mumtaz with vayjatimala
Mumtaz reveals Vyjayanthimala

Summary: मेलजोल होता ही था उस जमाने में

मुमताज के मुताबिक उस समय का माहौल ही ऐसा था। सीनियर कलाकार नए लोगों से ज़्यादा मेलजोल नहीं रखते थे।

Mumtaz reveals Vyjayanthimala: एक दौर था जब बॉलीवुड की दुनिया पर वहीदा रहमान, वैजयंतीमाला और बाद में मुमताज जैसी अभिनेत्रियों का राज हुआ करता था। ये वो महिलाएं थीं जिन्होंने हिंदी सिनेमा के सुनहरे युग को अपनी अदाओं, शालीनता और ग्लैमर से ऊंचाइयां दीं। लेकिन इन चमकते पर्दों और सदाबहार गीतों के पीछे कुछ ऐसी कहानियां भी थीं जो कई ऐसी बातें बयां करती हैं जिन्हें हम फिल्मी दुनिया में आज भी देखते हैं।

एक पुराने इंटरव्यू में मुमताज ने डॉन न्यूज से बात की थी। मुमताज ने अपने उन शुरुआती दिनों को याद किया जब वह फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही थीं और चारों ओर स्थापित सितारों का दबदबा था। उनके सच्चे और साफ शब्दों ने उस दौर की शोहरत के पीछे छिपे मानवीय पहलू को उजागर किया। मुमताज ने अपने करियर की शुरुआत किशोर उम्र में ‘सोने की चिड़िया’ से की थी। यह फिल्म 1958 में रिलीज हुई थी। फिर वे आगे चलकर 60 और 70 के दशक की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्रियों में से एक बन गईं। दो रास्ते, खिलौना और आप की कसम जैसी सुपरहिट फिल्मों से उन्होंने लोगों के दिलों में खास जगह बनाई।

फिर भी, उन्होंने कभी अपने शुरुआती संघर्ष के दिनों को नहीं भुलाया। मुमताज को वो दिन हमेशा याद रहे जब सेट पर उन्हें असमानता और दूरी का अहसास दिलाया जाता था। जब उनसे पूछा गया कि अपने समय की दूसरी एक्ट्रेस और सीनियर्स के साथ उनका रिश्ता कैसा था, तो उन्होंने बहुत ईमानदारी से जवाब दिया। वे बताती हैं, “वो लोग बहुत बड़े थे और हम तो छोटे थे। वो हम लोगों से घुलते-मिलते नहीं थे।” लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि कुछ अपवाद जरूर थे, “वहीदा जी बहुत ही डाउन टू अर्थ थीं। वैजयंतीमाला जी भी उसी दौर की थीं, पर उन्होंने मुझसे कभी बात नहीं की।”

mumtaz with Dev Anand
mumtaz with Dev Anand

मुमताज ने आगे बताया कि यह बात किसी दुश्मनी या नफरत की नहीं थी, बल्कि उस समय का माहौल ही ऐसा था। सीनियर कलाकार नए लोगों से ज़्यादा मेलजोल नहीं रखते थे। उन्होंने कहा “कुछ लोग अपने से छोटे या कम प्रसिद्ध लोगों से बात नहीं करना चाहते थे। कुछ तो सड़क पर भी ऑटोग्राफ देने से बचते थे।”

वक्त के साथ मुमताज ने अपनी मेहनत और प्रतिभा से इंडस्ट्री में न सिर्फ पहचान बनाई बल्कि अपने भरोसेमंद दोस्तों का भी एक सर्कल तैयार किया। सफलता ने मुमताज को अच्छे दिन दिखाए। उनकी फिल्में हिट होती गईं तो लोग उनके पास आने लगे। वो उस दौर को भी याद रखती है जब इज्जत अफजाई नसीब हुई। उन्होंने बताया, “धीरे-धीरे जब मेरी जगह बनी, तब मैंने भी दोस्त बनाए। अंजू महेंद्रू और पूनम सिन्हा आज भी मेरी बहुत अच्छी सहेलियां हैं। एक दौर ऐसा आया था कि इंडस्ट्री में सब मुझसे बात किया करते थे। ” मुमताज की यह बात उस दौर की सच्चाई को बखूबी दिखाती है कि ग्लैमर की इस चमकदार दुनिया में भी, इंसानियत और अपनापन सबसे कीमती चीज थी।

ढाई दशक से पत्रकारिता में हैं। दैनिक भास्कर, नई दुनिया और जागरण में कई वर्षों तक काम किया। हर हफ्ते 'पहले दिन पहले शो' का अगर कोई रिकॉर्ड होता तो शायद इनके नाम होता। 2001 से अभी तक यह क्रम जारी है और विभिन्न प्लेटफॉर्म के लिए फिल्म समीक्षा...