Hindi Adhyatm: प्रकृति के सभी जीवों की संरचना सृष्टिï रचयिता ब्रह्मïा ने की है। प्रेम सृजन का पर्याय है चाहे जीव, जन्तु हो या मनुष्य अन्यथा संसार का कोई भी प्राणी हो उसे जीवन में प्रेम की आवश्यकता पड़ती है। प्रेम संजीवनी बूटी भी है और लेप भी, ईश्वर भी प्रेम का ही प्रतिरूप है।
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रामचरित मानस में भगवान शिव कहते हैं-
हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
प्रेम ते प्रगट होहिं मैं जाना॥
अर्थात्ï विधाता सर्वव्यापक है परंतु प्रेम से ही वह प्रकट होता है। श्रीमद्ïभागवत के अष्टïम स्कंध में गजेन्द्र मोक्ष की कथा है-
गजों का राजा ग्राह्यï की चपेट में आ गया तो उसके सभी साथी उसको छोड़कर चले गये। संकट में सबने उसका साथ छोड़ दिया, तब उसने प्रेमभाव से ईश्वर को पुकारा, भगवान आए उन्होंने गजेन्द्र का उद्धार किया।
इस जीवन में प्रेम का महत्त्व सर्वाधिक है प्रेम एक ऐसा दिव्यशास्त्र है जो अचूक एवं अद्वितीय है।
तभी तो कबीरदास कहते हैं-
‘ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि
यदि हम भारतीयों में नि:स्वार्थ एवं अहंमुक्त प्रेम होता तो हमारा राष्टï्र कभी भी पराधीनता की बेड़ियों में नहीं जकड़ता।
प्रकृति ने मनुष्य को एक विवेकवान प्राणी बनाया है परंतु हम मनुष्य अपने विवेक का सकारात्मक सदुपयोग कम करते हैं। प्रेम के वास्तविक रूप से हम अनभिज्ञ रहते हैं। प्रेम एक ऐसा निष्काम भाव जो हमारे अंदर में परमात्मा के प्रति श्रद्धा एवं सत्कर्मों के प्रति निष्ठïा उत्पन्न कर दे।
गोस्वामी तुलसीदास जी ‘रामचरित मानस में लिखते हैं-
‘मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी
अर्थात्ï जो भक्तिपूर्वक ईश्वर को रमण करते हैं वे उन्हें अत्यधिक प्रिय हैं।
चाहे संत हो या आम गृहस्थ प्रेम सभी चाहते हैं प्रेम के प्रभाव से कोई वंचित नहीं रहता, सृष्टिï के प्रत्येक जीव में प्रेम का अंकुर अंकुरित है।
वर्तमान परिवेश में मनुष्य की संकीर्ण मानसिकता ने प्रेम शब्द का अर्थ संकुचित कर दिया है, प्रेम कभी दैहिक नहीं होता जो भाव इस शरीर से उत्पन्न होता है उसे प्रेम नहीं वासना कहा जाता है, हां यह कहा जा सकता है कि वासना का रूपांतरण प्रेम में होता है परंतु वासना एक शारीरिक प्रक्रिया है परंतु आत्मा की गहराइयों को जानने एवं परमात्मा तक पहुंचने का अद्धितीय मार्ग प्रेम है। महर्षि नारद ने प्रेम शब्द को परिभाषित करते हुए भक्ति सूत्र कहा है-
गुणरहित कामनारहित प्रतिक्षण वर्धमानविच्छिन्नम सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्ï॥
अर्थात्ï यह प्रेम गुणरहित है, कामनारहित है, प्रतिक्षण बढ़ता है विच्छेदरहित है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है और अनुभवरूप है।
वास्तव में जहां कामनायें और अपेक्षायें होती हैं वहां प्रेम नहीं होता, वहां तो स्वार्थपूर्ति के लिए प्रेम को माध्यम बनाया जाता है।
प्रेम शब्द से अधिकतर मनुष्य जाति भ्रमित हो उठती है, प्रेम सीमित नहीं प्रेम व्यापक है। महात्मा बुद्ध के जीवन का एक मार्मिक प्रसंग है- अभिजात वर्ग के पुरुष सभी एक सभा में बैठे थे उन पुरुषों में भगवान बुद्ध ने घोषणा की ‘इस संसार में प्रेम नहीं हैÓ भगवान बुद्ध के इस कथन से भीड़ में हलचल मच गई, सबने कहा कौन है जो कहता है, इस संसार में प्रेम नहीं है, संसार में प्रेम तो कण-कण में व्याप्त है। प्रेम पर बड़ी-बड़ी बहस होने लगी, सबको जानते सुनते हुए महात्माबुद्ध ने फिर गंभीर भाव से कहा ‘संसार प्रेम से रिक्त है, उनके शिष्य आनन्द ने पूछा प्रभु इस संसार में प्रेम नहीं है यह कथन बहुत विचित्र लग रहा है। इस पर बुद्ध मुस्काये उन्होंने आनन्द को समझाया आनन्द सुन प्रेम का अर्थ है ‘किसी अस्तित्व को इस कदर टूट कर चाहना कि उसके अस्तित्व में ही प्रत्येक इच्छाओं का रंग घुलता-मिलता हुआ महसूस हो। सुख को ध्वंस कर मिटा कर एक दूसरे में स्वयं को बो देना, फिर शांत भाव से बैठकर निहारना स्वयं को उगते हुए अपने अस्तित्व में उस अंकुरण का एहसास करना कि स्वयं को मिटाने का अनुभव कैसा होता है। प्रेम अस्तित्व का मर्म है, धुरी है, जिस पर अस्तित्व टिकता है, आधार पाता है ये न तो हृदय में समाहित हो पाता है और न ही देह को धारण कर सकता है। प्रेम आत्मा का सर्वोच्च सौन्दर्य है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
मीराबाई कहती हैं-
मैं तो गिरधर के घर जाऊं।
गिरधर म्हारौ सांचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊं॥
रैण पड़े तब ही उठि जाऊं, भोर भये उठि जाऊं॥
रैण दिना बांके संग खेलूं, ज्यों-त्यूं वाहि रिझाऊं॥
जो पहिरावै सोई पहिरूं, जो दे सोई खाऊं॥
मेरी उनकी प्रीत पुरानी, उण बिन पल न रहाऊं॥
जहां बैठावै-तितही बैठूं, बेचै तो बिक जाऊं।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊं।
मीरा कृष्ण से ना कोई अपेक्षा करती हैं, ना कृष्ण की उपेक्षा करती हैं, वह तो सिर्फ कृष्ण से प्रेम करती हैं, मीरा में स्वार्थ नहीं त्याग है कृष्ण जैसे चाहेंगे वह कृष्ण से वैसा ही प्रेम करेंगी, कृष्ण के लिए वह रानी से जोगन बन गई हैं तथा कृष्ण के लिए वह बिकने को भी तैयार हैं।
प्रेम वही कर सकता है जो आत्मिक सौंदर्य का उपासक हो।
आज से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व की बात है-
जापान के एक प्रतिष्ठिïत बौद्ध भिक्षु ने पाली में प्राप्त उपदेशों को जापान में प्रचारित करने के लिए जापानी भाषा में अनुवादित किया समस्या आई प्रकाशन की, धन जरूरी था, संघ के नियमानुसार किसी से मांगना विरुद्ध था, स्वयं ही भिक्षा मांगते-मांगते जितना धन मिल जाये मात्र उतने से ही व्यवस्था बनानी थी। उनके गृहस्थ शिष्यों ने अपनी आजीविका में एक हिस्सा इसके लिए सुरक्षित रखने की अपील मान ली पांच वर्ष में इतना धन एकत्र हो गया कि प्रकाशन की व्यवस्था बन सके। अचानक जापान के एक क्षेत्र में ऐसा घोर दुर्भिक्ष पड़ा कि स्थिति देख भिक्षु करुणा विगलित हो उठे। उन्होंने सारा धन पीड़ितों की सेवा में लगा दिया, भूखों को भोजन, वस्त्रहीनों को वस्त्रों की व्यवस्था की गई, सारी राशि इसी में लग गई। योगवश कुछ वर्षा हुई और दुर्भिक्ष के बादल छंट गये, फिर धन संग्रह आरम्भ किया गया।
दस वर्षों में और भी अनुयायी धन राशि एकत्र कर प्रकाशन की व्यवस्था करने लगे। इस बार उस क्षेत्र में अतिवृष्टिï आ गई, इस बार भी महाभिक्षु ने एकत्र किया सारा धन बाढ़-पीड़ितों के सहयोग में लगा दिया। अब उनके सभी अनुयायियों ने उनका साथ छोड़ दिया, दो बार एकत्र धन महाभिक्षु दान में लुटा चुके थे किन्तु महाभिक्षु ने दान संग्रह जारी रखा। योग ऐसा रहा कि पुस्तक प्रकाशित हो गई, मुखपृष्ठï पर लिखा था- ‘तृतीय संस्करण’ लोगों ने जिज्ञासावश पूछा कि पहले दो संस्करण कौन से हैं? महाभिक्षु बोले- वे उन्हीं को दिखाई देंगे, जिनके पास सेवा और प्रेम की आंखें हैं। यह ग्रंथ अति लोकप्रिय हुआ और बौद्ध धर्म का आधार बनाने में सफल हुआ। प्रेम वही कर सकता है जो पवित्र हो। पवित्रता ऐसी कि जिससे स्वयं नारायण भी आश्चर्यचकित हो जाएं इसीलिए कबीरदास ने कहा है-
‘ये तो घर है प्रेम का, ऊंचा अधिक इकंत।
शीश काटि पग तर धरै तब पैठे कोई संत॥
अर्थात्ï ये प्रेम का घर है यह बहुत ही ऊंचा और एकांत में बना हुआ अद्ïभुत घर है जो अपने शीश को काटकर बलिदान कर सके वही संत सुजान इसमें आकर बैठता है अर्थात्ï प्रेम के लिए आत्ममूल्यांकन और त्याङ्खअनिवार्य है। प्रेम के द्वारा ही हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं। गुरुग्रंथ साहब में कहा गया है-
‘जिन प्रेम कियो, तिनहिं प्रभु पायो
