निवारण की गृहस्थी बिलकुल साधारण ढंग की थी, उसमें काव्यरस नाममात्र को भी नहीं था। जीवन में इस रस की कोई आवश्यकता है, ऐसी बात उसके मन में कभी आई भी नहीं। जैसे परिचित पुरानी चप्पल-जोड़ी में दोनों पैर आराम से निश्चित भाव से प्रवेश करते हैं, उसी तरह इस पुरानी दुनिया में निवारण अपने […]
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महामाया – रवीन्द्रनाथ टैगोर
महामाया और राजीव लोचन दोनों का नदी किनारे एक भग्नमंदिर में साक्षात्कार हुआ। महामाया ने बिना कुछ बोले अपनी स्वाभाविक गंभीर दृष्टि कुछ भर्त्सना के भाव से राजीव पर डाली। उसका आशय यह था कि तुम किस साहस से आज असमय ही मुझे यहाँ बुला लाए हो। मैं अब तक तुम्हारी सब बातें सुनती चली […]
सुभा – रवीन्द्रनाथ टैगोर
जब कन्या का नाम सुभाषिणी रखा गया, तब कौन जानता था कि वह गूँगी होगी। उसकी दोनों बड़ी बहनों का नाम सुकेशिनी और सुहासिनी रखा गया था, अतः मेल के अनुरोध पर उसके पिता ने छोटी कन्या का नाम सुभाषिणी रखा। अब सब उसे संक्षेप में सुभा कहते। रीति-अनुसार छानबीन और अर्थ जुटाकर दोनों बड़ी […]
छुट्टी – रवीन्द्रनाथ टैगोर
बालकों के सरदार फटिक चक्रवर्ती के दिमाग़ में चट से एक नए विचार का उदय हुआ नदी के किनारे एक विशाल शाल की लकड़ी मस्तूल में रूपांतरित होने की प्रतीक्षा में पड़ा था; तय हुआ, उसको सब मिलकर लुढ़काते हुए ले चलेंगे। जिस व्यक्ति की लकड़ी है, उसे अपनी ज़रूरत के समय कितना विस्मय, खीझ […]
त्याग – रवीन्द्रनाथ टैगोर
फाल्गुन की प्रथम पूर्णिमा में आम्रमंजरी की सुगंध को लिये नव वसंत की हवा बह रही है। पुष्करिणी के किनारे एक पुराने लीची के पेड़ के घने पल्लवों के बीच से एक निद्राहीन अश्रांत पपीहे की पुकार मुखर्जी के घर के एक निद्राहीन शयनकक्ष में प्रवेश कर रही है। हेमंत कुछ चंचल भाव से कभी […]
कंकाल – रवीन्द्रनाथ टैगोर
हम तीन बाल्य साथी जिस कमरे में सोते थे, उसकी बग़ल के कमरे की दीवार पर एक पूरा नरकंकाल लटका हुआ था। रात को हवा में उसकी हड्डियाँ खट्खट् शब्द करतीं हिलती रहती। दिन के समय हम लोगों को उन हड्डियों को हिलाना-डुलाना पड़ता। तब हम पंडित महाशय से मेघनाद-वध और कैम्बल स्कूल के छात्र […]
मुन्ने की वापसी – रवीन्द्रनाथ टैगोर
पहले-पहल राइचरण जब मालिक के यहाँ नौकरी करने आया, तब उसकी उम्र बारह वर्ष की थी। जैसोर ज़िले में उसका घर था। लंबे बाल, बड़ी-बड़ी आँखें, साँवला, चिकना और छरहरा। जात से कायस्थ। उसके मालिक भी कायस्थ थे। मालिक के एक साल के बच्चे की देखभाल और पालन-पोषण में सहायता करना ही उसका प्रधान कर्त्तव्य […]
व्यवधान – रवीन्द्रनाथ टैगोर
रिश्ता मिलाकर देखने से वनमाली और हिमांशुमाली दोनों ममेरे-फुफेरे भाई हैं; वह भी बहुत हिसाब करने पर मिला। लेकिन ये दोनों ही परिवार काफ़ी समय से पड़ोसी हैं, बीच में केवल एक बग़ीचे का व्यवधान है, इसलिए इनका रिश्ता बहुत पास का न होने पर भी इनमें घनिष्ठता का अभाव नहीं है। वनमाली हिमांशु से […]
रामकन्हाई की मूर्खता – रवीन्द्रनाथ टैगोर
जो कहते हैं, गुरुचरण की मृत्यु के समय उसकी दूसरी घरवाली अंतःपुर में बैठकर ताश खेल रही थीं, वे विश्वनिन्दक हैं, वे तिल का ताड़ बनाते हैं। असल में गृहिणी उस समय एक पैर के ऊपर बैठी दूसरे पैर के घुटने को ठुड्डी तक उठा कच्ची इमली, हरी मिर्च और झींगा मछली की चपटी चच्चड़ी1 […]
राजर्षि – रवीन्द्रनाथ टैगोर
राजर्षि उपन्यास : एक परिचय “राजर्षि” एक उपन्यास है जो रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन और उनके साहित्यिक योगदान पर आधारित है। यह उपन्यास उनके सोच, उनके लेखन, और उनके विचारों को विस्तार से वर्णित करता है। “राजर्षि” कहानी उनके जीवन की ऊँचाइयों और गहराईयों को दर्शाती है, जैसे कि उनके साहित्यिक सफलताओं के पीछे की […]
