अभी जीवन बाकी है

उम्र जो भी हो, शुरुआत करने से न डरें –मेघना कामदार (सिलेब्रिटी शेफ होस्ट एंड यू-ट्यूब कंटेंट क्रिएटर)

शेफ मेघना की कहानी बताती है कि लाइफ में कुछ भी नया शुरू करने के लिए कभी देर नहीं होती। नए रास्तों पर चलकर भी आप अपनी पहचान बना सकते हैं, बस इसके लिए जोश और जज़्बा दोनों होना चाहिए। इस साल मेघना ने बतौर इंस्टाग्राम ऑफ द ईयर लिविंग फूड्स एपिक्यूरियन गिल्ड अवॉर्ड 2019 जीता है। वो टेड एक्स की वक्ता भी हैं और महिलाओं के विकास के लिए सभी मंच पर खुलकर बोलती हैं।

बैंकिग छोड़ जुड़ी कुकिंग की दुनिया से

मेघना ने चौदह साल बैंकिंग जगत में काम करने के बाद 37 साल की उम्र में कुकिंग में कुछ करने का मन बनाया और आज ‘यू-ट्यूबÓ पर उनके चैनल ‘मैघनाज़ फूड मैजिकÓ के 2 मिलियन से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। मेघना को कुकिंग का शौक बचपन से ही नहीं था। शादी के बाद भी वो ज्यादातर खाने के लिए टिफिन मंगाया करती थी। कुकिंग से अपना रिश्ता समझाते हुए उन्होंने बताया कि कैसे शादी के बाद उन्होंने कुकर में बिना पानी डाले ही चावल और दाल डाला था और कुकर ब्लास्ट हो गया था।

घर के खाने की चाहत से हुई शुरुआत

मेघना बताती हैं कि बचपन से ही उन्हें किचन में घुसने की रुचि नहीं थी। शादी के बाद भी जब परिवार की सहायता के लिए उन्हें जॉब करनी पड़ी तो कई रातें जब टिफिन भेजने वाली मैम छुट्टी लेती, तो वो और उनके पति मुंबई के स्ट्रीट फूड पर ही रह जाते। लेकिन जब इन दोनों ने परिवार शुरू करने की सोची और प्रेगनेंसी के दौरान मेघना को घर के खाने की तलब लगने लगी तो शुरू हुआ खाना बनाने का सिलसिला और मां बनने के बाद भी ये सिलसिला चलता रहा।

बेटी के लिए सीखा बेकिंग 

मेघना को कुकिंग में ज्यादा मज़ा तब आने लगा जब उन्होंने बेकिंग शुरू की। मेघना बताती हैं कि जब बेटी स्कूल जाने लगी तो अचानक मैंने महसूस किया कि बेटी हमेशा जंक फूड खाना जैसे- केक, पेस्ट्री, पास्ता, पिज्जा पसंद करती है। इस एहसास के साथ मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने अंदर की मां को झकझोर दिया और मैंने बेकिंग सीखने की ठान ली। बेकिंग, लो ऑयल कुकिंग जैसी क्लासेज़ शुरू की और अपने इस पैशन को प्रोफेशन बना लिया। मैंने कुकिंग क्लासेस शुरू किया और साथ में पार्टीज़ के लिए डिज़ाइनर केक्स के ऑर्डर भी लेना शुरू कर दिया। पैशन बना ये प्रोफेशन जितना सफल हो रहा था, मेघना भी इसे बढ़ाने के लिए और मेहनत कर रही थी। उन्होंने कई अंतर्राष्ट्रीय एक्सपर्ट्स से कुकिंग सीखा और इस काम में उनके पति ने उन्हें पूरा सहयोग दिया। इसी दौरान उन्हें सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के बारे में सोचा और आज वो एक सफल यू ट्यूबर हैं।

बैंकिंग से सीखा अनुशासन

मैंने अपने बैंकिंग करियर से जो अनुशासन सीखा है वह मेरे लिए आज भी काम आता है। इतना ही नहीं, बैंकिंग के दौरान ही मैंने सीखा कि हर किसी का, फिर चाहे वो कितने ही बड़े पोस्ट पर हो या छोटे, सम्मान करना चाहिए और ये बात अब मेरे मन में बिलकुल रच बस गया है कि टीम में या मेरे आस-पास जो भी लोग हैं, सबको मुझे इज्जत देनी है। किसी को भी छोटा नहीं समझना है। अनुशासन को ध्यान में रखते हुए और कड़ी मेहनत और लगन से सबका दिल आखिरकर जीत ही लिया।

उम्र को रुकावट न समझें

मैं हर महिला से सिर्फ यही कहना चाहती हूं कि उम्र को रुकावट न समझें। मैं जब 37 साल की थी तो मैंने ये बिज़नेस शुरू किया था, शुरुआत में मैं लगभग असफल सी ही रही, फिर से शुरुआत की और आज 40 साल की उम्र में मेरे 2 मिलियन फॉलोअर्स हैं। अपने व्यक्तित्व पर मेहनत करें और कुछ नया सीखें। वो काम करें, जो आप करना चाहती हैं, याद रखें कि सिर्फ आपके परिवार को आपकी जरूरत नहीं है, अपने लिए भी जिएं, अपने सपनों को पूरा करें। दूसरों के लिए अपने सपनों को नज़र अंदाज ना करें। दिल-दिमाग से यह बात निकाल फेंके कि आप उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां आप कुछ नया करेंगे तो आपका मजाक बनेगा। मैं बस इतना सोचती हूं कि जो अच्छा लगे बेझिझक करें, बिना शर्म करें और अपनी एक अलग पहचान बनाएं।

सिर्फ खेल तक नहीं रखा खुद को सीमित –अंजुम चोपड़ा (क्रिकेट विश्लेषक)

अगर बात महिला क्रिकेट की हो तो अंजुम चोपड़ा का नाम जरूर आता है। भारतीय क्रिकेट टीम की पूर्व स्किपर रह चुकी अंजुम आज क्रिकेट विश्लेषक हैं और देश की पहली महिला क्रिकेट प्रसारण प्रस्तुतकर्ता भी हैं। 

छोटी उम्र में की शुरुआत

खिलाड़ियों के परिवार में जन्मी अंजुम बचपन से ही घर में सभी को क्रिकेट खेलते देख रही थी और उनका इस खेल में रुचि होना उनके लिए स्वभाविक था। लेकिन घरवालों के बीच गार्डन में खेलना और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देश के लिए खेलना अलग बातें है। ये पूछने पर कि खेलने की शुरुआत कैसे की, अंजुम कहती हैं कि अगर वो नहीं खेलती तो ज्यादा आश्चर्यजनक होता क्योंकि परिवार में सभी क्रिकेट से जुड़े थे। थोड़ा जोर देने पर बताती हैं कि कैसे उनकी मम्मी को जब जानकारी मिली कि बच्चों के लिए क्रिकेट का ट्रेनिंग कैम्प लगाया गया है तो उन्होंने दोनों भाई-बहनों को तैयार किया और वहां ले गई। वो कहती हैं, बस उसी दिन से मेरा खेलना शुरू हो गया।

मिलें हैं कई सम्मान

अपने सत्रह साल के लंबे करियर में अंजुम ने कई सम्मान कमाए हैं। साल 2014 में अंजुम को ‘पद्मश्रीÓ से नवाज़ा गया था और साल 2006 में उन्हें ‘अर्जुन अवॉर्डÓ से भी सम्मानित किया जा चुका है। वो देश के महान टेस्ट स्किपरों में से एक हैं। वो पहली ऐसी महिला क्रिकेटर हैं, जिन्हें लंदन के क्रिकेट क्लब एमसीसी ने अपनी सदस्यता से सम्मानित किया है। इतना ही नहीं, दिल्ली में भी इस खेल के प्रति उनकी लगन और योगदान को देखते हुए दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन ने फिरोज़ शाह कोटला स्टेडियम के एक गेट का नाम भी अंजुम चोपड़ा रखा है।

सबको खेलना ही चाहिए

अंजुम का मानना है कि खेलने से लाइफ में अनुशासन आता है और इसलिए ये हर किसी को स्पोर्ट्स में थोड़ी बहुत रुचि रखनी चाहिए। ये बातें सिर्फ दिमाग में पलती हैं कि पीरियड्स के दौरान कैसे फील्ड पर उछलना कूदना होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। एक महिला के शरीर में हार्मोनल बदलाव आते रहते हैं, लेकिन अगर आप खेलते रहेंगे, खान पान सही हो, योग एक्सरसाइज़ करते रहें तो कोई समस्या नहीं होती है। 

क्रिकेट के साथ भी बहुत कुछ

लेकिन वो यही पर नहीं रुकी, उन्होंने ‘वूमेन्स क्रिकेट वर्ल्ड- अ जर्नी फ्राम 1945-2013Ó, नामक कॉफी टेबल बुक भी लिखी है, एक डॉक्यूड्रामा और एक रिएलिटी शो का हिस्सा भी रही हैं और साथ ही कई बड़ी कंपनियों से बतौर मोटिवेशनल स्पीकर और कंसल्टेन्ट तौर पर जुड़ी हैं। अंजुम से ये पूछिए कि वो इतना सब कैसे कर पाई और उनका जवाब बड़ा ही सिंपल था, लाइफ में हमेशा कुछ करते रहना चाहिए, घर-परिवार सबके साथ खुद भी हर अवसर को अपनाना चाहिए। अगर आपकी इच्छा होगी तो सब हो जाएगा। इंसान को अपनी इच्छा को कभी नहीं मारना चाहिए। हमेशा पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। ये नहीं सोचना चाहिए कि हम महिलाएं कुछ नहीं कर सकतीं बल्कि ये सोचना चाहिए कि हम वो सब कर रहे हैं, जिसके बारे में कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

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