फर्स्ट इनफोरमेशन रिपोर्ट, यानी एफआईआर किसी भी आपराधिक घटना के संबंध में कानूनी तौर पर उठाया गया पहला कदम है, जिसके अंतर्गत उस घटना की सूचना अपने क्षेत्र के पुलिस स्टेशन में कराई जाती है। एफआईआर पुलिस द्वारा दर्ज किया गया दस्तावेज़ है, जिसमें उस अपराध का सिलसिलेवार ब्यौरा होता है। किसी भी कानूनी कार्रवाई का यह पहला आधार होता है। साथ ही यह जानना भी ज़रूरी है कि देश के प्रत्येक नागरिक को इस बात का अधिकार है कि वह अपने से संबंधित किसी भी अपराध की एफआईआर करा सकता है। देश में तेजी से बढ़ते आपराधिक मामलों को ध्यान में रखते हुए एफआईआर (प्राथमिकी) के बारे में जागरूक होना सभी के लिए बेहद जरूरी है। जब भी, किसी भी प्रकार का अपराध, जैसे- चोरी, झगड़ा, मारपीट, बलात्कार या कोई अन्य अपराध होता है तो इन स्थितियों में एफआईआर दर्ज कराने से पहले 100 नंबर पर पुलिस को सूचित करने की जरूरत होती है।
इसके बाद सबसे पहले पुलिस घटनास्थल पर पहुंचकर हालात का जायज़ा लेती है और फिर संबंधित पक्षों को थाने पहुंचकर प्राथमिकी दर्ज करानी होती है। इस प्राथमिकी की दो कॉपी तैयार होती हैं, जिनमें से एक शिकायत दर्ज कराने वाले व्यक्ति को दी जाती है।
क्या है एमएलसी
इस बात की जानकारी होना भी बहुत ज़रूरी है कि कई आपराधिक मामलों में मेडिको लीगल सर्टिफिकेट (एमएलसी) बेहद ज़रूरी होता है। इसमें यह बताया जाता है कि पीडि़त को कितनी चोट लगी है। फिर इसी रिपोर्ट के आधार पर धाराएं लगाई जाती हैं। शारीरिक हिंसा और बलात्कार के मामले में भी एमएलसी के आधार पर ही धाराएं लगाई जाती हैं। यदि मामला बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का हो तो पीडि़ता को मुफ्त उपचार भी साथ-साथ ही मुहैया कराया जाता है। इस तरह के मामले में बहुत अधिक संवेदनशीलता की ज़रूरत होती है, क्योंकि इस जांच के बाद ही पीड़िता इंसाफ के लिए कानूनी तौर पर कदम आगे बढ़ा सकती है। यौन अपराधों के जितने जघन्यतम मामले इस समय पर सामने आ रहे हैं, उसका कारण यही है कि कानूनी प्रक्रिया सही समय और सही स्वरूप में न होने से अपराधी इसे मखौल समझकर बच निकलते हैं और प्रभावित वर्ग देश की कानून व्यवस्था में अपना विश्वास खो देता है।
शिकायत दर्ज करने से इंकार नहीं कर सकता थाना
यदि कोई पुलिस थाना एफआईआर दर्ज करने से इंकार करता है या टालमटोल करता है तो संबंधित एसएचओ तक के खिलाफ भी सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
बड़ी राहत है ज़ीरो एफआईआर
निर्भया कांड के बाद ‘जीरो एफआईआर’ की सुविधा भी शुरू की गई है, जिसके तहत पीडि़त पक्ष अपने क्षेत्र के थाने के अलावा किसी अन्य थाने में भी शिकायत दर्ज करा सकता है, भले ही घटना उस क्षेत्र में नहीं हुई हो।
ऑनलाइन
मोबाइल या वॉलेट चोरी समेत कई मामलों में ऑनलाइन एफआईआर भी दर्ज कराई जा सकती है। इसमें संबंधित राज्य के पुलिस विभाग की वेबसाइट पर शिकायत ऑनलाइन भी दर्ज करा सकते हैं।
जानिए अपने अधिकार
- जब एफआईआर दर्ज कराई जा रही हो तो सही, सटीक व सच्ची जानकारी देना अपना फर्ज समझें, क्योंकि ये सूचनाएं गलत होने पर आपको भी कानूनी कार्रवाई का शिकार होना पड़ सकता है।
- प्रत्येक व्यक्ति का यह अधिकार बनता है और कोई भी पुलिसकर्मी ऐसा करने से इंकार नहीं कर सकता।
- एफआईआर पीडि़त या उसके परिवार अथवा परिचित द्वारा किसी आपराधिक घटना के विषय में लिया गया पहला कदम है।
- यदि पीडि़त अपनी बात लिखकर दे पाने में सक्षम नहीं है तो वह पुलिसकर्मी को मौखिक रूप से, यानी बोलकर अपनी बात लिखवा सकता है। रिपोर्ट लिखवा लेने के बाद उस व्यक्ति का यह अधिकार बनता है कि वह उस रिपोर्ट पर साइन करने से पहले उसे पढ़कर सुनाने के लिए कह सकता है। बिना पढ़े साइन करने या अंगूठा लगाने पर दबाव नहीं डाल सकता।

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