थैलेसीमिया एक गंभीर रोग है। अनुवांशिक तौर पर बच्चों को माता-पिता से मिलने वाला यह रोग क्रोमोजोम में खराबी की वजह से बच्चे को होता है। यह रोग हो जाने पर बच्चे के जन्म के छह महीने बाद ही शरीर मे खून बनना बंद हो जाता है यानि हीमोग्लोबीन बनने की प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है। जिसके चलते बच्चे मे खून की कमी होने लगती है। और ऐसी स्थिती होने पर बच्चे को बार-बार बाहरी खून चढ़ाने की जरूरत होती है। यदि आप चाहते हैं कि आपके परिवार में किसी को यह बीमारी ना हो और दुर्भाग्यवश किसी को हो भी गयी है तो आपके लिए यह आवश्यक कि इस बीमारी से जुड़ी कुछ जरूरी बाते आपको पता होनी चाहिए। क्योंकि थैलेसीमिया रोग में आपकी जागरूकता ही इस बीमारी से असली बचाव है। 
 
लक्षण 
 
  • थैलेसीमिया से पीड़ित व्यक्ति या बच्चे में खून की कमी हो जाती  है। जिससे नाखून और जीभ दोनों पीली दिखने लगती है। 
  • बच्चे के जबड़े और गाल की बनावट असामान्य हो जाती है। 
  • बच्चे के शारीरिक विकास में रूकावट पैदा होने लगती हैं जैसे बच्चा अपनी उम्र से छोटा लगने लगता है, उसका चेहरा सूखा रहता है।
  • कमजोरी व थकान का निरंतर बने रहना। 
  • बच्चे को सांस लेने में तकलीफ होने लगती है साथ ही कभी-कभी बच्चे में पीलिया के लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं। 
डाॅक्टर की माने तो यदि कोई भी व्यक्ति अपने परिवार, रिश्तेदारों या फिर अपने जानने वाले किसी भी व्यक्ति में ऊपर बताए गए तीन से अधिक लक्षण देखे तो तुरंत डाॅक्टर के पास उस व्यक्ति को लेकर जाना चाहिए। या फिर उसे डाॅक्टर से मिलने की सलाह तो अवश्य देनी चाहिए। 
 
ऐसे बचाव करें इस बीमारी से
 
  • थैलेसीमिया से पीड़ित व्यक्ति को रेगुलर ब्लड टेस्ट करवाते रहना चाहिए। ताकि उसके खून में हीमोग्लोबिन का स्तर पता चलता रहे। 
  • इस बीमारी से बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि गर्भावस्था के दौरान तीसरे-चौथे महीने के अंदर गर्भ में पल रहे बच्चे का थैलेसीमिया का टेस्ट करा लें। 
  • शादी से पहले लड़की और लड़के का ब्लड टेस्ट जांच करवा लेना चाहिए। जिससे पता चल जाये कि उनकी हेल्थ एक दूसरे के अनुकूल है या नहीं। यदि टेस्ट में किसी एक में भी इस बीमारी का पता लगे तो उचित ट्रीटमेंट करा लेना चाहिए। क्योंकि शादी हो जाने पर उनके द्वारा पैदा की गई संतान में ये बीमारी होनी की संभावना अधिक हो जाती है।
 
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