cold coffee
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

मैं कॉफी पी रही थी। रिंग बजी और मैं खडी होकर फोन तक गई। ऐसा लगता था जैसे रिंग उछलकर मुझे खींच रही हो! मैंने फोन उठाया और मैं ‘हेलो’ बोलूं इससे पहले, ‘तुम दो दिन मेरे पास आ जाओ’- मेरे हाथ से गरम-गरम कॉफी ढलकी और मेरा हाथ तनिक जल गया।

मेरी आंखो के सामने उसका चेहरा आ गया। रिसीवर में से आवाज के साथ जैसे स्वाति के आंसू भी छू रहे थे। मुझे लगा, बात सिरियस लगती है वरना वो बुलायेगी नहीं। हम दोनों अक्सर अपने काम में व्यस्त रहते थे। ज्यादातर फोन पे ही मिला करते थे।

क्या हुआ होगा? -मैं सोच रही थी

मैंने स्वाति से कई बार पूछा था। वह चुप रही थी, जब विशाल उसे छोड़कर अमेरिका चला गया था… वैसे वह मुझसे कोई बात छिपाती नहीं थी पर इस मामले में उसे मौन रहना था और मैंने स्वीकार कर लिया था। उस घटना को बीते हुए पंद्रह साल बीत गये। उस वक्त मैंने काफी सोचा था पर कुछ परिणाम हासिल नहीं हुआ था। उसकी बातो से भी कोई इशारा नहीं मिला था कि अचानक दोनों के बीच क्या हो गया। उसने बस एक चुप्पी साध ली थी और मैंने उसे स्वीकार कर लिया था। हा या ‘ना’ से ज्यादा वह मुश्किल से बोलती। एक बात थी कि वह मुझसे दूर नहीं हुइ थी। उल्टा मुझे प्रतीत होता था कि अब उसे मेरी जरुरत और ज्यादा है।

‘क्या हुआ?’ मैंने स्वाति से कितनी बार पूछा था! वह चुपचाप मेरा हाथ पकडकर बैठी रहती थी। कभी-कभी वह अचानक मेरी ऑफिस में आ जाती,

‘तुम अपना काम करो, मैं यहाँ बैठकर पढती हूँ।

बस बात खतम! ना कुछ पूछो, ना कुछ बताओ!

मैं भी क्या कर सकती थी?

मेरा ध्यान उसी पर रहता। मुझे समझ में आता था कि वह सिर्फ पढने का दिखावा करती थी। कभी-कभी उसकी आंखें नम हो जाती थी और मैं बेबस होकर उसे देख लेती! मुझे लगता था कि बात कहकर वह अपना जी हल्का कर ले तो अच्छा है, पर ऐसा नहीं हुआ।

धीरे-धीरे उसका रोना भी बंद हो गया था। वह स्वस्थ होती जा रही थी। खास तौर पर अपने नन्हें से बेटे परम के साथ वह बहुत खुश दिखती।

आज अचानक क्या हुआ कि उसने मुझे बुला लिया! और वो भी दो दिन के लिये!

ओह, कॉफी ठंडी हो रही थी और मुझे कप मुँह लगाने का मन नहीं हो रहा था। आंखो के सामने फिर से पूरे दृश्य घुम रहे थे।

विशाल गया सो गया! ना कोई फोन, ना खबर! उसने मुड़कर स्वाति की तरफ देखा ही नहीं। जैसे वह उसे पहचानता ही नहीं था! उस वक्त परम बहुत छोटा था। विशाल के साथ पहले प्यार और फिर शादी। उसने सांसों के साथ अपने हृदय में विशाल के प्रति विश्वास भी भर लिया था। पर कितने दिन यह टिका? बस, दो साल में तो सब खतम हो गया! स्वाति और परम दोनों को छोड़कर विशाल गायब हो गया! स्वाति के जीवन में शुन्यावकाश छा गया! इस तरह विशाल का चले जाना, स्वाति को तोड़ देने के लिये काफी था!

घरवाले पहले से नाराज ही थे। उन्होंने स्वाति को पछताने का पूरा मौका दिया। मेरे सिवा स्वाति का कोई नहीं था, वैसे भी ऐसे बुरे वक्त में दिलासा कितना काम आ सकता है! भीगी आंखे, सूना चहेरा और टूटा हुआ मन… उसने थोड़ा वक्त ऐसे ही बिताया पर… तोड़ देनेवाला भी मन होता है और जुड़ने की ताकत देनेवाला भी मन ही! अंदर बैठकर वह खुद ही अपने घाव भरता रहता है। जिस ताकत से वह विशाल के लिये समाज से लड़ी थी वही ताकत उसने अपने लिये बटोर ली। वह पहले से ही मन की पक्की थी। जो तय किया सो किया, पीछे हटना उसका स्वभाव नहीं था। यही चीज अब फिर से उसके काम आई। स्वाति की आंखो के सामने अब परम था। परम की परवरिश और उसकी जिंदगी स्वाति के सामने पहाड़ की तरह फैले थे। उसने ठान ली। एक गलती हूई पर उसे अब जिंदगी का सवाल सही गिनना था। नौकरी थी इसलिये पैसो की समस्या नहीं थी, यह बड़ा सहारा था।

बिना कोई बदलाव, वही हुआ। स्वाति अकेले परम की परवरिश करती रही। परम को गोद में बिठाने में, बाग में झूला झुलाने में, होमवर्क कराने में, स्पोर्ट्स और अन्य एक्टिविटी में इनाम लेने में वह अपनी किस्मत को फिरसे अपनी मरजी के मुताबिक मोड़ने लगी।

परम ग्यारह साल का हुआ और एक दिन अचानक टेलिफोन की रिंग बजी। स्वाति ने फोन उठाया और आवाज सुनी विशाल की! उसका हाथ हिल गया। बडी मश्किल से वह ‘हेलो’ बोल पाई।

‘परम के साथ बात कर सकता हूँ?’- स्वाति कैसे स्वस्थ रह सकती थी! और उसके पास सोचने का समय भी नहीं था।

परम खेल रहा था। उसने परम को बुलाया। उसकी समझ में पापा नाम का व्यक्ति अपने जीवन में था ही नहीं। स्वाति उलझन में पड़ी। परम को कहे तो क्या कहे? उसने बिना कुछ बोले परम के हाथ में फोन पकड़ा दिया।

‘बात करो बेटा’

ममा ने कहा इसलिये परम ने बात की। जो पुछा गया उसके जवाब दिये। फिर एकदम से,

‘आप मम्मा के साथ बात करो’ कहकर उसने मम्मा के हाथ में फोन पकड़ा दिया, आखिर बालक था, अनजाने आदमी से कितनी बातें करता! हाश, पर फोन कट गया था।

‘मम्मा कौन बोल रहा था?’

‘उन्होंने तुम्हें क्या कहा?’

‘मै तेरा पापा बोल रहा हूँ, ऐसा क्यूं कहा मम्मा?’

स्वाति अब बाप-बेटे के बीच खड़ी थी। उसे तय करना था कि क्या करे! इतने सालो बाद विशाल का फोन आया, उसको अपना बेटा याद आया मतलब अब फिर से उसका फोन आनेवाला था, और वो परम के लिये ही होगा। उसे स्वाति के साथ बात करने की जरूरत महसूस नहीं हुई थी। वह तो बीच में माध्यम थी, रिसिवर थी। अब ये सिलसिला चलने दे या रोक दे? स्वाति और मेरे बीच इस बारे में लम्बी चर्चा हई थी।

‘परम को पढाऊंगी, बडा करुंगी, उसे जो बनना हो- बनाऊंगी, मुझसे जो बन पडेगा, करुंगी और उसे सुखी देखकर मरुंगी- बस स्वाति के मन में इतना तय था। किसी भी चीज के लिये उसने विशाल के पास से कोइ आशा नहीं रखी थी। इतना ही नहीं, परम बड़ा हो जाये उसके बाद भी विशाल के साथ उसके अलगाव के बारे में उसे एक शब्द भी नहीं कहना है, उसमें भी उसका मन पक्का था।

विशाल का फोन आ गया ये एक अन-अपेक्षित घटना थी। विशाल को अपना बेटा याद आया ये अच्छी बात थी पर स्वाति के साथ उसे कुछ भी बात करने की जरुरत महसुस नही हुई यह स्वाति को बड़ा धक्का देनेवाली बात थी। हालात मुश्किल थे और हम दोनों ने मिलकर यह तय किया था कि बाप-बेटे के बीच में दीवार नहीं बनना है। अगर स्वाति परम को अपने पापा से बात न भी करने दे तो ये कितने दिन हो पायेगा? जब वह बड़ा होगा तब अगर विशाल चाहेगा तो परम के साथ नाता जोड ही सकता है, फिर क्यूं बाधा बने? जो चीज अपने हाथ में ही नहीं है, उसे छोड़ देना ही अच्छा है। किस्मत में जो होगा, सो होगा, देखा जायेगा।

परम का सवाल आने ही वाला था सो आया।

‘पापा हमारे साथ क्यूं नहीं है?’

‘उनकी नौकरी अमेरिका में है और मेरी यहाँ। साथ नहीं रह सकते बेटा!’

अब परम के होठों पर ‘पापा’ शब्द बैठ गया था। महिने में एक-दो बार फोन जरुर आता। बाकी सबकुछ युं ही चलता रहा। स्वाति ने परम से भी कभी न पूछा, ‘क्या कहते थे?’ उसने ये बात भी स्वीकार कर ली, चुपचाप।

‘पापा क्यूं कभी नहीं आते, या फिर मम्मा के साथ क्यूं बात नहीं करते’ ये समझने में परम को बरसों लगे, लेकिन तब तक वह एक बात समझ चका था कि ऐसे सवालो का कोई मतलब नहीं था।

हम जब भी मिलते थे, स्वाति की जुबान पर परम की और अपनी काम की ही बातें रहती। अलग होने के वक्त उसका हाथ थामने या उसके गले मिलने से कही उसके दिल पर जरा सा मरहम लगता होगा।

दिन, महीने, बरस पानी की तरह बह गये। परम ग्रेज्युएट हो गया था और स्वाति खुशी के मारे फूली नहीं समाती थी। उसने अकेले जीवन का ये संग्राम जीता था। परम की पापा के साथ बातें होती रहती थी और स्वाति ने उसके बारे में कभी पूछा नहीं था। ऐसी बातो में उसके मन की दृढ़ता गजब की थी। परम मम्मा के अकेलेपन को भी अच्छी तरह समझने लगा था। अकेले खुद को बड़ा करने में मम्मा ने कितनी मुसीबतें झेली होगी उसका भी कुछ कुछ अंदाज उसको था। संजोग ने उसे समय से पहले बड़ा बना दिया था।

आज अचानक क्या हुआ, मेरी समझ में नहीं आ रहा था। वैसे तो हम एक ही शहर में थे पर उसका कहना- ‘दो दिन छुटी लेकर आ जा’- और वह भी समझती थी. ऐसे अचानक से छटी लेना आसान नहीं था पर फिर भी उसने कहा मतलब मामला सिरियस था।

वैसे एक बड़ी गम्भीर परिस्थिति इससे पहले आ चुकी थी जब परम ने अमेरिका जाने की बात कही थी। वो बात नहीं थी, बोम्ब था। विशाल और परम के बीच बातों का चलना शुरु हुआ तब से स्वाति के दिल में डर-सा बैठ गया था, पर उसने परम पर भरोसा रखना ठीक समझा था। विशाल ने उसे अमेरिका बुलाया और परम उत्साह से भर गया ये देखकर स्वाति हिल गई थी। बात आईने की तरह साफ थी। अमेरिका जाने का लालच छोटा नहीं था।

उस वक्त भी हम दोनों ने मिलकर- जो सिद्धांत पहले तय किया था कि बाप-बेटे के बीच में नहीं आना है- उसी को पकड़े रहे। बाप बुलाता है और बेटा जाने में राजी है तो जाने दो उसे। स्वाति ने फिर से एक बार हकीकत को स्वीकार कर लिया। हालांकि इस बार ये स्वीकार करना अति कठिन था क्योंकि परम को यहाँ तक पहुंचाने मे स्वाति ने अपना पूरा यौवन न्योछावर कर दिया था और अब उसे राहत पाने का समय आया था, तब बेटा उसको छोड़कर बाप के पास जाने के लिये तैयार हुआ था। स्वाति से उसके बुढापे का सहारा छीन रहा था!

‘मम्मा चिंता क्यूं कर रही है? पापा मुझे मास्टर्स करने वहाँ बुला रहे है। उतना पढकर मेरा करियर बन जायेगा। उसके बाद मैं तेरे पास तो हूँ ममा! मैं तुम्हें छोड़कर कही नहीं जानेवाला!’

स्वाति को अब शब्दों पर भरोसा नही रहा था पर जो करना था, करना था। हाँ या ना का कोई सवाल नहीं था, उसका कोई मतलब भी नहीं था। परम गया। पापा ने टिकिट और पेपर्स भेजे थे।

परम के फोन, लेटर्स सब बराबर आते रहे। स्वाति उन शब्दों पे खड़ी परम के प्लेन की लेंडिंग की राह देखती। और करती भी क्या? अभी एक सप्ताह पहले ही परम का फोन था,

‘मम्मा, मास्टर्स करने में अभी छः महिने और लग जायेंगे। बस फिर मैं और तुम! अमेरिका से तेरे लिये क्या क्या लाना है, तुम लिस्ट बनाना शुरु कर दो।-स्वाति खुश थी, चलो बेटा वापिस तो आ रहा है!

लेकिन उसके बाद परम का कोइ फोन नहीं आया।

मैंने ऑफिस में फोन किया। झुठ बोलना मुझे कतई पसंद नहीं था लेकिन आज कोई चारा नहीं था।

‘मेरे अंकल सिरियस है और मुझे जाना पड़ेगा। दो दिन की छुट्टी चाहिये।’

ठंडी कॉफी मैंने सिन्क में डाल दी, मग साफ कर दिया। बेग में दो पेर सलवार सूट डालने में मेरे हाथ-पांव कांप रहे थे। स्वाति को फिर से फोन करने का मतलब नहीं था। उसके पास पहुंचे बिना कोई अनुमान लगाना व्यर्थ था। वैसे मन को रोकना भी मुमकिन नहीं था। मैं टैक्सी पकड़कर उसके घर पहुंची।

दरवाजा खुला ही था। स्वाति सूना चहेरा लिये सोफे पे बैठी थी। मैं उसके पास बैठ गई।

‘स्वाति, क्या हुआ? परम का फोन नहीं आया? तुम मोबाइल पर नम्बर लगा लो न! नई नई नौकरी है, हो सकता है, बीझी हो!’ –मै एक साथ न जाने कितना कुछ बोल गई।

स्वाति की आंखो तक मैं पहुंच पाती थी, उसके आगे कोई रास्ता नहीं मिल रहा था।

‘फोन तो आ गया, अभी आया।’ -वह शांत थी

मेरे कानो में गुंज रहा था-‘तुम दो दिन के लिये आ जाओ’ -इस वाक्य और उसके चहेरे का तालमेल बिठाना मुश्किल था।

‘क्या कह रहा था?’

‘मैं खुद को सम्हालना अच्छे से सीख गई हूँ। एक बार और मुझे साबित करना है। -स्वाति की आवाज जैसे गुफा में से आ रही थी।

‘वो तो तुम कर ही पाओगी, कोई शंका नहीं है लेकिन हुआ क्या, ये तो बता!’ -मुझे कोई ज्यादा गम्भीर घटना के निशान दिखाई दे रहे थी और मेरी धीरज खत्म होती जा रही थी।

मेरे मन में था कि परम अब इंडिया वापिस आना नहीं चाहता होगा। ऐसा होना स्वाभाविक था।

‘परम को यहाँ वापिस नहीं आना है, इतना तो मैंने सोच ही रखा था पर… पर…’ वह आगे बोल नहीं पाइ।

‘पर क्या स्वाति, आगे क्या? बोलो।।’

‘वह कहता है, मै इंडिया नहीं आ पाउंगा मम्मा, तुम अपनी नौकरी छोड दो और इधर आ जाओ’

‘ये तो अच्छा है स्वाति, तुम्हें बुला रहा है न! परम तुम्हे भुला नहीं ये तो ओर भी अच्छी बात है!’ –मैंने हँसने का झूठा प्रयास किया।

‘स्वाति नौकरी किस तरह छोड़े, उसके लिये उसे मशवरा करना होगाएक क्षण में मेरे मन में ये ख्याल आ गया।

‘ऐसा करो, तुम दो दिन के लिये आयी हो, बाद में मैं कुछ दिनों की छुट्टियां लेकर तुम्हारे पास आ जाती हूँ। बहुत दिनो से स्वामी विवेकानंद की किताबें लाकर रखी है, पढने का मौका नहीं मिल रहा था। अब पढूंगी। मन को शांति मिलेगी। स्वाति ने बडी शांति से कहा।

मैं उसकी पहेली सुलझा नही पा रही थी। वह मुझसे मदद मांग रही थी या मुझे ढाढस बंधा रही थी। और रहस्य अभी रहस्य ही था! मैं मौन रही। स्वाति मेरे मौन का अनुवाद कर सकती थी। उसने राज खोलते हुए कहा,

‘परम कहता है, मम्मा तुम्हें मेरे और डैडी के साथ रहना होगा! जब मैंने ये कहा कि मैं ऐसा नहीं कर सकती तब उसने अपना फैसला सुना दिया!

‘क्या?’ मै विचलित थी और वह एकदम शांत!

‘It’s your problem mom, you have to decide!’

दो पल रुककर वह बोली, चल मैं तेरे लिये कॉफी बनाती हूँ, तुम्हे कोल्ड कॉफी पसंद है न! दोनो वही पीयेंगे- और मैं उसके साथ, उसका हाथ पकड़े कीचन मे…।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’