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गृहलक्ष्मी अप्रैल २०१६
साक्षात्कार
जहां देश में स्त्री सशक्तिकरण का बोलबाला है, वहीं महिला अत्याचार की खबरें भी। स्त्री सशक्तिकरण लहर में बढते महिला अत्याचारों की रोकथाम के लिए क्या अपील करेंगी?
भारतीय समाज के लिए महिलाओं पर हो रहे अत्याचार अशोभनीय और अवांछनीय हैं। लेकिन यह कहने मात्र से बात नहीं बनेगी। मात्र अत्याचारियों को दोष देने से हमारे दायित्व की पूर्ति नहीं होगी। देखना यह है कि आखिर अत्याचार होता क्यों है? हमारी शिक्षा-दीक्षा में क्या कमी है? हम युवाओं के आगे क्या परोस रहे हैं? स्कूल से लेकर महाविद्यालय तक पाठ्यक्रमों में नैतिक शिक्षा का अभाव है। ‘सादा जीवन, उच्च विचार का सिद्धांत ढूंढऩे से भी नहीं मिलता। महिलाओं पर अत्याचार करने वाले नौजवान मानसिक बीमारी के शिकार हैं। इन बीमारियों के कीड़े कहां उत्पन्न होते हैं? गहराई से इन अशोभनीय कृत्यों पर काबू पाने के प्रयास होने चाहिए।
देश में महिला अधिकारों की लड़ाई में सरकार का रवैया प्रशंसनीय क्यों नहीं है? महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण का मामला संसद से पास क्यों नहीं हो पाया है?
1996 के लोकसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा पत्रों में विधानसभा और लोकसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के संकल्प लिए गए थे। तब से हर चुनाव के पूर्व वह संकल्प दोहराया जाता है। महिलाओं के सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने भी ढेर सारे प्रस्ताव पारित किए। आंदोलन हुआ। इस बार संसद में महिला सदस्यों की संख्या तीन सौ पैंतीस है। इस बार तो किसी अन्य दल से समर्थन व सहयोग लेने की भी आवश्यकता नहीं है। इसलिए आशा की जा सकती है कि इस बार लोकसभा में भी इस विधेयक को पारित करा लिया जाएगा। देर आयद, दुरुस्त आयद की स्थिति बनेगी।
वर्तमान समय में साहित्य में अश्लीलता परोसी जा रही है। स्त्री विमर्श के नाम पर कई बोल्ड लेखिकाओं ने महिला की छिछली, बोल्ड परिभाषा गढ़ी है। साहित्य में ऐसे महिला विमर्श से क्या आप सहमत हैं?
जिस मायने में महिला विमर्श की चर्चा होती है, मैं उसमें विश्वास नहीं करती हूं। दरअसल, परिवार के घटक स्त्री, पुरुष, बच्चे और वृद्ध हैं। सेवक-सेविकाएं भी। इसलिए इनका अलग-अलग विमर्श नहीं हो सकता। अलग-अलग करके उनकी समस्याओं को देखा जा सकता है, लेकिन उनके समाधान में चारों घटकों को लगाना होगा। समाज और सरकार भी। मैं उस महिला विमर्श से सहमत नहीं हूं, जो स्त्री को परिवार से अलग करके खड़ा करता है और फिर उसकी समस्याओं का आकलन करता है। स्त्री सशक्तिकरण, पुरुष सशक्तिकरण, बच्चा सशक्तिकरण, और वृद्ध सशक्तिकरण नहीं, परिवार सशक्तिकरण के उपाय ढूंढऩे चाहिए। तभी समस्याओं का सही विवेचन और समाधान होगा।
साहित्य सत्य का प्रतिबिंब है, तो राजनीति मीठा जहर। आप आला दर्जे की साहित्यकार के अलावा बेहतर राजनीतिज्ञ भी हैैं। इन दोनों स्वरूपों के साथ न्याय कैसे करती हैं?
साहित्य तो सत्यम, शिवम सुन्दरम से ओत-प्रोत होना ही चाहिए। राजनीति का भी वही उद्देश्य है। संस्कारी मनुष्य, परिवार और समाज की रचना करना साहित्य का उद्देश्य है। साहित्य समाज की ऐसी रचना में राजनीति का भी महत्वपूर्ण योगदान है। समाज को सुखी और संपन्न, व्यक्ति को शिक्षित और समर्थ बनाना राजनीति का लक्ष्य है। राजनीति और साहित्य दूर-दूर नहीं है। समाज में यदि नैतिक मूल्यों का ह्रास होता है, तो साहित्यकार और राजनीति भी प्रभावित होती है। दोनों के प्रभावित होने से समाज अवनति की ओर ही जाता है। उसी समाज में ऐसे साहित्यकार और राजनैतिक नेता उत्पन्न होते हैं, जो अपनी पुरातन संस्कृति के अनुकूल समाज को ले जाने का संकल्प लेते हैं। हमारे समाज में ऐसे कालजयी साहित्यकारों और नेताओं की कमी नहीं, जो आज भी समाज के लिए अनुकरणीय हैं।
आप साहित्य और राजनीति में बराबर सक्रिय हैं। अधिक रुझान किस ओर है?
जिस पर अधिक जिम्मेदारियां रहती हैं, उसे अपने कामों के बीच सामंजस्य बिठाना पड़ता है। सख्ती से पालन करना पड़ता है। फिर सभी जिम्मेदारियां पूरी होती रहती हैं। समय के नियोजन से मैं सामंजस्य बिठा लेती हूं।
कुछेक बरस से जनता आपके नए रूप से मुखातिब हुई है। क्या आम आदमी से उनकी भाषा शैली में बतियाने के पीछे आपकी सियासी रणनीति है?
सियासी रणनीति बिल्कुल नहीं। बचपन से ही कहावतों को सुनती आई हूं। उम्र बढऩे के साथ स्वयं प्रयोग करने लगी। मेरे बच्चे भी इन कहावतों का प्रयोग करते हैं। अमेरिका में रह रहे दोनों बच्चों के मुख से परिस्थितिवश कहावतें उच्चरित हो जाती हैं। मुझे सुनकर सुखद लगता है। मानो उनमें मेरी दादी-नानी, चाचा-चाची और मां जीवित हैं और वे भी अमेरिका पहुंच गए। ये कहावतें अपने आप में समय के दस्तावेज हैं। पुराना समय इन कहावतों के साथ वर्तमान हो जाता है। साथ में ढेर सारी सीखें भी।
मृदुला सिन्हा
