ye apatr hai
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एक धनपति ने श्रीनाथजी को 10 हजार स्वर्णमुद्राएँ अर्पित कीं। लेकिन वह उन मुद्राओं को मूर्ति के समक्ष एक-एक गिन-गिनकर रखने लगा। वह जोर से थैलियों में से उन्हें निकालता और खूब खनखनाहट होती। खनखनाहट सुन मंदिर में भीड़ हो गई।

वह और भी आवाज कर के मुद्राएँ गिनने लगा। जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती, उसके त्याग का आनन्द भी बढ़ता जाता था। आखिर जब वह सारी मुद्राएँ गिन चुका और उसने गौरव से वहाँ इकट्ठे लोगों की तरफ देखा तो पुजारी ने उससे कहाः “बन्धु, ये मुद्राएँ वापस ले जाओ। श्रीनाथजी ऐसी भेंट स्वीकार नहीं करेंगे।”

धनपति हैरान हुआ। उसने पूछाः “क्यों महाराज?” पुजारी ने कहाः “प्रेम क्या व्यक्त किया जा सकता है? प्रार्थना क्या व्यक्त करने की वस्तु है? लेकिन तुम्हारे हृदय में तो विज्ञापन की वासना है। ऐसी वासना समर्पण में असमर्थ है। ऐसी वासना त्याग में असमर्थ है। ऐसी वासना प्रेम के लिए अपात्र है।”

ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंIndradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)