Javed Akhtar Struggle Story
Javed Akhtar Struggle Story

Overview: "मैडम के जूते लाओ!" जावेद अख्तर ने बताया पुराना फिल्मी सिस्टम

जावेद अख्तर ने खुलासा किया कि उनके शुरुआती दिनों में असिस्टेंट डायरेक्टर्स के साथ नौकरों जैसा व्यवहार होता था। उन्हें कलाकारों के जूते उठाने और चाय लाने जैसे काम करने पड़ते थे। जावेद साहब ने आज के बदलते सिनेमाई माहौल की तारीफ की, जहाँ सहायकों को उचित सम्मान मिलता है।

Javed Akhtar Struggle Story: आज जावेद अख्तर बॉलीवुड के सबसे सम्मानित नामों में से एक हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब उन्हें फिल्म सेट पर बेहद छोटे और कभी-कभी ‘अपमानजनक’ माने जाने वाले काम करने पड़ते थे। उन्होंने बताया कि उस दौर में असिस्टेंट डायरेक्टर्स को ‘क्रिएटिव माइंड’ नहीं, बल्कि ‘नौकर’ समझा जाता था।

“मैडम के जूते लाओ”,असिस्टेंट नहीं, हेल्पर थे

जावेद अख्तर ने बताया कि जब उन्होंने करियर की शुरुआत की थी, तब असिस्टेंट डायरेक्टर की नौकरी का मतलब सिर्फ फिल्म मेकिंग सीखना नहीं था। उन्होंने कहा, “हमसे ऐसे काम कराए जाते थे जिनका फिल्मों से कोई लेना-देना नहीं था। सीनियर हमसे कहते थे—जाओ मैडम के जूते लेकर आओ, या साहब का कोट उठाओ।” जावेद साहब के अनुसार, उस समय सहायक निर्देशकों को कोई सम्मान नहीं मिलता था और उन्हें सेट पर ‘छोटू’ या ‘लड़के’ की तरह ट्रीट किया जाता था।

क्रिएटिविटी पर पाबंदी

जावेद अख्तर ने उस दौर की कड़वी सच्चाई बताते हुए कहा कि अगर कोई असिस्टेंट अपना सुझाव देने की कोशिश भी करता, तो उसे चुप करा दिया जाता था। “हम स्क्रिप्ट या सीन पर बात नहीं कर सकते थे। हमारा काम बस क्लैप पकड़ना, चाय लाना या एक्टर्स की निजी जरूरतों को पूरा करना था।” उन्होंने बताया कि इसी अपमान और संघर्ष ने उनके अंदर कुछ बड़ा करने की आग पैदा की, ताकि एक दिन लोग उनकी बात सुनने को मजबूर हों।

Javed Akhtar's outspokenness
Javed Akhtar’s outspokenness

आज के दौर से तुलना

जावेद अख्तर ने खुशी जताई कि आज समय बदल गया है। उन्होंने कहा कि आज के असिस्टेंट डायरेक्टर्स पढ़े-लिखे होते हैं, वे तकनीकी रूप से सक्षम हैं और निर्देशक उनकी राय को महत्व देते हैं। आज सेट पर ADs की एक पूरी टीम होती है जिनका काम बंटा हुआ होता है और उन्हें ‘क्रिएटिव प्रोफेशनल’ के तौर पर देखा जाता है।

सलीम-जावेद की जोड़ी और बदलाव

जावेद अख्तर ने जिक्र किया कि जब उन्होंने सलीम खान के साथ जोड़ी बनाई, तब उन्होंने लेखकों और क्रिएटर के सम्मान के लिए लड़ाई लड़ी। उन्होंने ही पोस्टर पर लेखकों के नाम देने की परंपरा शुरू करवाई, जिससे आने वाली पीढ़ी (ADs और राइटर्स) के लिए रास्ते आसान हुए।

“जो हमने सहा, वो अब नहीं”

जावेद साहब ने अंत में कहा कि वह अपने उन दिनों को भूलते नहीं हैं क्योंकि उन्हीं दिनों ने उन्हें ज़मीन से जुड़े रहना सिखाया। हालांकि, वह इस बात से राहत महसूस करते हैं कि आज के युवाओं को ‘जूते उठाने’ जैसे काम नहीं करने पड़ते।

मैं रिचा मिश्रा तिवारी पिछले 12 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हूं। विभिन्न न्यूज चैनल के साथ काम करने के अलावा मैंने पीआर और सेलिब्रिटी मैनेजमेंट का काम भी किया है। इतने सालों में मैंने डायमंड पब्लिकेशंस/गृह लक्ष्मी, फर्स्ट...