Hindi Motivational Story: एक बहरूपिया राज-दरबार में राजा को नित नए वेश बदलकर दिखाता, उनका मनोरंजन करता और उनसे इनाम पाता। एक दिन राजा ने उससे कहा, “तुम्हारे करतब मैं देख चुका हूँ। अब कुछ ऐसा स्वाँग दिखाओ, जिससे कोई पहचान ना सके। यदि तुम ऐसा करने में कामयाब रहे तो मैं तुम्हें 100 स्वर्ण मुद्राएँ ईनाम में दूँगा।” बहरूपिया चला गया।
उसने नगर के बाहर एक पेड़ के नीचे आसन जमाया, अपने वस्त्रों को त्याग कर शरीर पर भस्म रमाई, मौन धारण किया और धूनी तापते हुए ध्यान लगाकर बैठ गया। नगर के लोगों को जब किसी तपस्वी महात्मा के आने की ख़बर लगी तो वे सैंकड़ों की संख्या में उसके दर्शनों को पहुँचने लगे। कोई उसके आगे भेंट या चढ़ावा वगैरह रखता तो वह तुरंत उसे दूसरों में बाँट देता। इससे उसकी ख्याति और भी बढ़ी।
कुछ दिन बाद राजा ख़ुद उसके दर्शन के लिए आए और बहुमूल्य उपहार भी साथ लाए। तपस्वी ने उन उपहारों को भी राजा के सामने ही लोगों में बाँट दिया। राजा की श्रद्धा बढ़ी और उन्होंने उस साधु को अपना गुरु मान लिया।
अगले दिन बहरूपिया राज दरबार में पहुँचा और ईनाम की 100 स्वर्ण मुद्राएँ माँगी।
राजा द्वारा कारण पूछने पर बहरूपिया ने कहा, “आपने कल जिसे अपना गुरु बनाया, वह मैं ही था। यह सुनकर राजा चकित रह गए। उन्होंने बहरूपिया से कहा, “तुमने मेरे दिए बहुमूल्य उपहार जनता में बाँट दिए, जबकि यहाँ मात्र 100 स्वर्ण मुद्राओं का इनाम लेने आए हो। तुम चाहते तो आसानी से उन उपहारों को रख सकते थे।”
बहरूपिया बोला, “हुजू़़र आपका कहना सही है, पर मैं साधु के वेश को कैसे कलंकित होने देता। यदि मैं लेने में जुट जाता तो साधु की गरिमा गिरती और उसपर से लोक श्रद्धा उठ जाती। ऐसे में लोग सच्चे साधुओं को भी संदेह की दृष्टि से देखने लगते।
साधु का स्वांग रचने पर भी उस वेश की गरिमा अक्षुण्ण रखना मैंने अपना कर्त्तव्य माना, जिस कारण मेरी पूजा हुई और आपको भेंट सहित मेरे पास पहुँचना पड़ा।“ यह सुनकर राजा ने ख़ुश होते हुए कहा, “तुम वाक़ई उच्च कोटि के कलाकार हो और अपनी कला का मान रखना जानते हो।” इसके बाद राजा ने उसे मुँह माँगा ईनाम देते हुए ससम्मान वहाँ से विदा किया।
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