Olympic Medals
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Funny Stories for Kids: एक बार की बात, निक्का अपने घर के बाहर मैदान में खेल रहा था । तभी उसे एक मेंढक दिखाई दिया । छोटा-सा मेंढक, जो एक गड्ढे के चारों ओर रह-रहकर फुदक रहा था । कभी वह फुदककर इधर आता, कभी उधर । कभी तेज छलाँग से वह गड्ढा पार कर जाता । फिर उसने ऊँची कूद लगानी भी शुरू कर दी ।

उस गड्ढे के पास ही ईंटों का एक चट्टा था । फुदकू कोशिश कर रहा था कि ईंटों के उस चट्टे से भी ऊँचा कूदे और अपनी जीत का झंडा गाड़ दे । पर जितनी बार वह कोशिश करता, बुरी तरह गि रता । हालाँकि फिर वह उठ खड़ा होता, और अपनी कोशिशों में लग जाता था ।
इतनी बार गि रने के बाद भी उसने अपनी कोशिशें नहीं छोड़ी थीं । देखकर निक्का को बड़ी हँसी आई । हँसते हुए बोला, “अरे भई फुदकू, तुम हो तो छोटे से, सुकड़ू से । पर तुममें फुर्ती बड़े गजब की है ।”
फुदकू मेंढक तुनककर बोला, “हँसो मत, हँसो मत ! मैं तुमसे छोटा हूँ और किसी छोटे पर हँसना असभ्यता है । यह तुम्हें नहीं पता ? मैं तो समझता था निक्का , कि तुम अच्छे लड़के हो । समझदार भी हो, पर…मुझे बड़ा दुख हुआ तुम्हारी बात सुनकर !” सुनकर निक्का को कहना पड़ा , “सॉरी फुदकू, सॉरी ! मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था ।”

इस पर फुदकू का गुस्सा जरा ठंडा हुआ । बोला, “सुनो निक्का , मैं सबसे तेज दौड़ने वाले मेंढक का खिताब जीतने पंपापुर जा रहा हूँ । अभी प्रतियोगिता में पूरे सात दिन बाकी हैं इसलि ए रात-दिन अभ्यास कर रहा हूँ । चाहो तो तुम भी मेरे साथ दौड़ो ।…तुम्हारी भी कुछ प्रैक्टि स हो जाएगी । अभी तो बि ल्कुल ढीले-ढाले लग रहे हो । आलसी नंबर एक !” निक्का को हैरानी हुई, “यह फुदकू भी कैसा अजीब है । मुझसे होड़ लेना चाहता है । कहाँ मैं और कहाँ ये ? तो चलो, इसको मैं दिखा ही दूँ अपनी चाल !” सोचकर वह फुदकू मेंढक के साथ दौड़ा और थोड़ी देर में ही उसे हरा दिया ।

पर उस छुटके से फुदकू मेंढक की चाल भी वाकई कम नहीं थी । उसने पूरा जोर लगाया और खूब होड़ ली । इसलिए उसके साथ दौड़ते हुए निक्का पसीने-पसीने हो गया । इस बात ने निक्का को चकरा दिया । सोचने लगा, ‘लगता है, इस फुदकू ने भी प्रैक्टिस तो खूब अच्छी की है । तभी तो मुझे कि तना जोर लगाना पड़ा इसे हराने में । सचमुच, बड़ी हैरानी की बात है !’
अब तो निक्का और फुदकू मेंढक रोज-रोज दौड़ते । फुदकू की चाल दिनो-दिन तेज होती जाती । थोड़ी देर में ही निक्का का दम फूलने लगता, पर फुदकू था कि उसी फुर्ती से दौड़ता रहता । बल्कि उसकी चाल और तेज होती जाती । आखिर सातवें दिन उसने निक्का को हरा दिया । फि र एक जोर की विजयी छलाँग लगाकर बोला, “बस निक्का , आज ही मैं पंपापुर जा रहा हूँ । देखना, जीतकर लौटूँगा ।”

कुछ रोज बाद फुदकू मेंढक लौटा तो वाकई उसके सिर पर चम-चम चमकता सुनहला मुकुट था । निक्का ने उसे बधाई दी तो फुदकू बोला, “ऐसे नहीं…ऐसे नहीं, ऐसे नहीं निक्का ! ऐसे मैं नहीं मानूँगा ।…कल से तमु भी तेज दौड़ो । रोज प्रैक्टि स करो । कुछ साल बाद ओलंपि क से सोने का मेडल लेकर
आओ । तब होगी मुझे खुशी ।” निक्का की आँखों में चमक आ गई । बस, तभी से उसने तेज-तेज दौड़ने का अभ्यास शुरू कर दिया । आसपास हर जगह से उसे ढेरों इनाम मिले । पर उसका सपना तो है ओलंपिक ! ओलंपिक से मेडल जीतकर आएगा, तो वह सबसे पहले फुदकू के पास जाकर कहेगा, “धन्यवाद फुदकू, धन्यवाद ! तुमने मेरी आँखें खोल दीं ।” यह सोचते ही निक्का के चेहरे पर एक मीठी-मीठी मुसकान दौड़ जाती है ।

ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ