How desire changes over time in relationship
How desire changes over time in relationship

Ego in Relationship: रिश्ते केवल प्यार और नजदीकियों का नाम नहीं होते। वे विश्वास, सम्मान और समझ पर टिकते हैं। लेकिन कई बार देखा गया है कि कुछ रिश्तों में अहंकार और नियंत्रण इतना बढ़ जाता है कि साथी की भावनाओं की परवाह नहीं की जाती।

सीमा अपने साथी रोहन के साथ हमेशा खुलकर अपनी भावनाओं को साझा करती थी। लेकिन रोहन अक्सर छोटी बातों पर उसे बहला-फुसला देता था, यानी उसकी भावनाओं या निर्णयों को अपने अनुसार मोड़ देता। यदि सीमा किसी मुद्दे पर अपनी राय रखती, तो रोहन उसे अनदेखा कर देता
या मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए दूसरे मुद्दे उठा लेता अथवा पुराने झगड़े फिर से बहस में ले आता था, या फिर बात की गंभीरता को मजाक में उड़ाने की कोशिश करता था। धीरे-धीरे सीमा ने महसूस किया कि उसके विचार और भावनाएं कोई मायने नहीं रखते। यह स्थिति उसके मानसिक स्वास्थ्य
पर असर डालने लगी। हर दिन का संवाद तनावपूर्ण बन गया और सीमा को यह डर सताने लगा कि कहीं उसकी भावनाओं को फिर से ठेस न पहुंचे। आइए पहचानते हैं कि ऐसे नियंत्रक रिश्तों
की क्या पहचान है-

साथी को नीचा दिखाना: कई बार लोग अपने रिश्तों में यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे ‘महान’ हैं, जबकि साथी भावनाओं में ‘कमतर’ महसूस करता है। उदाहरण के लिए, कल्पना कीजिए कि किसी साथी को किसी पुराने अनुभव या दुखद घटना से चोट लगी हो लेकिन दूसरा व्यक्ति बार-बार उसी मुद्दे को मजाक या बहस का हिस्सा बनाता है। यह केवल अपने अहंकार को साबित करने का प्रयास होता है। ऐसे व्यवहार से साथी मानसिक रूप से असुरक्षित महसूस करता है और
रिश्ते में तनाव बढ़ता है।

कुछ रिश्तों में हर छोटी बात पर शर्तें रखी जाती हैं- ‘अगर आपने ऐसा किया तो हम वैसा करेंगे जो तुम चाहते हो पर पूरी तरह नहीं करेंगे।’ ऐसे रिश्ते अक्सर एकतरफा नियंत्रण और डर पर टिकते हैं। उदाहरण स्वरूप, यदि कोई साथी अपनी पसंद या सीमाएं तय करता है तो उसे चुनौती या झंझट
के रूप में देखा जाता है। इससे साथी का स्वाभिमान दबता है और वह अपने फैसलों
को व्यक्त करने में डर महसूस करता है।

कई बार लोग अपनी स्वतंत्रता और अधिकार को प्रेम के नाम पर हावी कर देते हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी साथी को किसी निर्णय या बातचीत पर आपत्ति होती है तो दूसरा इसे अनदेखा करता या हल्के में ले लेता है। लेकिन असल में यह व्यवहार अहंकार और संवेदनहीनता को दर्शाता है।

भावनाओं की अनदेखी का परिणाम: जब रिश्ते में केवल अधिकार और नियंत्रण का बोलबाला होता है तो साथी की भावनाओं, असहमति या मानसिक स्थिति की कोई परवाह नहीं होती। इसका असर सीधे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है- तनाव, चिंता और असुरक्षा बढ़ती है। बार-बार अहंकार और नियंत्रण की स्थिति में साथी को यह अनुभव होता है कि उसके त्याग, समझौते और सहनशीलता की कोई कदर नहीं है, जैसे- कविता हमेशा अपने साथी की बातों को समझने की कोशिश करती थी, लेकिन हर छोटे निर्णय पर उसे कटु टिह सुननी पड़ती थीं। समय के साथ उसका आत्मसम्मान
कमजोर होने लगा और वह मानसिक रूप से थक गई। इस तरह के अनुभव यह दर्शाते हैं कि केवल अधिकार और नियंत्रण वाले रिश्ते लंबे समय तक किसी के लिए सुरक्षित और
सुखद नहीं रह सकते।

सीमाएं तय करना और सम्मान बनाना:
सच्चा प्यार केवल अधिकार और नियंत्रण का नाम नहीं है। यह तब टिकता है जब दोनों पक्ष सम्मान, समझ और संवेदनशीलता क साथ जुड़े हों। उदाहरण के लिए, अगर कोई साथी किसी व्यक्तिगत निर्णय या अनुभव के बारे में असहज महसूस करता है तो उसका साथी इसे सम्मानपूर्वक समझे और आलोचना न करे। साथी की भावनाओं की कदर करना, असहमति को स्वीकार करना और आवश्यक सीमाएं तय करना प्रेम का वास्तविक रूप है। ऐसे रिश्तों में व्यक्ति मानसिक रूप से सुरक्षित होता है और उसका आत्मसम्मान तथा भावनात्मक संतुलन बना रहता है।

अध्ययनों के अनुसार, रिश्तों में लगातार ‘मैनिपुलेट’ करना, आलोचना करना और भावनाओं की अनदेखी करना व्यक्ति की आत्म-छवि और आत्म-सम्मान पर दीर्घकालीन असर डालता है। समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के अध्ययन बताते हैं कि रिश्तों में शर्तों और अहंकार का प्रभाव लंबी
अवधि में नकारात्मक होता है। ऐसे रिश्तों में रहने वाले लोग अक्सर तनाव, अवसाद और चिंता का सामना करते हैं। उनके निर्णयों पर भरोसा कम होता है और वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में
हिचकिचाते हैं। आदित्य की कहानी से इसे समझें। वह हमेशा अपने साथी की इच्छाओं का सम्मान करता था और उसे नाराज न करने के लिए कई बार अपनी बात मान लेता था। लेकिन साथी लगातार नियंत्रण और आलोचना करती थी। समय के साथ आदित्य इस सब से थक गया और उसके
अंदर निराशा व असुरक्षा पैदा हो गई, जिसने उसके मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाला। इसके अलावा, छोटे-छोटे उदाहरण जैसे रोजमर्रा की जिंदगी में मित्र या परिवार में किसी के अहंकार के चलते किसी की भावनाओं की अनदेखी होना भी मानसिक बोझ बढ़ाता है। जब कोई बार-बार अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के बावजूद नजरअंदाज किया जाता है, तो उसके अंदर
असहायपन और अकेलापन उत्पन्न होता है।

सुरक्षित और संतुलित संबंध बनाने के उपाय

Tips for building a safe and balanced relationship
Tips for building a safe and balanced relationship

1. संवाद के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करें।
2. साथी की असहमति और भावनाओं का सम्मान करें।
3. रिश्तों में केवल अधिकार और नियंत्रण के बजाय समझ और संवेदनशीलता पर ध्यान दें।
4. आवश्यक सीमाएं तय करें और उन्हें निभाएं।
5. आत्मसम्मान और मानसिक शांति को प्राथमिकता दें।

सुरक्षित, संतुलित और समझदार संबंध में हर व्यक्ति को अपनी जगह, अपनी भावनाओं और निर्णयों का अधिकार मिलता है। इस तरह के रिश्ते मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते हैं और जीवन में स्थिरता और खुशी बनाए रखते हैं। कई मनोवैज्ञानिक व्यवहार विशेषज्ञ ‘मैनिपुलेट’ शब्द का उपयोग करते हैं, जिसका अर्थ है किसी के व्यवहार को अपने अनुसार मोड़ना या नियंत्रण करना।
यह शब्द ऐसे रिश्तों में हो रहे ‘सटल
मैनिपुलेशन’ को समझने में मदद करता है। यदि हम इन संकेतों को पहचान लें और समय रहते समाधान करें, तो रिश्ते में स्थायित्व और संतुलन बनाए रखा जा सकता है। रिश्तों में प्रेम तभी टिकता है जब यह सम्मान, समझ और संवेदनशीलता पर आधारित हो। यही सीख हमें जीवन में
सुरक्षित, स्वस्थ और संतुलित संबंध बनाने में मदद करती है।