Jewel Thief Review: आज जब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर लंबी कहानियों में क्रिएटिविटी और जुनून की भरमार है, फीचर फिल्मों का हाल वन-डे क्रिकेट जैसा हो गया है – न थ्रिल, न गहराई। ऐसी ही है ‘ज्वेल थीफ’, जिसमें रेहान (सैफ अली खान) एक मनमौजी चोर है। रेहान को रंजन औलख (जयदीप अहलावत) एक ‘रेड सन’ नाम के दुर्लभ अफ्रीकी हीरे को चुराने के लिए भाड़े पर लेचा है। फिल्म का शीर्षक ‘ज्वेल थीफ’ अपने आप में एक भारी विरासत को न्योता है, जो गोल्डी आनंद की ऐतिहासिक फिल्म से तुलना करवाता है। फिल्म में विजय आनंद का जिक्र भी आता है, परंतु श्रद्धांजलि के प्रयास में वह सृजनात्मकता खो जाती है। इसे और बेहतर किया जा सकता था।
सैफ और जयदीप दोनों पतले-दुबले और आकर्षक सूट्स में खूब फबते हैं। दोनों की संवाद अदायगी इतनी प्रभावशाली है कि यह कहना मुश्किल है कि किसकी आवाज में ज्यादा खिंचाव है। जहां ये दोनों सीन चुराने की होड़ में हैं, वहीं निकिता दत्ता अपने ग्लैमरस अवतार में दर्शकों का ध्यान खींचती हैं। लेकिन यह सौंदर्य भी तब काम नहीं आता है जब पटकथा सपाट और संगीत फीका हो।
पूरी फिल्म में स्टाइल और दिखावे की भरमार है। किरदारों का बर्ताव सतही है। कलाकारों की ईमानदारी भी तब बेकार साबित होती है जब कहानी के मोड़ कल्पनाशक्ति से कोसों दूर हों। संवाद लेखक सुमित अरोड़ा पर सबसे ज्यादा दया आती है जब वे प्रभाव जमाने के लिए गालियों का सहारा लेते हैं।
यहां निर्देशक कूकी और रॉबी कोई नयापन नहीं ला पाते। ‘मनी हीस्ट’ जैसे दौर में भी, फिल्म 70 के दशक की घिसी-पिटी चोरी की फिल्मों जैसी लगती है। गजब का बचपना तो यह है कि हीरा कुछ इंफ्रारेड किरणों और पासवर्ड से सुरक्षित है और इस अपराध को नैतिक ठहराने के लिए एक ब्लैकमेल की कहानी जोड़ दी गई है। इसी घिसे-पिटे नुस्खे में एक लाचार पुलिस अधिकारी भी जोड़ा गया है, जो चोर के मुकाबले मीलों पीछे चलता है। इसका जानबूझकर पीछे रखा जाना हद से ज्यादा अखरता है। लंबे समय बाद परदे पर लौटे कुणाल कपूर भी कहानी में जान नहीं फूंक पाते, बल्कि सिर्फ खालीपन बढ़ाते हैं।
यहां हुई असली चूक
इसकी भव्यता देखते हुए इसे थिएटर में रिलीज़ किया जा सकता था। लेकिन मौजूदा दौर में जब बॉक्स ऑफिस पर सफलता की कोई गारंटी नहीं है तो इस औसत फिल्म पर कौन दांव लगाता।फिल्म की असली चूक इसकी पटकथा में है। आपके पास दो करिश्माई कलाकार थे, जो ऊर्जा से भरे हुए थे, लेकिन अफसोस… लेखन में जोश और गहराई की कमी थी। अगर पटकथा थोड़ी और सधी हुई होती, तो यह फिल्म वाकई चमक सकती थी।
ऐसी फिल्मों की असली कला होती है अपनी कमजोरियों को चमचमाते प्रस्तुतिकरण से ढंकना, पर ‘ज्वेल थीफ’ इस मोर्चे पर भी चूक जाती है। पूरी फिल्म ऐसी महसूस होती है जैसे कुछ सफल फिल्मों को देखा और कापी-पेस्ट करके जल्दबाज़ी में एक औसत प्रोजेक्ट ओटीटी के संग्रह के लिए तैयार कर दिया गया है। नेटफ्लिक्स के लिए यह घाटे का सौदा है। ऐसी फिल्में ना परदे पर देखी जाती हैं और ना ही ओटीटी पर। आप भी अपना वक्त बचाइए।
