Jesus Story: जीसस क्राइस्ट के जीवन में 18 वर्षों का एक ऐसा कालखंड है, जिसे ‘लॉस्ट इयर्स’ के नाम से जाना जाता है, पर इसके बारे में प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस कालखंड के बारे में अनेक मान्यतायें हैं, लेकिन सबसे प्रमुख मान्यता जीसस द्वारा भारत की यात्रा करने एवं बौद्ध धर्म का अध्ययन करने से संबंधित है।
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इस मान्यता के पक्षधर हैं, निकोलिया नोटोविट्च। वर्ष 1894 में प्रकाशित अपनी किताब ‘द अन्नोन लाइऌर्फ ऑफ जीसस क्राइस्ट में निकोलिया नोटोविट्च ने दुनिया को बताया कि जीसस क्राइस्ट ने अपने जीवन के कुछ वर्ष भारत में बिताये थे। नोटोविट्च ने वर्ष 1887 के अक्टूबर व नवंबर महीने के दौरान कश्मीर और लद्दाख की यात्रा की थी, जहां उन्हें हेमीस मठ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। नोटोविट्च ने अपनी किताब में हेमीस मठ में एक ऐसी पाण्डुलिपि मिलने की बात कही है, जिसमें जीसस द्वारा 14 से 30 वर्ष की उम्र में भारत भ्रमण करने का जिक्र था। इस पाण्डुलिपि में जीसस को संत ईसा के नाम से संबोधित किया गया था। पाण्डुलिपि का नाम था ‘मानव पुत्रों में श्रेष्ठ संत ईसा का जीवन, जो कि पाली भाषा में लिखी गयी थी और जिसमें 12 अध्याय और 224 श्लोक थे। पाण्डुलिपि में लिखा गया था कि 14 वर्ष की उम्र में ईसा ने सिंध नदी को पार करते हुए आर्यों की धरती में प्रवेश किया। उन्होंने भारत प्रवास के 6 वर्षों में पुरी, राजगृह, बनारस और अन्य पवित्र नगरों का भ्रमण किया था।
ईसा को भारत में ब्राह्मïणों के कोप का सामना करना पड़ा था, क्योंकि ईसा वैश्य और शूद्र को भी वेदों के अध्ययन का पात्र मानते थे। ऐसी विचारधारा के कारण उन्हें कपिलवस्तु पलायन करना पड़ा। ईसा ने वेदों और पुराणों की दिव्य उत्पत्ति को भी नकारा और साथ ही साथ यह बात भी मानने से इंकार कर दी कि ब्रह्मा, शिव, विष्णु आदि देवताओं के रूप में धरती पर अवतरण लेते हैं। कपिलवस्तु में ईसा ने 6 वर्षों तक पाली भाषा और बौद्ध ग्रंथों का विस्तृत अध्ययन किया और बाद में वे हिमालय की यात्रा पर चले गये। फिर, ईसा पश्चिम में पर्शिया की ओर चले गये।
कालांतर में जब श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी अभेदानंद ने नोटोविट्च की किताब पढ़ी तो उनके मन में हेमीस मठ जाकर उस पाण्डुलिपि को देखने और इस सत्य को प्रमाणित करने की इच्छा जाग्रत हुई। उन्होंने वर्ष 1922 में लद्दाख में स्थित हेमीस मठ का भ्रमण किया और उस प्राचीन पाण्डुलिपि को देखा, जो तिब्बती भाषा में लिखी थी। मूल पाण्डुलिपि पाली भाषा में थी, जो मारबौर मठ में सुरक्षित थी। एक लामा की मदद से उन्होंने इसके कुछ भाग का अनुवाद किया और अपनी बंगाली पुस्तक, जिसका अंग्रेजी में अनुवाद ‘जर्नी इंटू कश्मीर एंड तिब्बत जो रामकृष्ण वेदान्त मठ, कोलकाता, द्वारा प्रकाशित किया गया था में संगृहत किया गया।
नोटोविट्च की इस महत्त्वपूर्ण खोज के बाद इस दिशा में अनेक लोगों ने काम किया। होल्गर केर्स्टेन ने वर्ष 1983 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘जीसस लिव्ड इन इंडिया में लिखा कि उन्होंने हेमीस मठ जाकर उस पाण्डुलिपि को देखने की इच्छा जाहिर की, पर वहां के प्रधान लामा ने कहा कि वह पाण्डुलिपि उपलब्ध नहीं है। एलिजाबेथ क्लारे प्रोफेट ने अपनी पुस्तक ‘द लॉस्ट इयर्स ऑफ जीसस, जो 1984 में प्रकाशित हुई थी में इस दिशा में हुई समस्त शोध कार्यों को संकलित किया गया है।
हालांकि, चर्च आज भी इस बात को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं करता कि जीसस का भारत से कभी कोई नाता रहा था, लेकिन इस तथ्य को मानने वालों की दुनिया में कमी नहीं है। भारत में प्रसिद्ध गुरु ओशो ने जीसस के भारत से गहरे संबंधों का जिक्र अपने प्रवचनों में किया है और कहा है कि जीसस के प्रवचनों में बौद्ध धर्म के प्रतिबिंब को साफ तौर पर देखा जा सकता है।
