Posted inहिंदी कहानियाँ

अकेली लड़की – गृहलक्ष्मी की कहानियां

अकेली लड़की – रूबीना का रिजर्वेशन जिस बोगी में था, उसमें लगभग सभी लड़के ही थे । टॉयलेट जाने के बहाने रुबिना पूरी बोगी घूम आई थी, मुश्किल से दो या तीन औरतें होंगी । मन अनजाने भय से काँप सा गया । पहली बार अकेली सफर कर रही थी, इसलिये पहले से ही घबराई […]

Posted inखाना खज़ाना

बिना कपड़ों के ही रखा

बचपन से ही मेरी आदत थी कि मैं बिना सोचे-समझे किसी भी बात को बोल दिया करती थी। मम्मी के कई बार समझाने पर भी मेरी आदत नहीं छूटी। शादी होकर मैं ससुराल गई।

Posted inफिटनेस, हेल्थ

नन्हे मुन्नों संग करनी हो शापिंग, तो रखें इन बातों का ख्याल

बच्चे हमारी पूंजी है, वो जीवन में अगर आगे बढ़ते हैं यां फिर कुछ नया सीखते हैं, तो उसकी सबसे ज्यादा खुशी माता पिता को ही होती है। ऐसे में अगर हम शॉपिंग की बात करें, तो बच्चों को अपने साथ ज़रूर ले जाएं और उनके साथ को परेशानी की बजाय मस्ती समझे। उन्हें आप अपने साथ समय बिताने का मौका दें, ताकि वे आपसे शॉपिंग के मैनर्स भली भांति सीख पाएं। इसके अलावा वो आपसे अच्छा बान्ड भी शेयर करने लगेंगे। साथ ही साथ शॉपिंग के दौरान उन्हें कई नई चीजों की जानकारी भी मिलेगी, जिनसे वे अनभिज्ञ थे।

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क्या क्या बनाया है बीवी ने – गृहलक्ष्मी कविता

वो कहती है बनाने में घण्टों लगते है… और खाने में पल भर … कभी कुछ बड़े जतन से बनाती है… सुबह से तैयारी करके… कभी कुछ धुप में सुखा के… तो कभी कुछ पानी में भिगो के… कभी मसालेदार.. तो कभी गुड़ सी मीठी… सारे स्वाद समेट लेती हैं … आलू के पराठों में, […]

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लोका समस्ता सुखिनो भवंतु से बिखरेंगी खुशियां

महिला दिवस के अवसर पर डी रिकॉर्ड्स ने गर्व के साथ एक सिंगल टाइटल “लोका समस्ता सुखिनो भवंतु” की घोषणा की। यह संस्कृत श्लोक एक सर्व-समावेशी और एक सर्वव्यापी छंद है, जिसका अर्थ है -सभी प्राणियों (पुरुष, महिला, बच्चे, जानवर, सभी) हर जगह खुश और आजाद रहें। “ यह गीत एक मंत्र है, जिसे तरन […]

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नशा – प्रेमचंद कहानियाँ

ईश्वरी एक बड़े जमींदार का लड़का था और मैं ग़रीब क्लर्क था, जिसके पास मेहनत-मजदूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी। हम दोनों में परस्पर बहसें होती रहती थीं। मैं ज़मींदार की बुराई करता, उन्हें हिंसक पशु और ख़ून चूसनेवाली जोंक और वृक्षों की चोटी पर फूलनेवाला बंझा कहता। वह ज़मींदारों का पक्ष लेता; पर स्वभावत: उसका पहलू कुछ कमज़ोर होता था, क्योंकि उसके ज़मीदारों के अनुकूल कोई दलील न थी।

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मानुष गंध – गृहलक्ष्मी लघुकथा

मैं अपनी धुन में सड़क पर चला जा रहा था तभी एक आवाज सुनाई दी-एक्सक्यूज मी, इस रोड का नाम क्या है? स्टेट बैंक की ब्रांच इसी रोड पर है?

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अरमानों की आहुति

शाम हो चुकीथी। ठंडी हवा चल रही थी। घर की खिड़कियों में पर लगे वो हल्के पीले रंग के पर्दे उड़ने लगे थे। बाहर बालकनी में लगे मनीप्लांट की बेल भी मानो हवा का आनंद ले रही हो। तुलसी का कोमल पौधा तेज़ हवा को सहन नहीं कर पा रहा था। तभी सुधाजी तेज क़दमों से आई और तुलसी के पौधे को भीतर ले गई।

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