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नकारात्मक सोच

हर गर्भवती स्त्री यही चाहती है कि अपने शिशु की हर तरह से सुरक्षा करें लेकिन बड़े अफसोस से कहना पड़ता है कि कई महिलाएं गर्भावस्था के दौरान अपना बचाव तक नहीं कर पातीं क्योंकि उन्हें घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है। यदि गर्भावस्था पहले से नियोजित न हो तो कई बार यह उस महिला के साथी के लिए जलन, क्रोध व कुंठा की वजह बन जाती है, उसके मन में नकारात्मक सोच जन्म ले लेती हैं। कई बार वही भावनाएं, मां व अजन्मे बच्चे के लिए हिंसा का रूप ले लेती हैं।

गर्भावस्था की जटिलताओं व कार दुर्घटनाओं के मुकाबले गर्भवती स्त्रियां घरेलू हिंसा से अधिक मरती हैं। करीब 20 प्रतिशत महिलाओं को अपने साथी के हाथों हिंसा का शिकार होना पड़ता है। शारीरिक प्रताड़ना सहने वाली महिलाओं के शिशुओं की समय से पूर्व ही जन्म लेने की संभावना बढ़ जाती है। गर्भवती महिला व बच्चे को लगी किसी चोट की तुलना में शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। कुपोषण व प्रसव पूर्व देखभाल में कमी की वजह से ऐसी मांओं के यहां स्वस्थ शिशुओं का जन्म नहीं हो पाता।

जन्म लेने के तुरंत बाद शिशु भी उस प्रत्यक्ष हिंसा का शिकार होने लगता है। समाज के सभी वर्गों में ऐसी महिलाएं पाई जाती हैं। उनमें हर आयु, जाति व शैक्षिक स्तर की महिलाएं शामिल हैं। यदि आप भी घरेलू हिंसा की शिकार हैं तो याद रखें कि यह आपकी गलती नहीं है। आपने कुछ नहीं किया। आपको ऐसे बुरे रिश्तों से बाहर आने के लिए मदद लेनी होगी। यदि बीच-बचाव न हुआ तो हिंसा बढ़ती ही जाएगी। यदि आप इस संबंध में सुरक्षित नहीं हैं तो आपका बालक भी नहीं रहेगा। अपने चिकित्सक से बात करें। भरोसेमंद दोस्तों से बात करें या किसी स्थानीय घरेलू हिंसा हॉटलाइन पर संपर्क करें। कई राज्यों में ऐसे कार्यक्रम चलाए जाते हैं, जहां आपको रहने-खाने की जगह व प्रसव पूर्व देखभाल मिल सकती है।

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