज में लाभ होता है।
अदरक- वात, कमर, जांघ, दर्दों में अदरक के रस में घी या शहद मिलाकर पीना चाहिए। दस ग्राम सौंठ, सौ ग्राम पानी में उबालकर ठंडा होने पर स्वादानुसार शक्कर या शहद मिलाकर पिलाएं। सौंठ और हरड़ समान मात्रा में मिलाकर पीस कर दो बार रोजाना गर्म पानी से फंकी लें। जोड़ों के दर्द में लाभ होगा।
शहद- संधिवात ग्रस्त लोगों को लंबे समय तक शहद बहुतायत में खाना चाहिए। इससे बहुत लाभ मिलता है। जोड़ों का दर्द कम होता है।
तुलसी- तुलसी के पत्तों को उबालते हुए इसकी भाप वात ग्रस्त अंगों पर दें तथा गर्म पानी से धोएं। तुलसी के पत्ते, काली मिर्च, गाय का घी तीनों मिलाकर सेवन करें। इससे वातव्याधि में लाभ होता है।
चुकंदर- चुकंदर खाने से जोड़ों का दर्द दूर होता है।
ककड़ी- यूरिक एसिड की अधिकता से वात रोग हो तो ककड़ी और गाजर का रस आधा-आधा गिलास मिलाकर पीने से लाभ होता है। केवल ककड़ी का रस भी पी सकते हैं।
कुलथी- 50-60 ग्राम कुलथी एक किलो पानी में उबालें। चौथाई पानी रहने पर छानकर उसमें थोड़ा सेंधा नमक और आधा चम्मच पिसी हुई सोंठ मिलाकर पीने से लाभ होता है।
तिल- तिल के तेल की मालिश करने से वात रोग में लाभ होता है।
गठिया या वायु के कारण शरीर में दर्द हो तो सोंठ 20 ग्राम, अखरोट की गिरी 40 ग्राम तथा काला तिल 160 ग्राम एक साथ कूट-पीसकर 100 ग्राम गुड़ के साथ मिलाकर रख लें। सुबह-शाम 20-20 ग्राम की मात्रा में गर्म जल के साथ सेवन करें।
नमक- सूजन वाले स्थान पर नमक या बालू मिट्टी की पोटली से सेक करें।
अजवाइन- अजवाइन का अर्क या अजवाइन का तेल जोड़ों पर मलने से दर्द दूर हो जाता है।
अजवाइन को तिल के तेल में उबाल कर तेल बना लें। एक चम्मच पिसी हुई अजवाइन में स्वादानुसार नमक मिलाकर प्रात: भूखे पेट गर्म पानी से नित्य फंकी लें। दो गिलास पानी में दो चम्मच अजवायन और दो चम्मच नमक डालकर उबालें। फिर इसे हल्का गर्म रहने पर कपड़ा भिगो कर दर्द वाले अंग की सिकाई करें।
चाय- चाय पेशाब में यूरिक एसिड बढ़ाती है। उससे जोड़ों का दर्द व वजन बढ़ता है। अत: वात के रोगियों को चाय नहीं पीना चाहिए।
घुटनों का दर्द
खीरा- घुटनों का दर्द दूर करने वाले भोजन के साथ खीरा अधिक खाएं।
आलू- घुटने के श्लेषकला शोध, सूजन व इस जोड़ में किसी प्रकार की बीमारी हो तो कच्चे आलू को पीसकर लगाने से बहुत लाभ मिलता है।
मोठ- घुटनों में दर्द नया हो या बहुत पुराना, मोठ के लड्डू खाने से शीघ्र ठीक हो जाता है। समान मात्रा में मोठ, चीनी और गाय या भैंस का घी लें। फिर उनको पीसकर छान लें। उस आटे में घी डाल कर सेंके। फिर उसमें चीनी की चाशनी बना मिला कर लड्डू बना लें। दो लड्डू एक बार प्रात: भूख पेट खाएं।
जांघ का दर्द
अदरक- जांघ में दर्द होने पर एक चम्मच अदरक के रस में आधा चम्मच घी मिलाकर प्रात: भूखे पेट पीएं, लाभ होगा।
कमर का दर्द
नींबू- एक चम्मच नींबू का रस, एक चम्मच लहसुन का रस, दो चम्मच पानी सब एक साथ मिलाकर पीएं। ऐसी दो मात्रा सुबह-शाम नित्य पीएं। कमर का दर्द ठीक हो जाएगा।
मेथी- मेथी का साग खाने से कमर-दर्द में लाभ होता है।
सहजन- कमर-दर्द में सहजन की सब्जी (फूल या फली) लाभदायक है।
छुहारा- कमर के दर्द में छुहारा लाभदायक है। दो छुहारे सुबह-शाम खाएं।
आलू- कच्चे आलू को दो भाग में काटकर उसे कमर पर रखकर मालिश करें।
गेहूं- एक चम्मच गेहूं की राख शहद में मिला कर चाटने से कमर और जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है। गेहूं की रोटी एक ओर सेंक लें तथा एक ओर कच्ची रखें। कच्ची की ओर तिल का तेल लगा कर दर्द वाले अंग पर बांध दें। इससे दर्द दूर हो जाता है।
एरंड का तेल- कमर-दर्द होने पर एरंड के तेल को छोटे चम्मच से लेकर दूध में मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है।
जायफल- जायफल पानी में मिलाकर गर्म करें। अच्छी तरह गर्म होने पर ठंडा करके कमर-दर्द पर मालिश करने से लाभ होता है।
अदरक- अदरक के रस में घी मिलाकर पीना चाहिए। कमर-दर्द में आराम मिलेगा। इन घरेलू उपचारों के द्वारा संधिवात से निदान मिल सकता है। इसके अलावा कुछ उपयोगी योग एवं ध्यान आदि के द्वारा भी इनसे मुक्त हुआ जा सकता है। सकारात्मक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले मरीजों को अधिक प्रभावी ढंग से दर्द से मुक्ति एवं नियंत्रण पाते देखा गया है। अपनी बिमारियों को पापों या ईश्वरीय प्रकोप मानने की नकारात्मक सोच, दर्द बढ़ाती है। इसके विपरीत ईश्वर के निकट अथवा जीवन के प्रति जुड़ाव रखने वाले मरीजों को अधिक सामाजिक समर्थन भी मिलता है।
व्यायाम से जोड़ों के दर्द में राहत
वृद्धावस्था में जोड़ों का दर्द एक आम बात है। अत: इस उम्र में कुछ उपयोगी व्यायाम किए जा सकते हैं। इनमें से कुछ बताए जा रहे हैं-
- उंगलियों के लिए- दोनों पैरों एवं हाथ की उंगलियों तथा अंगुष्ठों को आगे की ओर धीरे-धीरे बलपूर्वक दबाएं। उसी तरह पीछे की ओर करें। एड़ियां एवं हथेली को जोड़ों को लाभ मिलेगा।
- पीठ के लिए आसन- यह आसन बैठकर किया जाता है। दोनों हाथों से एक दूसरे हाथ की कलाई पकड़कर ऊपर उठाते हुए सिर के पीछे ले जाएं। श्वास अंदर करते हुए दाएं हाथ से बाएं हाथ को दाहिनी ओर सिर के पीछे से खींचे। गर्दन व सिर स्थिर रहे। फिर श्वास छोड़ते हुए हाथों को ऊपर ले जाएं। इसी प्रकार दूसरी ओर से इस प्रकिया को करें।
- घुटनों के लिए- सीधे खड़े होकर दोनों एड़ियों को एक साथ सटाते हुए, घुटनों को भी सटाएं। दोनों हाथों की हथेलियों को घुटनों पर रखकर पहले बाएं ओर फिर दाएं ओर वृत्ताकार पथ पर घुमाएं। इस क्रिया को 3-4 बार करें।
- कंधे के लिए- दोनों हाथों को मोड़कर कंधे पर रखें। कोहनियां कंधे के समकक्ष सामने रहें। फिर दोनों कोहनियों को छाती के सामने मिलाते हुए वृत्ताकार में घुमाते हुए बड़ा शून्य बनाएं। यह क्रिया विपरीत दिशा से भी करें।
