darakte rishte
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

माँ के मंदिर मे सजे सुन्दर पुष्पों की सुगंध और जय माँ अम्बे का उद्घोष हम सबके मन-मानस को आह्लादित कर रहा था। अचानक पूजा करते-करते मंदिर के घंटे की डोरी को थामे हुए उनके हाथ जोर-जोर से डोरी को खींचने लगे। टन-टन-टन की तीव्र आवाज से मंदिर का भक्तिमय वातावरण बाधित होने लगा। मैं मन ही मन बुदबुदाई- “अरे! ये क्या, ईश्वर की उपासना है या ईश्वर से उलाहना?” और उन्हें रोकने के लिए मैंने बगल से हाथ बढा. उनका हाथ थाम लिया। एक क्षण के लिए तो आशु दी ने पलटकर मुझे देखा और फिर सकपकाकर आँखे मूंद ली, मानो पूजा भाव मे तल्लीन हो गई हों। हमेशा प्रसन्नचित्त रहने वाली आशु दी का निश्चित ही एक नया स्वरूप मेरे सम्मुख था।

तदुपरांत भगवान का प्रसाद ग्रहण कर मंदिर प्रांगण से बाहर निकल हम साथ-साथ चलने लगे। तभी मेरी मनोस्थिति को भाँप स्वयं ही बोल पड़ीं वो- “आज मेरी बेटी की बर्थडे है।”

“बेटी आपकी” – मैं आश्चर्यचकित हो बोली।

“हाँ”- मीनाक्षी, मैं एक बेटी की माँ हूं, मेरा एक दामाद व एक प्यारा-सा नाती भी है।

‘लेकिन, आप ने तो कभी बताया नहीं’

‘अरे, छोड़ न ये सब। देख सामने चाटवाला खड़ा है, चल, चलकर कुछ चटकारे लेते हैं।’ मै समझ गयी थी कि मन में अनेक बोझ लिए बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ी आशु दी अपने इन्हीं चटकारों से माहौल को कभी बोझिल नहीं होने देतीं।

कई वर्षों से हम एक ही बिल्डिंग में साथ रह रहे थे। शाम होते ही नीचे लॉन में आकर बैठना-घूमना, मंदिर जाना हमारा एक रूटीन बन गया था। मैं चिंतित हो सोचने लगी- आशु दी की एक बेटी है किन्तु कहाँ? आज से पूर्व तो उसके बारे में कभी नहीं सुना, चूँकि उनसे मैं बहुत ज्यादा दिल से जुड़ी थी। इसलिए मेरा असहज मन मुझे दूसरे दिन ही उनके घर खींचकर ले गया। चाँदी से सफेद बाल, अति आत्मविश्वासी आँखे और चेहरे पे सौम्य मुस्कान लिए आशु दी ने दरवाजा खोला और मुझे बड़ी गर्मजोशी से मुझे अंदर ले गयी।

कुछ देर बातचीत के उपरांत आशु दी बोली-

‘आओ चलो, तुम्हें अपना घर दिखाती हूँ, ये है मेरा बेडरूम। फिर सामने दीवार पर लगी एक लैमिनेटेड फोटो की ओर इशारा करते हुए बोलीं- “ये देख मैं, मेरे पति और मेरी बेटी सलोनी तथा दूसरी फोटो को इंगित करते हुए- ये हैं मेरी बेटी और दामाद’।

मैंने कहा- “आपकी बेटी तो बहुत सुन्दर है।”

“हाँ, अपने पापा की प्रतिकृति ही समझो। ये देखो, मेरी सलोनी का बेडरूम”

कमरे की साज-सज्जा से ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो इसमें अभी भी कोई रहता हो।

‘ये रहा मेरा डाइनिंग रूम’

वहां भी टेबल पर दो प्लेटों को इस तरह सजाया गया था कि जैसे अन्य किसी की भी प्रतीक्षा की जा रही हो। घर के हर कोने-कोने मे एक जीवंतता का अहसास था। अंदर कमरे में टंगी तस्वीरों को देख, मेरे दिमाग में अनगिनत चिंताएं पुनः आकार लेने लगी। इस तथ्य से तो मैं भलीभांति अवगत थी कि इनके पति अब इस दुनिया में नही हैं तो क्या इनके बेटी-दामाद भी…? क्या हुआ उनका? आने से कुछ समय पूर्व जिन प्रश्नों के उत्तर जानने की अपार जिज्ञासा मेरे मन में थी, उन्हें पूछने का साहस भी मैं अब जुटा नहीं पा रही थी।

थोड़ी देर बाद मेरे चेहरे के जिज्ञासु भाव को पढ़, गंभीर स्वर में बोली-‘सुन मीनाक्षी, सलोनी मेरी बेटी है। मैंने मुस्कुरा कर कहा- “जी अच्छा, तो कहाँ रहती है वो अभी?” शांत मुख आशु दी के स्याह पड़ते चेहरे से अथाह वेदना की सुनामी अनियंत्रित हो अश्रुधार बन बह चली। मैंने उन्हें रोकने की कोई कोशिश भी नहीं की, क्यूंकि मैं जानती थी कि अंदर के जख्मों को दुरुस्त करने का अन्य कोई माध्यम भी नहीं है।

कुछ देर पश्चात शांत होकर बोली- “मीनाक्षी, कभी तुमने दरकते वृक्षों को देखा है? वृक्षों की तरह रिश्ते भी धीरे-धीरे दरकने लगते हैं। उनके अतीत से अनभिज्ञ होने के बावजूद भी, मैं अब उनकी बातों का आशय समझ रही थी। फिर एक लम्बी साँस लेकर बोली- “मीनाक्षी, मेरी शादी आज से 35 साल पहले निखिल के साथ हुई थी। बहुत ही सुन्दर संस्कारवान निखिल के प्रेम में, मैं इस तरह सुध-बुध खो बैठी कि अपने माता-पिता के लाख समझाने के बावजूद कि (विधुर व एक बच्ची का पिता) ये विवाह तुम्हारे लिए किसी भी तरह से उपयुक्त नहीं है, मैंने उनके विरुद्ध जा कर शादी कर ली। और सच कहूँ तो जब तक निखिल मेरे साथ रहे, मुझे इस बात का कत्तई पछतावा भी नहीं हुआ।

मैंने निखिल के साथ-साथ निखिल की बेटी को भी मन से स्वीकार कर लिया। मैं निखिल और सलोनी (उस समय तीन साल की थी) हमारा जीवन बडी मस्ती से कट रहा था। जब सलोनी माँ माँ कहकर मझसे चिपक जाती तो मातृ-प्रेम से तृप्त मेरे हृदय के हर्ष का ठिकाना न रहता। स्वतंत्र विचारों वाले निखिल ने मेरी भावनाओं की कद्र करते हुए मुझे कई बार समझाना चाहा किन्तु शायद, कहीं सलोनी की ममता के साथ न्याय न कर पाऊँ इसलिए स्वयं माँ बनने के विषय में कभी सोचा भी नहीं। सलोनी बड़ी हो गयी, जॉब करने लगी और फिर एक दिन अच्छा लड़का देख कर हमने इसी शहर में बड़े धूम-धाम के साथ उसकी शादी कर दी। हर वीकेंड पर बेटी- दामाद आते, हम सब बातें करते। सब कुछ बड़ी अच्छी तरह से चलता रहा।

इसी बीच एक दुर्घटना में निखिल ने मेरा हाथ सदा के लिए छोड़ दिया। नियति के इस क्रूर खेल ने मुझे भीतर तक तोड़ दिया फिर भी सलोनी आ जाती तो मुझे अहसास होता कि चलो मेरी बेटी तो मेरे पास है। किन्तु धीरे धीरे उसके रुख में बदलाव परिलक्षित होने लगे। अब वो दो-तीन महीने में भी अपनी शक्ल नहीं दिखाती थी। फोन पर बात करना चाहो तो समयाभाव का बहाना बनाने लगी। अंततः एक दिन जब वो काफी समय बाद मेरे घर आयी तो मैंने उसका हाथ थामते हए कहा- “क्यों बेटी. अपनी माँ की याद नहीं आती? उसने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा- ‘कम ऑन मॉम, मैं अपना घर देखू, जॉब देखू, बच्चे देखू, या तुम्हें।’ अपने इतने बिजी शड्यूल में कितने रिश्ते निभाऊं? और वैसे भी हमारे सम्बन्धों के बीच का सेतु तो पापा ही थे न। मेरा आपसे कोई ब्लड रिलेशन तो था नहीं, आपने मुझे जन्मा तो था नहीं, पाला था। आप न होती तो कोई भी नर्स या आया, मुझे पाल पोसकर बड़ा कर ही देती। “सो एन्जॉय योर लाइफ एंड लेट मी आल्सो एन्जॉय माय लाइफ।” एक के बाद एक उसके हृदयभेदी शब्द-बाण मेरे सीने को चीरते जा रहे थे। और माँ से आया बनी मैं अपनी पथराई आँखों से अपने सम्बन्धों की धज्जियाँ बिखरते हुए देख रहीं थीं।

निखिल की मौत से तो मेरी साँसें चलती रही लेकिन सलोनी की इस संवेदनहीनता ने जैसे मुझे मृतप्राय-सा कर दिया। दिन-हफ्ते-महीनों तक यही सोचती रही कि ऐसा कैसे हो सकता है? एक सधे हुए मूर्तिकार की तरह जिस बेटी की मूरत को गढ़ने में मैंने अपना दिन-रात एक कर दिया, उसके लिए मैं माँ नहीं मात्र एक आया हूँ?

बस मुझे संतुष्टि है तो सिर्फ इस बात से कि मैंने निखिल के प्रेम के साथ अन्याय नहीं किया। वो मझे माँ न भी समझे किन्त आज भी वो मेरी बेटी है। कमरे का ये डेकोरेशन देख रही हो न मीनाक्षी, इन्हीं रंगीन गुब्बारों के बीच परसों मैंने उसके बर्थडे का जश्न अकेले ही मनाया था।

अब तुम्हारे प्रश्न का जवाब कि- “वह कहाँ रहती है?” तो अपने सीने पे हाथ रख कर बोली, यहाँ रहती है मेरे दिल में। पिछले तीन सालों से मेरे कान माँ शब्द सुनने को तरस गए। हाँ, मैं हूं बच्चा पालने वाली आया, किन्तु मातृत्व सुख की नैसर्गिक चाह से मैंने अपने आप को वंचित रखा किसके लिए मीनाक्षी? ऐसा कह चोटिल ममता पुनः अश्रु रूप मे गतिमान हो चली।

थोड़ी देर बाद स्वयं को संयत करके बोली- “चल आ, तुझे किसी और से मिलवाऊं।” बगल के एक छोटे से कमरे में एक बेड पर एक बुजुर्ग महिला लेटी हुई थीं।

मैंने देखते ही प्रश्न किया- “कौन है, आपकी सास?”

वह बोली- “जो समझो” आज से तीन चार साल पहले मंदिर के बाहर बैठे हुए, इनके करुण रुदन ने मुझे अंदर तक विचलित करके रख दिया और तत्क्षण ही इनके साथ जैसे मेरा एक रिश्ता जुड़ गया। तबसे हम साथ ही रहते हैं।

“ऐसा भी हो सकता है क्या” मन में विस्मय था और था एक अगाध प्रेम, सम्मान और श्रद्धा अपनी आशु दी के लिए।

फिर वह बोलीं- मीनाक्षी, “तोडना तो बहुत आसान है रिश्ते-नाते, घर-परिवार, समाज। तोड़ो और फेंक दो, किन्तु कभी जुड़कर और जोड़कर देखो – “एक असीम सुख है।” कुछ फूलों को गूंथ कर हम जोड़ देते हैं तो एक सुंदर हार बन जाता है और सात सुरों के संयोग से एक मधुर सरगम। आज ये जो रिश्ते दरक रहे हैं न मीनाक्षी, अगर हम नहीं चेते तो रिश्तों की मीठी सरगम नहीं, बेसुरे आलाप बजेंगे जीवन में।

घर लौटते समय मुझे एक सबक मिल गया था, “जीवन में जोड़ो और जुड़कर देखो।”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’