In the court of King Bhullu Shah
In the court of King Bhullu Shah

Funny Stories for Kids: निक्का को कहानियाँ पढ़ने का शौक था । कहानियाँ सुनने का भी । निक्का की नानी बहुत अच्छी कहानियाँ सुनाया करती थीं । निक्का सुनता तो उसे समय का कुछ होश ही न रहता । सोचता, कहानी चलती रहे, चलती रहे, कभी खत्म ही न हो । एक दिन की बात, निक्का दशहरे की छुट्टियों में मम्मी के साथ नानी के जादूटोला गाँव में गया । वहाँ वह गाँव के अपने प्यारे दोस्तों से मि ला । दूर तक गाँव के खेतों में घूमने गया । वहाँ की साफ, ठंडी हवा ने उसका जी खुश कर दिया ।

फिर लौटकर आलू की भाजी और मिर्च के अचार के साथ नानी के हाथ की बनी खस्ता कचौड़ियाँ खाईं । गरम-गरम हलवा भी । नानी खाना बहुत अच्छा बनाती थीं । पर निक्का के आने पर तो उनके खाने में अलग ही स्वाद आ जाता ।
रात को सोते समय निक्का को याद आई नानी की कहानी । बोला, “नानी, नानी, बहुत दिन हो गए आपसे कहानी सुने हुए । आज आप कहानी सुनाओ । कोई अच्छी सी कहानी, राजा भुल्लू शाह वाली ।” नानी हँसकर बोलीं, “कितनी सारी कहानियाँ तो तुझे सुना दीं । अब नानी के पास कहाँ से आएगी नई कहानी ?”
“नई नहीं तो आप कोई पुरानी कहानी ही सुना दो, नानी । आपकी कहानी तो जि तनी बार भी सुनो, नई लगती है ।” निक्का ने जिद की ।

“चल तुझे जादूटोला गाँव के कठपुतली वाले की कहानी सुनाती हूँ ।” नानी बोली, “तूने सुनी है पहले ?”
“जादूटोला गाँव का कठपुतली वाला…!” निक्का ने याद करने की कोशिश की । फि र बोला, “ना नानी, मैंने कठपुतली वाले की तो कोई कहानी सुनी ही नहीं ।”

“अच्छा तो आज वही सुनाती हूँ । ध्यान से सुनना, तुझे अच्छी लगेगी ।” कहकर नानी ने थोड़ा गला खखारा और फि र सुनानी शुरू की कहानी ।… पुराने जमाने की बात है । अलबेलापुर के जादूटोला गाँव में रहता था एक कठपुतली वाला । नाम था उसका बिरजू । बिरजू कठपुतली वाला ऐसे कमाल
के कठपुतली के खेल दिखाता कि लोग वाह-वाह कर उठते । कभी बिजली की तरह झन-झन तलवारों की लड़ा ई, कभी पायल की छम-छम वाला मोरा नाच । कभी रूठी हुई रानी सुग्गा वती और राजा हल्लू शाह का कि स्सा । कभी गोगा रानी की चतुराई वाला खेल । कभी हँसोड़ हलवाई इमरतीलाल की मीठी लस्सी वाला मजेदार कि स्सा । देखकर लोग हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाते ।
यहाँ तक कि खेल खत्म होने के बाद भी लोग उठने के लिए तैयार न होते । कहते, “कुछ और दिखाओ भाई कठपुतली वाले ! थोड़ा सा और दिखाओ अपना खेल । दिल अभी भरा नहीं ।”

कुछ लोग बिरजू की पीठ थपथपाकर कहते, “भाई, कठपुतलियाँ नचाने की ऐसी कला, ऐसा हुनर तो हमने कहीं और देखा नहीं । तुममें कुछ अलग बात है ।”
ऐसे लोग इनाम में दस-बीस रुपए भी दे देते । वरना तो ज़्यादातर लोग आना, दो आना देकर ही चल देते ।
बिरजू कठपुतली वाला खुश था कि इतने सारे लोग उसकी कला की कद्र करते हैं । कहाँ-कहाँ से लोग उसका खेल देखने आते हैं, और जी भरकर तारीफ करते हैं । पर उसकी पत्नी कमली हमेशा उससे नाराज रहती । अकसर कुढ़कर कहती, “इतने बड़े-बड़े लोग तुम्हारा खेल देखते हैं । बदले में दस-बीस रुपए और मुट्ठी भर दानों के सिवा तुम्हें क्या मिलता है !…छोड़ो यह नासपीटा खेल,
कोई और काम-धाम करो, जिससे घर में चार पैसे आएँ ।”
सुनकर कठपुतली वाला उदास हो जाता । उसका दिल जैसे टूक-टूक हो गया हो । मन ही मन कहता, ‘ये कठपुतलि याँ ही तो मेरी जान हैं । अगर ये न रहेंगी, तो मैं जिन्दा ही कैसे रहूँगा ! अरी भागवान, तू यह बात समझती क्यों नहीं ?’

पर तेज स्वभाव की कमली से यह कहने की उसकी हिम्मत न होती । इस हालत में परेशान बिरजू देर तक अपना माथा पकड़े जाने क्या -क्या बुदबुदाता रहता । इस पर भी कमली को तरस न आता । वह हमेशा मुँह फुलाए रहती । कभी उससे सीधे मुँह बात भी न करती । बात-बेबात ताने देती ।
पर बिरजू भला कठपुतलियों के बिना कैसे रहता ? वह तो यह सोच भी नहीं सकता था । इसलिए कमली जो कुछ भी कहती, वह चुपचाप सुन लिया करता था । कभी उसकी बात का जवाब तक न देता । और मन ही मन खुद को तसल्ली देता रहता कि कभी तो मेरे भी अच्छे दिन आएँगे । कभी तो भगवान को मुझ पर तरस आएगा ।

लेकिन हालात थे कि बद से बदतर होते जाते । बेचारा कठपुतली वाला ! उसके दुख का कोई ठिकाना न था । उसे लगता, दुनिया में मुझसे दुखी आदमी कोई नहीं है ।
फिर एक दिन की बात । कठपुतली वाला देर रात को एक गाँव के जमींदार के घर खेल दिखाकर लौटा । उस दिन उसका खेल खूब जमा था । खासकर छोटे-छोटे बच्चे तो कि लक-कि लककर तालियाँ बजा रहे थे । कुछ उसकी कठपुतलि यों के साथ नाचने भी लगे थे । इससे खेल में एक नया रंग आ गया ।
चलते-चलते जमींदार ने खुश होकर इनाम में इकतीस रुपए दिए । फिर कहा, “थोड़े दिन बाद मेरे बड़े पोते का मुंडन है । तब तुम्हें फिर से बुलाऊंगा बिरजू । तुम्हें खूब इनाम दूँगा और अच्छी खातिर भी करूँगा । उस दिन अपने परिवार के साथ आना और मेरे पोते के मुंडन में शामिल होना ।”

वह यह बात कमली को बताना चाहता था । पर कमली को इसकी क्या परवाह । उसने तो उठकर उसे खाना तक नहीं दिया । रसोई में ठंडा खाना पड़ा था । बिरजू वही खाकर सो गया ।
रातभर उसे कठपुतलियों के सपने आते रहे । उसे दिखाई दिया कि हजारों लोग उसका कठपुतली का खेल देखने आए हैं । उनमें अलबेलापुर का राजा भुल्लू शाह भी है । वह भी मजे-मजे में कठपुतली का शानदार खेल देख रहा है,
और गरदन हिला-हिलाकर तारीफ कर रहा है । बाद में वह सिंहासन से उतरकर आया और उसे गले लगाकर बोला, “बिरजू, तेरी कला महान है !”
सुबह बिरजू उठा तो रात का सपना याद करके वह मुसकरा दिया । पर तभी उसकी निगाह घर के पीछे वाले कोने पर गई । वहाँ कठपुतलि याँ नहीं थीं । बिरजू का जी धक से रह गया, “अरे मेरी कठपुतलियाँ !…मेरी कठपुतलियाँ कहाँ गायब हो गईं ?”

कठपुतली वाले की हालत ऐसी थी कि काटो तो खून नहीं । उसे लगा, कोई बहुत बड़ा अनर्थ हुआ है ! हो सकता है, कमली ने ही कुछ किया हो । उसने डरते-डरते कमली से पूछा तो वह तड़पकर बोली, “मैं क्या जानूँ”
तुम्हारी कलमुही कठपतुलियाँ कहाँ गई हैं । जाकर ढूँढ़ते क्यों नहीं हो ?…या फिर छोड़ो उन्हें । कोई दूसरा काम-धंधा करो ।”
कठपुतली वाला समझ गया, कमली ने कठपुतलियाँ कहीं छिपा दी हैं । अब तो वह और अधि क दुखी हो गया । रात-दिन चारपाई पर लेटा बिसूरता रहता । उधर घर में खाने-पीने को कुछ नहीं था । जो थोड़े से पैसे थे, वे कब के खत्म हो चुके थे ।
इस हालत में कमली का स्वभाव दिन पर दिन और भी उग्र होता जाता । गुस्से में वह बात-बात पर बिरजू का अपमान करती ।
बिरजू कई बार दबी जुबान से कहता, “कमली, तुमने मेरी कठपुतलियाँ कहीं छि पाकर रखी हों तो दे दो । कहीं खेल दिखाऊँगा, तो घर में चार पैसे आएँगे । हम दोनों का गुजारा चलता रहेगा ।”

पर कमली हर बार तुनककर कहती, “भाड़ में गईं तुम्हारी कठपुतलियाँ । मुझे उनकी कमाई नहीं चाहिए । इससे तो गाँव में कहीं मेहनत-मजदूरी कर लो, तो ज़्यादा अच्छा है । कुछ तो कमाई का ठिकाना हो जाएगा ।” सुनकर बिरजू को लगता, जैसे उसका कलेजा फट जाएगा । उसकी कला
का ऐसा अपमान तो आज तक किसी ने नहीं किया था ।

ऐसे ही दुख भरे दिन बीत रहे थे । फिर एक दिन की बात, आधी रात के समय बिरजू कठपुतली वाला अपनी चारपाई पर लेटा था । पर उसे नींद नहीं आ रही थी । रह रहकर करवटें बदल रहा था ।

तभी अचानक उसे कहीं आस-पास खट-खट की आवाज सुनाई दी । देखते ही देखते एक-एक कर सभी कठपुतलि याँ उसके पास आ खड़ी हुईं । बोलीं, “सुनो कठपुतली वाले, हमें राजा के पास ले चलो ।…ले चलो, कठपुतली वाले !”

“पर…इस समय ? अभी तो आधी रात…!” कठपुतली वाला अचकचाया । “हाँ, कठपुतली वाले, अभी, इसी समय चलना होगा । तुम्हारा दर्द अब हमसे देखा नहीं जाता ।…ज़्यादा देर न करो । अभी चलोगे तो होते-होते दोपहर तक पहुँच पाओगे ।”
कठपुतली वाला उठा, और आधी रात को ही कठपुतलियों को लेकर चल पड़ा राजधानी अलबेलापुर की तरफ । वह भूखा-प्या सा चलता रहा, चलता रहा, चलता रहा । रास्ते में काँटेदार झाड़ि यों में उलझकर उसके पुराने-धुराने कपड़े भी फट गए । उसकी हालत खराब थी । इस हाल में राजा के महल में जाते हुए उसे शर्म आ रही थी ।
पर उसकी सबसे समझदार कठपुतली गोगा रानी ने कहा, “तुम घबराओ नहीं, कठपुतली वाले ! राजा भुल्लू शाह को मैं जानती हूँ । वह हुनर की कद्र करता है ।…तुम बेखटके वहाँ जाओ और अपना खेल दिखाओ । हम सब तुम्हारे साथ हैं न । फिर घबराते क्यों हो ?

एक क्षण रुककर, कठपुतली वाले का हौसला बढ़ा ते हुए उसने कहा, “तुम दिल से कलाकार हो, कठपुतली वाले !…मैंने जमाने की ऊँच-नीच देखी है । हर आदमी को पहचानती हूँ । और जानती हूँ कि तुम्हारा दिल सोने का है । इस पूरे अलबेलापुर में तुम्हा रे जैसा कठपुतलि याँ नच ाने वाला कोई और नहीं है ।
तुम्हा रे पास सच्चा हुनर है । इसलिए अपने मन से हिचक निकाल दो । बड़ी शान से राजधानी में जाओ, और राजा के दरबार में अपना कमाल दिखा दो ।”
इस पर कठपुतली वाला हि म्मत करके राजा भुल्लू शाह के दरबार में जा पहुँचा । उसकी हालत सचमुच बहुत खराब थी । कपड़े एकदम फटे-पुराने, मैले ।
पैर मिट्टी से सने हुए ।…राजा भुल्लू शाह और उसके दरबारी हैरान थे, आज महल में यह कैसा फटेहाल आदमी आ पहुँचा ।

पर कठपुतली वाले के चेहरे पर नूर था । आँखों में निराली चमक । उसने राजा भुल्लू शाह के सामने सि र झुकाकर बड़ी ही विनय के साथ कहा, “महाराज, मेरी कठपुतलियाँ कुछ खेल दिखाना चाहती हैं ।…मैं एक गरीब कठपुतली वाला हूँ । जगह-जगह खेल दिखाता हूँ । हर जगह लोग मेरे खेल के दीवाने हैं । ज़्यादातर गाँव-कसबे के सीधे-सादे लोग मेरा खेल देखते और पसंद करते हैं ।…मैं यहाँ आना नहीं चाहता था । कभी राजदरबार में जाऊँगा, मैंने यह सोचा ही नहीं था । पर मेरी हालत देखकर मेरी कठपुतलि याँ ही जिद करके मुझे यहाँ ले आई हैं ।” सुनकर अचरज के मारे राजा भुल्लू शाह और दरबारियों की आँखें फैल
गईं । राजा ने कहा, “भाई कठपुतली वाले, तुम्हा री कठपुतलि याँ इतनी समझदार हैं, यह तो हैरानी की बात है । हम तुम्हारा खेल जरूर देखेंगे । दिखाओ, अपना सबसे संदुर खले दिखाओ ।”

और फिर देखते ही देखते कठपुतली वाले का खेल शुरू हो गया । कठपुतलियों ने उस दिन रूठी हुई रानी सुग्गा वती से अपने खेल की शुरुआत की । और फि र होते-होते उसी खेल में ऐसे-ऐसे अचंभे भरे खेल जुड़ते चले गए कि पूरे दरबार में सन्ना टा छा गया । राजा भुल्लू शाह ही नहीं, उसके मंत्री, संतरी, दरबान सब जैसे मूर्ति यों में बदल गए हों । जो जहाँ खड़ा था, वहीं का वहीं खड़ा रह गया । कि सी के हाथ-पैर तक नहीं हिल रहे थे । जैसे कठपुतली वाले ने कोई जादू कर दिया हो । यहाँ तक कि ‘वाह-वाह’ कहने का भी किसी को होश न था ।

कठपुतली वाला सोचता, ‘बस, बहुत हुआ । अब अपना खेल यहीं खत्म करता हूँ ।’ पर कठपुतलि याँ तो कुछ ऐसी तरंग में थीं कि रुकना ही नहीं चाहती थीं । जैसे ही एक खेल खत्म होता, वे खुद ही नाच-नाचकर, थिरक-थिरककर दूसरा खेल शुरू कर देतीं और फि र कठपुतली वाला भी अपने रंग में आ जाता ।
उसके पास कला थी, हुनर था, पर साथ ही ऐसी कठपुतलियाँ भी तो थीं, जो उस पर जान छि ड़कती थीं । ऐसे में वह भला किस राजा से कम था ? दोपहर के समय कठपुतली वाले ने खेल शुरू कि या था । पर होते-होते कब रात हो गई, और राजमहल के दीपक जल उठे, किसी को पता न चला ।
राजदरबार के बाहर मशालों से रोशनी हो रही थी । सैनिक और दरबार राजदरबार की सुरक्षा में मुस्तैद थे । पर साथ ही साथ सब अचंभे में एक-दूसरे से पूछ रहे थे, “आज बात क्या हुई ? राजा भुल्लू शाह का दरबार तो कभी इतनी देर तक चलता नहीं ।”

सचमुच बात तो अनोखी ही थी । सारे अचंभों से बढ़कर एक अचंभा हो रहा था । कठपुतली वाले ने अपनी पूरी कला उड़ेलकर ऐसा अनोखा खेल दिखाया कि राजा और दरबारी अचरज म ें पड़ गए । सभी के मुँह खुले के खुले रह गए, जैसे मुँह में जबान ही न हो ।
जब कठपुतली वाले का खेल थमा तो ऐसा लगा, जैसे राजा और सारे दरबारी एक साथ नींद से जागे हों । वे इतने जोश में भरकर ‘वाह-वाह’ कर रहे थे, कि दूर-दूर तक यह आवाज पहुँच रही थी ।
राजा ने उठकर कठपुतली वाले को गले लगा लिया । सब दरबारियों ने भी खड़े होकर, तालि याँ बजाते हुए, उसकी कला को सलाम किया । राजा ने उसी समय कठपुतली वाले को नहला-धुलाकर नए कपड़े पहनाने का आदेश दिया ।

जब बिरजू नए कपड़े पहनकर राजा के आगे आ खड़ा हुआ, तो वह पहचान में ही नहीं आता था । राजा ने उसकी पीठ थपथपाकर कहा, “अभी मेरा दिल
भरा नहीं बि रजू । जब भी तुम्हारा दिल करे, यहाँ आ जाना । मैं एक नहीं, कई बार देखना चाहूँगा तुम्हा रा खेल ।…तुम्हारी कठपुतलि याँ इतनी समझदार हैं कि जैसे इशारे पर ही नाचती हों । इसलि ए जब भी तुम अपना खेल दिखाओगे, कुछ न कुछ जरूर नया होगा ।”

फिर राजा भुल्लू शाह ने एक हजार अशर्फि यों से भरा सोने का घड़ा बिरजू को इनाम में दिया । साथ में एक हाथी भी उपहार में दिया । उस हाथी की देखभाल के लिए पीलवान और एक चतुर सेवक भी ।

कठपुतली वाला ठाट से गुलाबी झूल वाले हाथी पर बैठा । साथ में कठपुतलि याँ । वह झूमता-झामता हुआ जादूटोला गाँव में अपने घर पहुँचा । कमली ने देखा तो सोचा, कहीं मैं सपना तो नहीं देख रही हूँ ? पर कठपुतली वाले ने सुनाया पूरा किस्सा , तो कमली का सिर शर्म से झुक गया । उसने पति से माफी माँगी, तो बिरजू बोला, “कमली, मुझसे नहीं, कठपुतलियों से माफी
माँगो । तुमने इनका बहुत दिल दुखाया है ।”

कमली ने कठपुतलि यों से माफी माँगी तो वे पल में रीझ गईं । खुश होकर वहीं नाचने और गाने लगीं । उनका नाच देखकर कमली हँसी तो इतना हँसी, इतना हँसी कि उसकी हँसी थमने में ही नहीं आ रही थी । अड़ोस-पड़ो स के सारे लोग कमली और कठपुतली वाले को बधाई देने आए । अब तो कठपुतली वाले के दिन हँसी-खुशी बीतने लगे । उसके दिन सोने के और रातें चाँदी की हो गईं ।
राम जी करें, इस कहानी को पढ़ने-सुनने वालों के दिन भी ऐसे फिरें, जैसे कमली और कठपुतली वाले के दिन फि रे, और जैसी बधाइयाँ उन्हें मिलीं, वैसी बधाइयाँ दुनिया के सारे दीन-दुखि यारों और गरीब-गुरबा लोगों को मिलें ।…

नानी की कहानी पूरी हुई, तो निक्का ने मगन होकर कहा, “नानी, कैसी अनोखी कहानी है । मैं तो कभी भूल ही नहीं सकता । मैंने कहानी की बहुत किताबें पढ़ी हैं । पर ऐसी अनोखी कहानी तो मैंने आज तक नहीं पढ़ी । ऐसी कहानी तो बस आप ही सुना सकती हो नानी ।”
सुनकर नानी ने प्या र से निक्का को गोद में लेकर उसका माथा चूम लिया । बोलीं, “तुझे अच्छी लगी, तो और भी सुनाऊँगी । अलबेलापुर के जादूटोला गाँव में तो चप्पे -चप्पे पर कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं । और राजा भुल्लू शाह की कहानियों का तो पूरा एक खजाना है । तू चाहे तो बड़ा होकर उनकी पूरी किताब लिखना ।”
“हाँ, लिखूँगा नानी । जरूर लिखूँगा !” कहते हुए निक्का की आँखों में एक नई चमक थी ।

ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ