घातक बेडसोर से मरीज को बचाने के लिए बरतें ये एहतियात: Bedsores
Bedsores

Bedsores: नेहा के पति का डेढ महीने पहले ब्रेन हैमरेज हुआ था जिसकी वजह से वो कोमा में चले गए थे। 25 दिन अस्पताल में रहने के बाद थोड़ी हालत सुधरने पर नेहा उन्हें घर ले आई थी। बेड रिडन होने के कारण नेेहा उनका पूरा ध्यान रखती थी। उसने गौर किया कि उसकी पीठ और कंधे पर लाल रैशेज हो रहे हैं। उसने डाॅक्टर को कंसल्ट करना मुुनासिब समझा। डाॅक्टर ने चैकअप करके बताया कि यह रैशेज बेडसोर के कारण हो रहे हैं। जोे उसके पति के एक ही पोेजिशन में लेटे रहने की वजह से हुए हैं। शुरूआती स्टेज होने पर डाॅक्टर ने उसे कुछ मेडिसिन दी और पूरी एहतियात बरतने की सलाह दी। नेहा की मेहनत से कुछ दिनों में बेडसोर की समस्या गंभीर होने से बच गई।

बेडसोर यानी बेड पर लेटे-लेटे प्रेशर से जख्म बन जाना। इसे प्रेशर सोर या डिक्यूबिटस अल्सर भी कहा जाता है क्योंकि हड्डी और बेडशीट के बीच में प्रेशर से बनता है। व्यक्ति छोटा हो या बड़ा-बेडसोर किसी को भी हो सकता है। यह ऐसे मरीजों में होता है जो लकवा, स्पाइनल इंजरी, लाइफ सपोर्ट सिस्टम वेंटिलेटर पर या बेड रिडन होते हैं। जो करवट लेने में भी असमर्थ होते हैं या कई दिनों से एक ही पोजिशन में होते हैं। उनके शरीर में प्रेशर पड़ने वाली जगहों पर पीड़ादायक घाव बन जाते हैं। ध्यान न देने पर इंफेक्शन यानी घाव में पस भी पड़ जाती है। यह पस खून में मिल कर पूरे शरीर में पहुंच सकती है। सेप्टिसीमिया होने की स्थिति में मरीज की जान भी जा सकती है।

वर्तमान में बेडसोर एक गंभीर स्थिति है जिससे बहुत सारे लोग जूझ रहे हैं। इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह कई बार नासूर बन जाते हैं या शरीर में इंफेक्शन फैलाकर गैंग्रीन की स्थिति पैदा कर सकते हैं। आमतौर पर यही माना जाता है कि अगर मरीज को एक बार बेडसोर हो गया, तो उसके ठीक होने की उम्मीद काफी कम रहती है। लेकिन अगर शुरूआती स्टेज में इसे डायगनोज कर लिया जाए और मेडिकेशन के साथ पूरी एहतियात बरती जाए, तो बचाव हो सकता है।

क्या है बेडसोर

एक ही पोजिशन में लेटे रहने के कारण ऐसे मरीजों के शरीर की हड्डी और वजन बेड पर प्रेशर डालती है जिसे इसे प्रेशर निक्रोसिस कहा जाता है। जिसकी वजह से उसके बीच की त्वचा लगातार दबती रहती है। वहां की त्वचा की कोशिकाओं और अंदरूनी मसल्स में रक्त संचार काफी कम हो जाता है। समुचित मात्रा में पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं, रक्त के साथ गंदगी वहीं इकट्ठा होने लगती है। त्वचा की कोशिकाएं खराब होने लगती हैं और घाव का रूप ले लेती है जिसे बेडसोर कहते हैं। समुचित उपचार न कराने पर उस टिशू में पस पड़ जाती है, बदबू आने लगती है। गैंग्रीन की स्थिति पैदा हो जाती है। टिशू में बैक्टीरिया पनपने लगते है, इंफेक्शन हो जाता है। यह बैक्टीरियल इंफेक्शन रक्त में फैल जाता है जिसे सेप्टीसीमिया कहते हैं। इससे मरीज की मौत तक हो सकती है।

कितनी स्टेज होती हैं

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बेडसोर की मूलतः 4 स्टेज होती हैं जिसकी वजह से इसे शुरूआत में ही पहचाना जा सकता है-: ग्रेड 1 में प्रभावित जगह पर लगातार प्रेशर पड़ने से त्वचा लाल रंग की हो जाती है। अगर उस प्रभावित जगह को उंगली से दबाते हैं, तो वो सफेद नहीं होता। ग्रेड 2 में धीरे-धीरे स्किन काली पड़ जाती है। त्वचा की ऊपरी लेयर डैमेज हो जाती है जो शुरूआती अल्सर का रूप लेनेे लगती है। ग्रेड 3 में बेडसोर का जख्म गहरा होता जाता है और त्वचा के अंदरूनी टिशू भी प्रभावित हो जाते हैं। इसमे इंफेक्शन होने की संभावना ज्यादा रहती है। ग्रेड 4 में बेडसोर का घाव प्रभावित हड्डी तक पहुंच जाता है।

किन जगहों पर होते हैं बेडसोर

अक्सर मरीज सीधा लेटा हुआ होता है, तो बेडसोर के घाव उसके सिर के पिछले हिस्से में, कंधे के पिछली तरफ, पीठ, कोहनी, नितंबों या टेलबोन, एड़ी पर ज्यादा बनते हैं। अगर मरीज एक साइड करवट लेकर लेटा होता है तो उस साइड के कान, कंधे, कोहनी, नितंब, घुटने या टखने पर घाव बनते हैं। इसी तरह जब मरीज लंबे समय तक व्हील चेयर पर बैठता है तो उसके पिछले कंधों, नितंबों या टेलबोन, एड़ी या फुट बाॅल पर बेडसोर के घाव होते हैं।

कब जाएं डाॅक्टर के पास

अगर बेडसोर का जख्म बढ़ गया है और ग्रेड 3 और ग्रेड 4 पर पहुंच गया है तो डाॅक्टर को कंसल्ट करना जरूरी है। क्योंकि इससे सैकेंडरी इंफेक्शन की संभावना बनी रहती है।

कैसे होता है उपचार

बेडसोर के उपचार में सबसे पहले प्रभावित हिस्से से मरीज के शरीर का प्रेशर हटाया जाए। इसके लिए हर आधे घंटे के बाद मरीज की पोजिशन बदलनी पड़ती है। अगर वो सीधा लेटा है तो उसे एक करवट, फिर दूसरी करवट लिटाया जाता है। पहली स्टेज में जब प्रेशर ज्यादा नहीं होता, तो नियमित रूप से ड्रेसिंग करने और एंटीबाॅयोटिक दवाइयां लेने से आराम मिलता है। नई स्किन चारों तरफ से आने लगती है।

अगर नई स्किन नहीं आ पाती है, तो स्किन-ग्राफ्टिंग की जाती है। इसमें स्किन के नीचे से गला हुआ (टिशू) निकाल दिया जाता है और स्किन-ग्राफ्टिंग की जाती है। आजकल इसके लिए कोलेजन-टिशू से भी स्किन-ग्राफ्टिंग की जाती है। ग्राफ्टिंग के बाद वैक्यूम ड्रेसिंग की जाती है। अगर इंफेक्शन हड्डी तक पहुंच जाता है, तो प्लास्टिक सर्जन फ्लैप-सर्जरी के माध्यम से कवर किया जाता है। वरना इंफेक्शन फैल जाता है। मरीज की स्थिति के हिसाब से एंटीबायोटिक दवाइयां दी जाती हैं। समुचित उपचार और पूरी देखभाल होने पर मरीज को ठीक होने में 3-6 महीने लग जाते हैं।

लंबे समय तक बिस्तर में रहने और बेडसोर की स्थिति में कई मरीज डिप्रेशन में चले जाते हैं जिसे दूर करने के लिए डाॅक्टर की सलाह पर एंटी-डिप्रेसेंट दवाइयां भी दी जाती हैं। जरूरत हो तो उसकी मनःस्थिति को ठीक करने के लिए साइको-थेरेपी भी की जाती है।

ऐसे करें बचाव

बेडसोर के पहली 2 स्टेज घर पर भी मैनेज की जा सकती है मरीज की पूरी देखभाल से मरीज इससे बच सकता है-

air mattress
  • सबसे जरूरी है- बैक-केयर या पीठ की देखभाल करना। इसके लिए मरीज को आधे-एक घंटे के अंतराल पर करवटें बदलवाते रहना चाहिए। करवट बदलवाने से उसके शरीर के इन हिस्सों में प्रेशर कम पड़ता है, रक्त संचार सुचारू रूप से होने लगता हैै, प्रभावित जगह नमीरहित रहती है और वहां घाव नहीं बनता।
  • हाइजीन का पूरा ध्यान रखना चाहिए। मरीज को रोजाना नहलाना या स्पांज कराना बहुत जरूरी है। इससे एक तो वह स्वच्छ रहेगा, दूसरा नहाते समय बार-बार पाॅश्चर बदलने से उसका रक्त संचार ठीक रहता है।
  • बेडसोर घाव की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। दिन में कम से कम 2 बार त्वचा को नाॅर्मल सलाइन वाॅटर से धोना चाहिए। सूखने पर एंटी सेप्टिक क्रीम या एंटी बाॅयोटिक क्रीम से ड्रेसिंग करनी चाहिए।
  • प्रभावित जगह को साफ-सूखा रखने की कोशिश करनी चाहिए। माॅश्चर होने पर बेडसोर बढ़ने की संभावना ज्यादा रहती है। माॅश्चर को कम करने के लिए टेलकम पाउडर का भी इस्तेमाल करना चाहिए। यह नमी ज्यादातर बेड रिडन मरीज को पहनाए जाने वाले डायपर की वजह से आती है। समय-समय पर डायपर न बदला जाए तो त्वचा छिल भी सकती है। जरूरी है डायपर समय पर बदल देना चाहिए।
  • मरीज को जिस बेड पर लिटाया गया है, उसकी चादर पर पड़ने वाली सलवटें समय-समय पर ठीक करते रहना चाहिए। ताकि सलवटों से उसकी त्वचा पर रगड़ लगने से छिलने का डर न रहे।
  • मरीज को स्पेशल एयर-मैट्रेस या एयर-कुशन पर सुलाना लाभकारी है। इससे शरीर प्रभावित जगह पर ज्यादा प्रेशर नहीं बन पाता है।
  • मरीज के खानपान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, मिनरल पौष्टिक तत्वों से भरपूर डाइट देनी जरूरी है।
    (डाॅ मोहसिन वली, सीनियर फिजीशियन, सर गंगा राम अस्पताल, दिल्ली)