What is Perimenopause: हर महिला के जीवन में कुछ ऐसे मोड़ आते हैं जो शारीरिक और मानसिक रूप से खास होते हैं। पेरिमेनोपॉज़ ऐसा ही एक बदलाव है, जो मेनोपॉज़ से पहले शुरू होता है और महिला के शरीर में कई हार्मोनल उतार-चढ़ाव लाता है। इस समय महिला थकावट, मूड स्विंग्स, नींद की कमी और वजन बढ़ने जैसी समस्याओं से जूझ सकती है।
न्यूट्रीशन एक्सपर्ट रुजुता दिवेकर इस बदलाव को नैचुरल बताते हुए कहती हैं कि सही खानपान, व्यायाम और जीवनशैली में बदलाव से इसे बहुत सरल बनाया जा सकता है। इस लेख में आपको बताएंगे कि पेरिमेनोपॉज़ क्या होता है, इसके लक्षण क्या हैं और आप इसे कैसे बेहतर तरीके से संभाल सकती हैं।
यदि आप या आपके आसपास कोई महिला इस दौर से गुजर रही हैं, तो यह लेख न केवल जानकारी देगा बल्कि मानसिक और शारीरिक रूप से भी आपको तैयार करेगा। रुजुता दिवेकर के सुझावों के साथ यह सफर थोड़ा आसान और खुशहाल हो सकता है।
पेरिमेनोपॉज़ क्या है और कब शुरू होता है?
पेरिमेनोपॉज़ वह समय होता है जब महिला का शरीर धीरे-धीरे मेनोपॉज़ की ओर बढ़ रहा होता है। यह आमतौर पर 40 की उम्र के बाद शुरू होता है, लेकिन कुछ महिलाओं में यह 35 की उम्र में भी आ सकता है। इस समय ओवरीज़ कम मात्रा में एस्ट्रोजन हार्मोन बनाना शुरू कर देती हैं, जिससे periods अनियमित होने लगता है। कुछ महिलाओं को यह बदलाव धीरे-धीरे महसूस होता है, जबकि कुछ को यह अचानक होता है। यह जानना जरूरी है कि यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक नैचुरल प्रोसेस है। इस समय शरीर के साथ-साथ मन में भी बदलाव आते हैं, जिन्हें समझना और स्वीकार करना बहुत जरूरी है।
इस दौरान शरीर में क्या बदलाव होते हैं?
पेरिमेनोपॉज़ के समय महिलाओं को कई तरह के लक्षण महसूस हो सकते हैं जैसे गर्माहट लगना (हॉट फ्लैशेज), नींद में खलल, वजन बढ़ना, मूड स्विंग्स, थकावट और मासिक धर्म का अनियमित होना। यह बदलाव हर महिला में अलग तरह से होते हैं। कुछ को सिर्फ मामूली लक्षण होते हैं, तो कुछ को ये बदलाव बहुत परेशान कर सकते हैं। रुजुता दिवेकर बताती हैं कि इन लक्षणों को समझना और उन पर ध्यान देना जरूरी है। इस समय खुद को नजरअंदाज करना ठीक नहीं है, बल्कि शरीर की ज़रूरतों को समझना और उन्हें पूरा करना चाहिए।
खानपान में कैसे करें बदलाव?
रुजुता दिवेकर का मानना है कि इस दौर में पोषण पर सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए। जंक फूड, प्रोसेस्ड खाना और ज्यादा मीठा खाने से परहेज़ करें। इसकी जगह घर का ताजा खाना, मौसमी फल-सब्जियां, दालें और घी जैसी पारंपरिक चीजें शामिल करें। रोजाना आंवला, दही, नारियल पानी जैसी चीजें शरीर को संतुलन में रखने में मदद करती हैं। साथ ही, समय पर खाना और ओवरईटिंग से बचना जरूरी है। सही डाइट से न सिर्फ शरीर को एनर्जी मिलती है, बल्कि हार्मोनल बैलेंस भी बेहतर होता है।
एक्सरसाइज़ और योग से मिलती है राहत
इस दौर में एक्टिव रहना बेहद जरूरी है। रोजाना हल्की फुल्की एक्सरसाइज़, जैसे तेज़ चलना, योग, स्ट्रेचिंग और ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ बहुत फायदेमंद होती हैं। रुजुता दिवेकर भी कहती हैं कि शारीरिक गतिविधि से शरीर में एंडोर्फिन्स नामक हैप्पी हार्मोन बनता है, जिससे मूड बेहतर रहता है। योग के आसनों से नींद में सुधार होता है और तनाव भी कम होता है। ध्यान और प्राणायाम से मन को शांति मिलती है। इस बदलाव को सहजता से अपनाने के लिए एक्सरसाइज़ एक मजबूत सहारा बन सकता है।
मेंटल और इमोशनल बैलेंस भी है ज़रूरी
पेरिमेनोपॉज़ के समय महिलाओं को कई इमोशनल उतार-चढ़ाव से गुजरना पड़ता है। मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन, चिंता और उदासी आम हैं। ऐसे में परिवार और दोस्तों का साथ बहुत मायने रखता है। रुजुता दिवेकर का सुझाव है कि खुद से प्यार करना और समय निकालना जरूरी है। संगीत सुनें, किताबें पढ़ें, मनपसंद काम करें और खुद को महत्व दें। मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने से इस बदलाव को समझना और सहन करना आसान हो जाता है। ध्यान, मेडिटेशन और पॉजिटिव सोच इस सफर को सुंदर बना सकते हैं।
