Abhishap by rajvansh Best Hindi Novel | Grehlakshmi
Abhishap by rajvansh

गोपीनाथ ने प्याला उठाकर चाय की चुस्की ली और आनंद से बोले- ‘निखिल चाहता है कि मैं अपनी कंपनी की एक शाखा नागपुर में भी खोल दूं और सरकारी ठेकों की ओर विशेष रूप से ध्यान दूं।’

आनंद ने कुछ न कहा। उनका ध्यान गोपीनाथ की बातों की ओर था भी नहीं। वह तो बड़ी बेचैनी से वॉल क्लॉक की सुइयों को देख रहा था। संध्या के साढ़े सात बज चुके थे और मनु अभी तक न लौटी थी।

अभिशाप नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

‘तुम क्या सोच रहे हो?’ आनंद को विचार मग्न देखकर गोपीनाथ फिर बोले।

‘सोच रहा था।’ आनंद ने प्याला उठाकर घूंट भरा और बोला- ‘यह जीवन वास्तव में एक पहेली से कम नहीं होता। और पहेली भी अनसुलझी। पूरा जीवन बीत जाए और न सुलझे।’

‘इस नाम के लोग कुछ अच्छे नहीं होते। पिछले वर्ष जो सुपरवाइजर मेरे पास था, उसका नाम भी जीवन ही था। बहुत धोखेबाज निकला-कारोबार चौपट कर दिया मेरा।’

‘मैं दूसरे जीवन की बात कह रहा हूं।’

‘होगा कोई-किन्तु ऐसे लोगों से सावधान ही रहना चाहिए।’ आनंद का दर्शन गोपीनाथ की समझ से बाहर था। उन्होंने प्याला खाली किया और उठकर चले गए।

आनंद उठकर खिड़की के समीप आ गया।

मन में अब भी उतनी ही बेचैनी थी।

सहसा एक गाड़ी कोठी के सामने रुकी। आनंद ने ध्यान से देखा-गाड़ी का द्वार खोलकर मनु बाहर निकली। वह कुछ क्षणों तक तो वहीं खड़ी गाड़ी के चालक से बातें करती रही और फिर अंदर आ गई।

गाड़ी चली गई।

आनंद पूर्ववत खिड़की के पास खड़ा रहा और तभी मुड़ा जब मनु ने कमरे में आकर उसे संबोधित किया- ‘हैलो आनंद!’ और इसके उपरांत अपना बैग रखकर वह बिस्तर पर लेट गई और बोली- ‘बहुत थक गई हूं यार! पूरे दो किलोमीटर तो पैदल चलना पड़ा। गुलाबी चौक पर ट्रैफिक जाम था। ऐसे में टैक्सी भी न मिली।’

‘संध्या कैसी है?’ आनंद ने समीप बैठकर पूछा और ध्यान से मनु का चेहरा देखने लगा। मनु के होंठों पर फूलों जैसी मुस्कुराहट थी। मानो वह अंदर-ही-अंदर किसी गीत की धुन गुनगुना रहा हो।

मनु ने करवट बदलकर उत्तर दिया- ‘उस चुड़ैल को हुआ ही क्या था।’

‘क्यों?’ तुम तो कहती थी कि वह बीमार है।’

‘बीमार नहीं थी-उसने मुझे मूर्ख बनाया था। वह तो मुझे गुलाबी बाग के समीप ही मिल गई थी।’

‘फिर।’

‘कहने लगी-मांडका चलते हैं।’

‘और फिर तुम दोनों मांडका चले गए।’

‘मेरा तो मन न था। किन्तु जब उसने हठ पकड़ी तो इंकार न कर सकी।’

‘यदि ऐसा था तो तुमने मुझे कहीं से फोन कर दिया होता।’

‘तुम क्या करते?’

‘हम भी मांडका घूम आते। सुना है-अच्छी जगह है।’

‘फिर कभी सही। पापा कहां हैं।’

‘अभी तो यहीं हैं।’

‘मुझे उनसे कुछ बातें करनी हैं।’ इतना कहकर मनु बिस्तर से उतर गई और द्वार की ओर बढ़ी। किन्तु एकाएक उसके कदम रुक गए और वह आनंद से बोली- ‘आनंद! क्या तुम अपने लिए एक गाड़ी नहीं खरीद सकते?’

आनंद उसके इस प्रश्न पर चौंका और करीब आकर बोला- ‘एकाएक गाड़ी की बात तुम्हें कैसे याद आ गई?’

‘पहले मेरे प्रश्न का उत्तर दो।’

‘तो उत्तर यह है कि मैं गाड़ी नहीं खरीद सकता। और दूसरा उत्तर यह है कि मुझे गाड़ी की आवश्यकता भी नहीं है।’

‘किन्तु मैं गाड़ी खरीदना चाहती हूं।’

‘पापा से मत कहना। उनके पास इतना पैसा नहीं कि तुम्हारे लिए गाड़ी खरीद सकें। और वैसे भी-तुम्हें जरूरत ही क्या है?’

‘पैसे का प्रबंध तुम नहीं कर सकते?’

‘समझने की कोशिश करो मनु! मेरा वेतन इतना नहीं कि उससे चार-पांच लाख की गाड़ी खरीदी जा सके।’

मनु ने कुछ न कहा और चलकर अपने पिता के कमरे में आ गई। गोपीनाथ उस समय एक रजिस्टर में कुछ लिख रहे थे। मनु ने वहां पहुंचकर रजिस्टर उनके सामने से हटा लिया और बोली- ‘छोड़िए न पापा! यह दिन-रात का जोड़-तोड़ ठीक नहीं होता।’

‘तुम तो घूमने गई थीं।’

‘अभी तो आई हूं। संध्या के साथ मांडका चली गई थी।’ इतना कहकर मनु बैठ गई और मेज पर झुकते हुए बोली- ‘पापा! मैं एक बहुत बड़ी उलझन में फंस गई हूं।’

‘उलझन-कैसी उलझन?’ गोपीनाथ चौंककर बोले।

‘मैंने एक गाड़ी खरीद ली है।’

‘क्या!’ गोपीनाथ उछल से पड़े और अविश्वास से बोले- ‘तुमने गाड़ी खरीद ली। मगर इतने रुपए?’

‘रुपए निखिल ने दिए हैं और गाड़ी भी उसी ने खरीदी है। दरअसल पापा! निखिल आपके लिए एक गाड़ी खरीदना चाहता था। आपको कंपनी के काम से इधर-उधर जाना पड़ता है। किन्तु निखिल जानता था कि आप उसकी दी हुई इतनी कीमती भेेंट को यों स्वीकार न करेंगे। अतः उसने गाड़ी मेरे नाम से खरीद ली और मुझसे यह भी बता दिया कि गाड़ी वास्तव में अंकल के लिए खरीदी गई है।’

‘यह लड़का तो सीमा से आगे बढ़ता जा रहा है।’

‘किन्तु पापा! उसके पास इतना इतना पैसा है कि उसके लिए चार-पांच लाख का कोई महत्त्व नहीं।’

‘यह तो मैं जानता हूं, लेकिन सोचना तो यह है कि हम उसके इन अहसानों का बदला कैसे चुका पाएंगे। तुम तो जानती हो कि वह मुझे साढ़े सात लाख पहले भी दे चुका है।’

‘ठीक है पापा!’ मनु उठकर बोली- ‘यदि आप ऐसा ही सोचते हैं तो मैं उससे कह दूंगी कि हमें उसकी गाड़ी की कोई जरूरत नहीं।’

‘नहीं! नहीं ऐसा न कहना। उसे बुरा लगेगा। कोई इतने स्नेह एवं अपनेपन से उपहार दे तो उसे लौटाना उचित नहीं।’

‘तो क्या?’

‘गाड़ी कहां है?’

गोपीनाथ ने उठकर पूछा।

‘अभी तो उसके स्टूडियो में खड़ी है। मैं यह सोचकर नहीं लाई थी कि कहीं आप बुरा न मान जाएं। आप कहें तो…।’

‘नहीं, जल्दी ठीक नहीं। मैं चाहता हूं कि निखिल स्वयं उस गाड़ी को लेकर यहां आए।’

‘फिर तो यह समझिए कि गाड़ी आ गई।’

‘क्या मतलब?’

‘निखिल कल सुबह स्वयं ही गाड़ी लेकर आएगा।’ मनु ने कहा। फिर एकाएक उसे किसी बात का ध्यान आया और वह गोपीनाथ से बोली- ‘लेकिन पापा! आप आनंद से यह न कहें कि यह गाड़ी हमें निक्की ने दी है। बल्कि आपको यह कहना है कि गाड़ी हमने स्वयं खरीदी है। मैं नहीं चाहती कि आनंद मेरे एवं निखिल के विषय में कुछ और सोच बैठे।’

‘मैं इस बात को जानता हूं।’

मनु फिर अपने कमरे में आ गई। आनंद उसे देखकर बोला- ‘पापा से कहा तो नहीं गाड़ी के विषय में?’

‘कह दिया और बात भी बन गई। हमारी गाड़ी कल सुबह घर आ जाएगी।’

‘आश्चर्य! इतनी जल्दी।’

‘गाड़ी खरीदने में देर ही कितनी लगती है। बस-पैसा होना चाहिए।’ कहकर मनु दर्पण के सामने आ गई और अपने बाल संवारने लगी।

‘और।’ आनंद बोला- ‘पैसा तो उन्हें मिल ही जाएगा।’

‘कौन देगा?’

‘शायद निखिल वर्मा।’ आनंद ने कहा और अपने शब्दों की प्रतिक्रिया जानने के लिए वह मनु की ओर देखने लगा।

मनु के चेहरे पर पल भर के लिए विचारों का तूफान-सा आया। किन्तु उसने तत्काल ही अपने आपको संभाल लिया और बोली- ‘पापा ने मुझसे इस संबंध में कुछ नहीं कहा।’

‘मुझसे पूछते तो मैं कहता कि यों ही किसी के उपकारों के नीचे दबना ठीक नहीं। लेने वाला देने वाले की नजरों में बहुत छोटा हो जाता है।’

‘यह सोचना पापा का काम है।’

‘तुम उनसे कह सकती हो।’

‘पापा को गाड़ी की जरूरत भी है।’

‘और शायद-तुम्हें भी।’ आनंद ने यह वाक्य पूरी गंभीरता से कहा था। मनु को शब्द चुभ गए।

किन्तु उसने कुछ न कहा और उसी समय आनंद बाहर चला गया।

बेसमेंट में ब्लू फिल्म की शूटिंग चल रही थी। एक जोड़ा काम-क्रीड़ा में लीन था। दाईं ओर ट्राली पर रखा कैमरा बार-बार आगे-पीछे सरक रहा था। उस समय निखिल भी वहीं था और कुर्सी पर बैठा सिगरेट के गहरे-गहरे कश खींच रहा था।

पाशा कैमरामैन के समीप खड़ा था।

एक शॉट पूरा हुआ।

पाशा के कहने पर शॉट दे रहा जोड़ा अलग हो गया। दोनों मेकअप रूम में चले गए।

निखिल ने खुश होकर पाशा से कहा- ‘शॉट बहुत अच्छा रहा।’

‘थैंक्यू सर!’

‘फिल्म दो दिन में पूरी हो जाएगी?’

‘कोशिश कर रहा हूं सर! वैसे एक बात है।’

‘वह क्या?’

‘स्क्रिप्ट ठीक नहीं।’

‘मिस्टर पाशा! इन फिल्मों में कहानी कौन देखता है। वैसे भी-हम ये फिल्में जिस बाजार में बेच रहे हैं-वहां हिन्दी कोई जानता नहीं। फिर भी जैसा आप उचित समझें।’

‘ठीक है सर! मैं देख लूंगा।’

‘दूसरा शॉट कब लेना है?’

‘ठीक एक घंटे बाद।’

‘सीन किस पर पिक्चराइज होगा?’

‘मधु और मनोज पर। जोड़ी अच्छी है।’

‘हूं-मिस्टर पाशा!’ एकाएक कुछ सोचकर निखिल बोला- ‘हमारे डिस्ट्रीब्यूटर मिस्टर खोसला का कहना है कि फिल्म की शूटिंग यदि आउटडोर हो तो अच्छा बिजनेस होगा।’

‘बात तो ठीक है सर! किन्तु आउटडोर शूटिंग में खतरे बहुत हैं। यहां तो हम किसी भी तरह के सीन फिल्मा सकते हैं-किन्तु बाहर निकलकर तो हमें बहुत कुछ देखना पड़ेगा।’

‘फिर ठीक है। स्टूडियो बनने तक जैसा चल रहा है-वैसा ही चलने दीजिए।’ इतना कहकर निखिल अपने कमरे में आ गया।

उसी समय फोन की घंटी बजी।

निखिल ने रिसीवर उठाया-बोला- ‘हैलो!’

‘निखिल! हम गोपीनाथ बोल रहे हैं।’

‘ओह! कहिए अंकल! कैसे हैं?’

‘यूं तो सब ठीक है, किन्तु एक बात हमारी समझ में नहीं आती। तुम यह गाड़ी किस खुशी में भेंट कर रहे हो?’

‘इसका मतलब है-मनु ने आपसे सब कुछ बता दिया है।’

‘हां-कह रही थी कि तुमने उसके लिए एक गाड़ी खरीदी है।’

‘अंकल! गाड़ी तो वह आपके लिए ही खरीदी गई है। सिर्फ उसके कागज मनु के नाम हैं। रही खुशी की बात-तो मेरे जीवन में तो हर पल ही खुशी का पल है। इंसान के अपने उसे भरपूर स्नेह देते रहें-खुशी की इससे बड़ी बात और कोई होती भी नहीं है। दरअसल-मैंने सोचा कि आप इस आयु में बसों में सफर करते हैं-इसलिए यह गाड़ी खरीद ली। गाड़ी तो आपके पास पहले भी थी। इसके अतिरिक्त-मनु भी कभी-कभी सैर-सपाटे के लिए जाती है। अतः सोचा कि उसकी खुशी भी पूरी हो जाएगी।’

‘निक्की! मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि तुम्हें क्या कहूं। देवता-अथवा देवताओं से भी बढ़कर। क्या नहीं किया तुमने मेरे लिए।’

निखिल यह सुनकर धीरे से हंस पड़ा और बोला- ‘आप भी कमाल करते हैं अंकल! आपने तो एक साधारण से व्यक्ति को देवता बना दिया। मगर ऐसा बिलकुल नहीं है। न तो मैं देवता हूं और न ही देवताओं से बढ़कर हूं। खैर-कल सुबह तो आप घर पर ही रहेंगे न?’

‘हां-ग्यारह बजे तक तो रहूंगा ही।’

‘मैं सुबह आपके पास आऊंगा।’

‘कल-किस समय?’

‘ठीक नौ बजे-आपकी गाड़ी के साथ। आप ये सब मनु को भी बता दीजिए।’

‘मनु तो शाम से ही गाड़ी देखने के लिए पागल हुई जा रही है।’

‘ऐसा ही होता है अंकल! अच्छा।’ निखिल ने कहा और मुस्कुराते हुए रिसीवर रख दिया।

रिसीवर रखते ही उसे अपने भाई अखिल के शब्द याद आ गए। अखिल की दृष्टि में दौलत कुछ भी नहीं थी और चरित्र ही सब कुछ था जबकि निखिल आज अपनी आंखों से दौलत के लिए चरित्र को बिकते देख रहा था। गोपीनाथ का उदाहरण उसके सामने था। एक समय वह था-जब गोपीनाथ उसकी सूरत से भी घृणा करते थे। वे सोचते थे कि जिस व्यक्ति के पास दौलत नहीं होती-उसके पात्र चरित्र भी नहीं होता। किन्तु आज स्थिति कुछ और थी। गोपीनाथ को आज उसके एवं मनु के मिलने पर कोई आपत्ति न थी जबकि गोपीनाथ यह भी जानते थे कि वह शराब भी पीता है और अपना अधिकांश समय शिल्पा जैसी लड़कियों के साथ व्यतीत करता है। इसके बावजूद भी गोपीनाथ उसे चरित्रवान समझते थे-और इसलिए समझते थे क्योंकि उसके पास करोड़ों की दौलत थी। यही नहीं-वह उन्हें पल-पल अपने अहसानों के नीचे दबा रहा था और वह खुशी-खुशी दब रहे थे।

इसके अतिरिक्त उसे यह भी विश्वास था कि मनु भी उसकी ओर दौलत के कारण ही बढ़ रही थी। एक समय वह था-जब मनु ने उसे एक चुम्बन की भी इजाजत न दी थी। किन्तु जब समय बदला और उसके पास दौलत का ढेर लगा-तो मनु ने किसी की पत्नी होते हुए भी उसे अपना सब कुछ सौंप दिया। किन्तु एक बात पूरी तरह सच थी! और वह यह कि वह वास्तव में मनु को चाहता था। मनु ने भले ही उसकी दौलत से प्यार किया हो-किन्तु उसने सिर्फ मनु से प्यार किया था-सिर्फ मनु से।

निखिल ने यह सब सोचते हुए निःश्वास ली और सिगरेट सुलगाने लगा। उसी समय द्वार खोलकर शिल्पा आ गई।

उसके अभिवादन का उत्तर देकर निखिल ने कहा- ‘शिल्पा! तुम्हारे बिना सब कुछ सूना-सूना-सा लगता है। और तुम हो कि आकाश से उतरी परी की भांति गायब हो जाती हो। कल कहां रहीं?’

‘सर! कल मुझे देखने वाले आए थे।’

‘देखने वाले। किन्तु इसमें देखने की क्या बात है? अच्छी-खासी हो-खूबसूरत हो।’

‘मेरा विवाह हो रहा है।’

‘अच्छा-कौन हैं वह भाग्यशाली?’

‘मेरा प्रेमी।’

‘इसका मतलब है-तुम किसी से प्रेम भी करती हो।’

‘यस सर! हम दोनों के बीच पिछले एक वर्ष से प्रेम संबंध है।’

‘प्रेम संबंध-अथवा प्रेम का नाटक?’ निखिल ने पूछा और शिल्पा को ध्यान से देखने लगा।

शिल्पा बोली- ‘नाटक नहीं सर! सिर्फ प्रेम।’

‘प्रेम किसी से और शरीर किसी को-यह कैसे हो सकता है?’

‘हो सकता है सर! क्योंकि प्रेम और वासना में अंतर होता है। इसके अतिरिक्त दूसरी बात यह है कि प्रेम का संबंध आत्मा से है और वासना का संबंध इंद्रियों से। वैसे भी सर! आप जिस संबंध की बात कर रहे हैं-उसे बनाने में मेरी कोई इच्छा न थी। वह विवशता थी मेरी-आप इस विवशता को दूसरे शब्दों में बलात्कार भी कह सकते हैं।’

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‘बलात्कार।’ निखिल के स्वर में घृणा थी।

‘यस सर!’ शिल्पा बोली- ‘जब एक लड़की किसी के आगे अनिच्छा एवं विवशतावश समर्पण करती है-तो उसे बलात्कार ही कहा जाता है। बलात्कार किसी के साथ भी हो सकता है और मैं उसे एक हादसे के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानती। अतः मैं पूरी ईमानदारी के साथ कह सकती हूं कि मैंने अपने प्यार को धोखा नहीं दिया।’

निखिल ने सिगरेट ऐश ट्रे में कुचल दी और घृणा से बोला- ‘तुम्हारा यह फलसफा तो बहुत ऊंचा है शिल्पा रानी! तुमने पाप भी किया और देवी भी बन गईं। एक बात बताओगी?’

‘पूछिए।’

‘तुमने एक बार हमारे सामने भी प्रेम का प्रस्ताव रखा था। तुमने कहा था कि मैं आपसे प्रेम करती हूं। बता सकती हो-सच क्या था?’

‘सच तो आप भी जानते थे सर! और मैं भी जानती थी। आपने मेरे शब्दों को सच इसलिए नहीं माना-क्योंकि आपकी दृष्टि में मैं एक बाजारू लड़की थी। क्योंकि आप जानते थे कि मैं आपको नहीं-आपकी दौलत को चाहती हूं। आमतौर पर जब एक लड़की किसी अमीर व्यक्ति से प्रणय निवेदन करती है तो उसके विषय में यही सोचा जाता है।’

‘अर्थात् तुम हमें मूर्ख बना रही थीं।’

‘हम दोनों ही एक-दूसरे को मूर्ख बना रहे थे सर! आपको मेरे शरीर की जरूरत थी और मुझे आपकी दौलत की।’

निखिल उठा और इस बार अपने दांत पीसकर बोला- ‘कितनी चालाक लड़की हो तुम।’

‘थैंक्यू सर!’ शिल्पा धीरे से बोली।

‘क्या नाम है तुम्हारे प्रेमी का?’ निखिल ने पूछा। स्वर में क्रोध की झलक थी।

‘अखिल-अखिल वर्मा।’

निखिल के सम्मुख चट्टान-सी गिरी।

वह कुछ क्षणों तक तो शिल्पा को आंखें फाड़-फाड़कर देखता रहा और फिर बोला- ‘कौन अखिल वर्मा?’

‘राणा नगर में रहता है। पिछले वर्ष हम दोनों साथ ही पढ़ते थे।’

निखिल के सामने फिर धमाका हुआ।

वह बोला- ‘राणा नगर में किस जगह?’

‘डी- पब्लिक स्कूल के ठीक सामने।’

इस बार इतना जबरदस्त विस्फोट हुआ कि निखिल का मस्तिष्क टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया। देर तक वह सन्नाटे जैसी स्थिति में खड़ा रहा और फिर बैठकर थके से लहजे में शिल्पा से बोला- ‘बैठ जाओ।’

प्रत्युत्तर में शिल्पा ने अपने बैग से एक कागज निकाला और निखिल के सामने रख दिया। निखिल ने उसे पढ़े बिना ही पूछा- ‘यह क्या है?’

‘सर! मैं नौकरी छोड़ रही हूं।’

‘हुं-तुम्हारे पापा का ऑपरेशन हो गया?’

‘यस सर!’

‘कैसे हैं वह?’

‘अब तो पूरी तरह स्वस्थ हैं।’

‘इसीलिए तुम्हें नौकरी की कोई आवश्यकता न रही।’

‘यस सर!’

‘किन्तु हमें अभी तुम्हारी आवश्यकता है।’ इतना कहकर निखिल ने शिल्पा का कागज फाड़ दिया और उससे बोला- ‘आज से हम तुम्हारे वेतन में पांच सौ रुपए की वृद्धि कर रहे हैं।’

‘कोई लाभ न होगा सर!’

‘क्या मतलब?’

‘मतलब यह है कि मैं किसी भी स्थिति में नौकरी न कर पाऊंगी।’

‘वेतन शायद कम है।’

‘वेतन अच्छा है सर! किन्तु मैंने कहा न कि अब मुझे नौकरी की जरूरत नहीं।’

‘तो फिर एक बात मान लो।’

‘वह क्या?’

‘अखिल से विवाह न करो।’

‘यह-यह आप क्या कह रहे हैं सर?’

निखिल ने उठकर कहा- ‘हम तुम्हारी भलाई के लिए कह रहे हैं शिल्पा! और-यह वो बात है-जिसे तुम्हें मानना ही पड़ेगा।’

‘किन्तु मैं आपकी बात मानने के लिए बाध्य नहीं हूं सर!’

‘कितनी दौलत चाहिए।’

‘मैं समझी नहीं सर!’

‘यदि तुम अखिल से विवाह करने का निर्णय बदल दो-तो हम तुम्हें मुंह मांगी रकम दे सकते हैं।’

शिल्पा उसे आश्चर्य से देखने लगी। वह समझ न पा रही थी कि निखिल ऐसा क्यों चाहता था। हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ वह बोली- ‘क्षमा करें सर! मैं अपना निर्णय नहीं बदल सकती।’

‘शिल्पा! ऐसा कहकर तुम हमारा अपमान कर रही हो। तुम उस इंसान को चुनौती दे रही हो-जो कुछ भी कर सकता है।’

‘मुझे आपके इरादे का पता नहीं चला सर! मैं समझ नहीं पा रही हूं कि आप ऐसा क्यों चाहते हैं। मैंने अखिल को चाहा-चाहकर कोई पाप नहीं किया। मैं उससे विवाह कर रही हूं यह भी कोई पाप नहीं। फिर आप क्यों चाहते हैं कि मैं उससे विवाह न करूं? मैंने आपकी कंपनी में नौकरी की-आपको समय-समय पर शारीरिक सुख भी दिया और बदले में आपने मुझे दिए प्रतिमाह पांच हजार रुपए। किन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं कि मैंने अपना पूरा जीवन आपके नाम लिख दिया था। मैं आपकी गुलाम बन गई थी।’

निखिल उसके इस तर्क को काट न सका और बैठ गया। गहरी बेचैनी एवं परेशानी के भाव उसकी आंखों से स्पष्ट झांक रहे थे। उसे शिल्पा के यौवन में विशेष दिलचस्पी न थी। उसके पास पैसा था और पैसे के बल पर वह शिल्पा जैसी एक नहीं कई लड़कियों को खरीद सकता था। इस बेचैनी का कारण तो यह था कि शिल्पा उसके छोटे भाई से विवाह कर रही थी। जिस लड़की को उसने कई बार भोगा हो, वही उसके छोटे भाई की पत्नी बने, भला यह कैसे हो सकता था? उसकी अंतरात्मा इस बात को कैसे सहन कर सकती थी?

सोचते हुए निखिल ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। किन्तु उसे यह जानकर आघात लगा कि शिल्पा वहां से जा चुकी थी।

शिल्पा के जाने के पश्चात् वह काफी देर तक तो विचार मग्न-सा बैठा रहा। फिर एकाएक उसे कुछ ध्यान आया और वह फोन पर किसी के नंबर डायल करने लगा।

संबंध मिलने पर वह बोला- ‘अंकल! मैं निखिल बोल रहा हूं।’

‘अच्छा-अच्छा!’ प्रत्युत्तर में किसी पुरुष की भारी आवाज सुनाई पड़ी- ‘कहो निखिल! कैसे हो?’

‘अच्छा हूं अंकल! पापा और मम्मी कैसे हैं?’

‘अच्छे हैं। शाम खाने के पश्चात् थोड़ी देर के लिए उनके पास बैठा था।’

‘मैंने सुना है-वे लोग अखिल की शादी कर रहे हैं?’

‘हां-सुना तो मैंने भी है। परसों ही वह कोई लड़की देखकर आए हैं। लड़की सुंदर है और सबसे बड़ी बात तो यह है कि अखिल उससे प्रेम करता है। संभवतः शादी की तारीख भी पक्की हो गई है।’

‘अंकल! निखिल ने रुंधे स्वर में पूछा- ‘क्या उन्होंने मुझे इतना पराया माना कि मुझसे इस संबंध में पूछना भी उचित न समझा? क्या आप इसे अन्याय न कहेंगे?’

‘देखो निखिल! अन्याय तो मैं इसे कहूंगा। पहला अन्याय तो यह है कि उस परिवार में पहले तुम्हारा विवाह होना चाहिए था-जबकि विवाह अखिल का हो रहा है। यह बात हमारी परंपराओं के भी विरुद्ध है। और-दूसरा अन्याय यह कि उन्होंने तुमसे सलाह भी न ली। दरअसल मैं सोचता हूं और जो कुछ मैंने सुना है, उसके अनुसार दूसरे अन्याय के जिम्मेदार तुम स्वयं हो। तुम अच्छी तरह जानते हो कि राजाराम एक आदर्शवादी व्यक्ति हैं। मैं नहीं मानता कि उन्होंने कभी भूल से भी झूठ बोला हो अथवा एक भी पैसा अवैध ढंग से कमाया हो। बल्कि मैं तो कहता हूं कि आज की इस दुनिया में राजाराम जैसे व्यक्ति होने बहुत मुश्किल हैं। हमारा पूरा स्टाफ उन्हें देवता कहकर पुकारता है। ऐसी स्थिति में वे कैसे सहन कर लेंगे कि उनके घर में अवैध ढंग से कमाया गया धन आए अथवा उनका अपना बेटा अवैध ढंग से दौलत इकट्ठी करे? तुम्हारे और राजाराम के बीच जो मन-मुटाव है, उसके पीछे मुख्य कारण यही है। अन्यथा ऐसा कार्य नहीं होता कि पिता अपने पुत्र को न चाहता हो। पुत्र तो उसकी आत्मा का एक अंश होता है।’

‘अंकल! मैं उन्हें विश्वास दिला चुका हूं कि मेरे पास जो दौलत है वह अवैध नहीं है।’

‘देखो निखिल! मैं इस संबंध में कुछ नहीं कह सकता, क्योंकि मैं नहीं जानता कि सच्चाई क्या है। मैं तो केवल तुम्हारी मम्मी और पापा को जानता हूं। मैं जानता हूं कि यह लोग महीने में चार दिन भूखे रह सकते हैं; बड़ी-से-बड़ी विपत्ति झेल सकते हैं, किन्तु दो काम कभी नहीं कर सकते। पहला तो यह कि किसी के आगे हाथ नहीं फैला सकते और दूसरा यह कि हराम के पैसे की ओर आंख उठाकर नहीं देख सकते। निखिल! मुझे तुम्हारे माता-पिता पर गर्व है। मुझे गर्व है कि इस युग में भी राजाराम जैसे धर्मात्मा लोग हमारे देश में मौजूद हैं। तुम्हें तो उनके सम्मुख नतमस्तक होना चाहिए। प्रातः-सायं उनके चरण छूकर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए तुम्हें। ऐसे धर्मात्मा माता-पिता तो बहुत ही कम लोगों को मिलते हैं। मेरी मानो तो उनसे अपने अपराधों की क्षमा मांग लो।’ दूसरी ओर से कहा गया।

किन्तु निखिल ने कुछ न कहा और घबराकर रिसीवर रख दिया। उसकी आंखों में डोलती विचारों की छाया पल-पल गहरी होती जा रही थी।

अभिशाप- भाग-10 दिनांक 28 Feb. 2022 समय 04:00 बजे साम प्रकाशित होगा

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