Irrfan Khan on Ramadan: इरफान खान किसी भी पहचान के मोहताज नहीं हैं। जब उनका निधन हुआ था, तो सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री ही नहीं, बल्कि पूरा देश शोक में डूब गया था। उन्होंने अपने करियर में एक से बढ़कर एक बेहतरीन फिल्में दीं, जो आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा हैं। उनकी सादगी, गहराई से भरा अभिनय और जिंदगी को देखने का नजरिया उन्हें एक खास कलाकार बनाता है। रमजान को लेकर भी इरफान खान के विचार बेहद संजीदा और आध्यात्मिक थे, जो उनके व्यक्तित्व की गहराई को दर्शाते हैं।
रोजे पर क्या बोले थे इरफान खान?
साल 2016 में इरफान खान ने एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान अपने विचार रखे थे, जो काफी चर्चा में रहे थे। जयपुर में अपनी फिल्म मदारी के प्रमोशन के दौरान उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए रमजान में रखे जाने वाले रोजों और मुहर्रम में दी जाने वाली कुर्बानी पर सवाल उठाए थे।
इरफान का कहना था कि— “हमें धर्म के नाम पर सिर्फ रीति-रिवाज नहीं निभाने चाहिए, बल्कि उसके पीछे के असली मतलब को समझना चाहिए। रोजा सिर्फ भूखा रहने का नाम नहीं है, यह आत्म-निरीक्षण और आत्म-संयम का माध्यम होना चाहिए।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि— “मुहर्रम में हम सिर्फ ढोल-ताशे बजाते हैं, जबकि हमें उसकी असल भावना को समझने की जरूरत है।
” उनके इस बयान को लेकर काफी विवाद भी हुआ था, लेकिन इरफान ने अपने विचारों पर कायम रहते हुए कहा था कि उनका मकसद किसी की भावनाएं आहत करना नहीं, बल्कि लोगों को सोचने के लिए प्रेरित करना है।
रमजान में करना चाहिए ये काम

इरफान खान ने 2016 में रमजान और मोहर्रम को लेकर जो बातें कही थीं, वो उस वक्त काफी चर्चा में रहीं। उन्होंने कहा था कि— “रमजान में रोजा रखना एक परंपरा बनकर रह गया है, लेकिन इसका असली मकसद आत्म-निरीक्षण और आत्म-संयम होना चाहिए। भूखा रहना जरूरी नहीं, बल्कि खुद को भीतर से सुधारना जरूरी है।
मोहर्रम पर बात करते हुए उन्होंने कहा था— “मोहर्रम शोक का समय होता है, लेकिन हम मुसलमान इसमें ताजिया निकालकर, ढोल बजाकर जुलूस निकालते हैं। क्या यह शोक मनाने का तरीका है? यह उस बलिदान का मजाक है जो इस महीने की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में जुड़ा है।
इरफान का कहना था कि धर्म के कर्मकांडों को सिर्फ निभाने से कुछ नहीं होता, जब तक हम उनकी असल भावना को नहीं समझते। उनकी इन बातों को जहां कुछ लोगों ने “साहसी और सच्चा” कहा, वहीं कई धार्मिक संगठनों ने विरोध भी जताया था। चाहो तो इस विवाद के बाद उनके जवाब या सफाई पर भी जानकारी दे सकता हूँ।
मौलवियों ने की खिलाफत
इरफान खान के उस बयान के बाद जयपुर समेत देश के कई हिस्सों में मुस्लिम मौलवियों और धार्मिक संगठनों ने उनकी कड़ी निंदा की थी। मौलवियों ने कहा था कि इरफान को इस्लामिक रीति-रिवाज़ों और परंपराओं को सार्वजनिक मंच पर इस तरह से नहीं बोलना चाहिए, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हों।

बाद में, साल 2016 में टीवी पर राजदीप सरदेसाई के साथ इंटरव्यू में इरफान खान ने सफाई देते हुए कहा था कि उनका बयान पूरी तरह से व्यक्तिगत सोच पर आधारित था और इसका उनकी फिल्म मदारी के प्रमोशन से कोई लेना-देना नहीं था।
उन्होंने यह भी कहा कि उनका इरादा किसी की भावनाएं ठेस पहुंचाने का नहीं था, बल्कि केवल यह सवाल उठाना था कि क्या हम अपने धर्म को आत्मनिरीक्षण और सुधार के नजरिए से भी देख सकते हैं? इरफान ने यह भी कहा था कि वे जानबूझकर कोई विवाद नहीं खड़ा करना चाहते, लेकिन अगर किसी बात से चर्चा होती है और सोचने-समझने का मौका मिलता है, तो उसमें कोई बुराई नहीं है।
खुले विचारो वाले थे इफ़रान
इरफान खान वाकई में खुले विचारों वाले और आत्मचिंतन करने वाले कलाकार थे। उन्होंने धर्म और परंपराओं को भी एक सोचने-समझने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा। उस इंटरव्यू में उन्होंने साफ कहा था कि— “कई बार कुछ चीज़ें हमारे साथ बस इसलिए होती हैं क्योंकि वो सदियों से चली आ रही हैं।

लेकिन जब तक हम उनका गहराई से विश्लेषण नहीं करते, जब तक हम यह नहीं समझते कि उन परंपराओं के पीछे असल मकसद क्या है—तो वो सिर्फ एक रस्म बनकर रह जाती हैं।” इरफान का मानना था कि धार्मिक या सामाजिक प्रथाओं का उद्देश्य आत्ममुक्ति, आत्मचिंतन और एक गहरी समझ होनी चाहिए, न कि केवल दिखावे या परंपरा के नाम पर उनका पालन करना। उनके विचारों ने न केवल उन्हें एक संवेदनशील अभिनेता बनाया, बल्कि एक ऐसा इंसान भी जो चीजों को सिर्फ मानने के बजाय समझने की कोशिश करता था।
