Summary: रिश्तों की रस्साकशी में पुरुष की भावनाएं और मानसिक स्वास्थ्य कैसे प्रभावित होते हैं
भारतीय समाज में पुरुषों को अक्सर एक साथ बेटा, पति और घर का सहारा बनने की उम्मीदों के बोझ तले जीना पड़ता है। मां और पत्नी के बीच भावनात्मक संतुलन बनाना उनके लिए एक ‘अदृश्य युद्ध’ बन जाता है, जिसमें वे चुप रहकर भीतर से टूटते जाते हैं। यह भावनात्मक तनाव उनके मानसिक स्वास्थ्य और कार्यक्षमता को प्रभावित करता है।
Balancing Mother Wife Relationship: भारतीय समाज में एक पुरुष से सिर्फ एक व्यक्ति बनने की उम्मीद नहीं की जाती है, उसे एक बेटा, एक पति, एक पिता, एक कमाने वाला और एक ‘मजबूत इंसान’ बनने की लगातार जिम्मेदारी दी जाती है। लेकिन इन सभी भूमिकाओं के बीच जो सबसे गहरा संघर्ष होता है, वह होता है मां और पत्नी के बीच संतुलन बनाए रखना। यह भावनात्मक संतुलन एक सहज निर्णय नहीं होता है बल्कि यह एक ऐसा ‘अदृश्य युद्ध’ बन जाता है जो हर दिन पुरुष के भीतर लड़ा जाता है। हाल ही में इंस्टाग्राम पर डॉ पुलकित कुमार ने इस पर एक शानदार वीडियो पोस्ट किया है।
भावनात्मक रूप से टूटने की शुरुआत
बाहर से शांत दिखने वाला पुरुष अंदर से धीरे-धीरे टूटता है। एक ओर मां की उम्मीदें होती हैं और वह सोचती है, “अब तो बहू आ गई, बेटा दूर होता जा रहा है”। दूसरी ओर पत्नी सोचती है, “तुम हमेशा मां की ही सुनते हो, मेरे लिए जगह कहां है?” पुरुष कुछ नहीं कहता, क्योंकि उसे सिखाया गया है, “मर्द बनो”, “बीच का रास्ता निकालो”, “झगड़ा मत होने दो”। लेकिन असल में वह हर दिन खुद को दो हिस्सों में बांट रहा होता है, एक तरफ मां की भावनाएं, दूसरी तरफ पत्नी का अपनापन।
धीरे-धीरे वह भावनात्मक रूप से थकने लगता है। किसी एक के लिए बोलना उसे अपराधबोध से भर देता है। वह चुप हो जाता है, लेकिन उस चुप्पी में कई अनकही बातें होती हैं। डॉ पुलकित कुमार कहते हैं, “पुरुषों में मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम का यह बहुत बड़ा कारण है। अगर वह पत्नी को प्राथमिकता दे तो वह खराब बेटा है और अगर मां को दे तो वह बुरा पति है। इसी लूप में वह चुपचाप दर्द को बर्दाश्त करता रहता है”।
काम पर भी पड़ता है असर

डॉ पुलकित कुमार कहते हैं, “पति और पत्नी के बीच, मां और बेटे के बीच लगातार होते मनमुटाव से उनके बीच भावनात्मक दूरी आती है, जो पुरुषों में इमोशनल बर्नआउट के रूप में बाहर निकलती है। पुरुष अपने परिवार में शॉक ऑब्जर्बर की तरह बन जाता है।” जब वह घर में संतुलन नहीं बना पाता, तो उसका सीधा असर उसके कामकाजी जीवन पर पड़ता है। वह ऑफिस में ध्यान केंद्रित नहीं रहता, छोटी छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन आने लगता है। उसकी कार्यक्षमता घटने लगती है और कॉन्फिडेंस में कमी आने लगती है। कई पुरुष इस मानसिक उलझन को शराब, सिगरेट या पूरी तरह चुप रहकर दबाने की कोशिश करते हैं। पर यह “अनदेखा तनाव” धीरे-धीरे उन्हें मानसिक रूप से बीमार कर सकता है, और एंजायटी, डिप्रेशन और यहां तक कि भावनात्मक शून्यता में बदल जाता है।
क्या समाधान है?
खुलकर बात करें
रिश्तों का संतुलन छुपाने से नहीं, समझाने से आता है। पुरुषों को चाहिए कि वे अपनी मां और पत्नी दोनों से ईमानदारी से बात करें। यह स्वीकार करना कि “मैं दोनों को प्यार करता हूं, लेकिन मुझे समझ नहीं आ रहा क्या करूं”, कमजोरी नहीं, साहस है।
सीमाएं तय करें
मां और पत्नी दोनों के साथ समय बिताना जरूरी है, लेकिन उनकी अपेक्षाओं में सीमाएं तय करना और खुद के लिए स्पेस लेना भी उतना ही आवश्यक है। यह तय करना पुरुष का ही काम है यह हेल्दी बाउंड्री बनी रहे और कोई भी इसे पार न करे।
थेरेपी अपनाएं
आज की तारीख में प्रोफेशनल काउंसलिंग कोई शर्म की बात नहीं है। अगर कोई पुरुष अपनी उलझनों को किसी तीसरे, निष्पक्ष व्यक्ति से शेयर करता है, तो वह हल्का महसूस करता है और संतुलन बेहतर बना सकता है।
पुरुष भी इंसान है
पुरुषों को ‘समझदार’, ‘मजबूत’, और ‘न्यायप्रिय’ कहकर उनके इमोशन की अनदेखी कर दी जाती है। लेकिन वे भी इंसान हैं, उनमें भी टूटने, थकने और सुनने की चाहत होती है। अगर समाज, परिवार और महिलाएं इस सच्चाई को समझें और पुरुषों को खुलकर बात करने का स्पेस दें, तो शायद हम एक ऐसा संतुलित घर बना पाएंगे जहां मां, पत्नी और बेटा तीनों भावनात्मक रूप से जुड़े रह सकें।
