Short Story in Hindi: नवरात्रि का आखिरी दिन था। पूरे मोहल्ले में कन्या पूजन की धूम थी। मैं और मेरी सहेली नए कपड़े पहनकर बहुत खुश थीं, क्योंकि आज हमें घर-घर जाकर पूड़ी-हलवा, चने और छोटे-छोटे गिफ्ट मिलने वाले थे।
उन सभी में से मैं बहुत नटखट थी। मुझे पूड़ी-हलवा बहुत पसंद था। सुबह से ही मैं अपनी सहेली के साथ एक घर से दूसरे घर जा रही थी। हर घर में लोग प्यार से हम दोनों और सभी कन्याओं का स्वागत करते, तिलक लगाते और स्वादिष्ट प्रसाद खिलाते।
कुछ ही देर में मेरी छोटी थैली गिफ्ट से भर गई—कहीं से चूड़ियाँ मिलीं, कहीं से रिबन, कहीं से टॉफियाँ और कहीं से कुछ पैसे।
लेकिन मेरी शरारत यहीं खत्म नहीं हुई। मैंने अपनी सहेली से कहा,
“अगर हम अपनी चोटी खोल लें और दुपट्टा बदल लें, तो क्या हम फिर से उसी घर में जा सकते हैं?”
मेरी सहेली हँसने लगीं और फिर सच में हमने ऐसा ही कर दिया। चोटी खोल ली, रिबन भी लगा लिया और फिर से उसी घर में जाकर चुपचाप कन्या बनकर बैठ गईं।
घर की आंटी ने हमें पहचान लिया, लेकिन कुछ बोली नहीं। उन्होंने फिर से प्यार से तिलक लगाया, पूड़ी-हलवा खिलाया और इस बार एक-एक टॉफी भी दे दी।
जब हम बाहर निकली तो आंटी मुस्कुराकर बोलीं,
“बेटा, अगली बार रिबन भी बदल लेना, तभी तो हम पहचान नहीं पाएँगे!”
यह सुनकर मैं और मेरी सहेली जोर-जोर से हँसने लगीं और भाग गईं।
उस दिन की वह नटखट शरारत आज भी हमको याद है। सच में, कन्या पूजन केवल पूजा नहीं, बल्कि बचपन की हँसी, शरारत और मीठी यादों का खूबसूरत त्योहार है।

