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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

लैंड लाइन फोन की घंटी लगातार दस मिनट तक बजती रही। मोबाइल पर दसियों मिस्ड कॉल आ चुकी थी। बिस्तर पर ही अपनी नित्य क्रिया करने वाली सास हर दो मिनट बाद रीता-रीता की आवाज लगाए जा रही थीं— “बहू देखो शायद मेरा बिस्तर गीला हो गया है, इसे बदल दो, मुझे ठंडी लग जाएगी। जल्दी करो”

रीता कराहते हुए अपने बिस्तर से उठती है और मन ही मन बुदबुदाती है, “किशोरावस्था में अपने छोटे भाई-बहनों का मल-मूत्र साफ किया, जवानी में बच्चों का मल-मूत्र साफ किया और पचास साल की उम्र में, 90 साल की सास का मल-मूत्र साफ कर रही हूँ। जबकि अब इस उम्र में अपना भी शरीर साथ नहीं देता है।”

सास का बिस्तर बदलकर रीता जैसे ही अपने रूम मे आती है, सास फिर आवाज देने लगती हैं – “अरे बहू ओ बहू! जल्दी से मेरी थूकदानी इधर कर दो, मुझे थूकना है। अभी फर्श पर थूक दूंगी तो नाक भौं सिकोड़ोगी सफाई करते समय।” कमर दर्द से परेशान रीता पुनः कराहते हुए उठती है और सास को थूकदानी में थुकवाती है।

“अम्मा बार-बार हर दस पांच मिनट पे आवाज मत दिया करिए। जरा-सा हाथ बढ़ाकर थूकदानी नहीं खींच सकतीं? चादर नहीं ओढ़ सकतीं? आपको तो बुढ़ापे मे नींद आती नहीं, दूसरों को भी नहीं सोने देती हैं। आपकी टहल करते-करते मैं स्वयं असमय बूढी और बीमार होती जा रही हूं। आपको तो कोई बीमारी नहीं है बस बुढ़ापे की बीमारी है। मुझे तो हजारों रोगों ने पकड़ लिया है। मैं ही मर गई तो कौन देखेगा इस घर को?”

झुंझलाई रीता बड़बड़ाती रही पर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे एक कहानी याद आ गई- प्राचीन काल में एक राजा ययाति थे, जो बुढ़ापे में भी जवानी का सुख भोगना चाहते थे। किसी शाप वश राजा शीघ्र ही जर को प्राप्त होने लगे तो राजा को दुखी देखकर उनके छोटे पुत्र पुरू ने अपने पिता को, अपनी जवानी दे दी और उनका बुढ़ापा ओढ़ लिया। जवानी में ही वृद्ध लगने वाले पुत्र को देखकर राजा को दुख हुआ तो पुनः ऋषि कृपा से राजा ने पुत्र को उसकी युवावस्था वापस कर दी।

बचपन की पढ़ी इस कहानी का तात्पर्य रीता को कभी समझ नहीं आया था किन्त. अब रीता को इस कहानी के पीछे का छिपा भाव समझ में आने लगा। सच मे बूढ़े और बीमार की सेवा जीवन में लगातार करते-करते स्वस्थ सुरूप व्यक्ति भी शीघ्र ही बूढ़ा और बीमार हो जाता है। रोगी को समय-समय पर फल, जूस पिलाने वाला स्वयं अपना ध्यान नहीं देता। जवानी में ही असमय बुढ़ापा आ जाता है।

रीता जब छोटी थी तब अपने पिता जी के कंधे पर चढ़कर घूमती थी। पिता के कंधे चढ़कर आम और अमरूद तोड़ना, बाग में घूमना, नील गगन को निहारना, पक्षियों से बातें करना। इसे देख कर दादी, पिता जी को डांटती थीं- “ये बिटिया है बेटा नहीं है। इतना दुलार करने की जरूरत नहीं है। ससुराल जाएंगी तो सब दुलार झाड़ लिया जाएगा।”

बाबू ने जबाव दिया- “लड़की को मां बाप भी नहीं प्यार करेंगे तो फिर कौन करेगा। माता-पिता से मिला प्यार ही इनकी शक्ति है। इसी ऊर्जा के सहारे जीवन की सारी लड़ाई ये जीतेंगी। बीते दिनों की सुखद यादें मनुष्य को ऊर्जा देती हैं।”

आज रीता को दादी की वो बातें सोचने पर बुरी नहीं लगती हैं। वास्तव में एक स्त्री को कितना कुछ झेलना पड़ता है। बूढ़े, बच्चे, जवान, बीमार, रिश्तेदार सभी का ख्याल रखना, घर का काम करना, सबको खुश रखना। वह सबके लिए जीती है, सोचती है। बस अपने लिए उसके पास एक भी लम्हा नहीं है। उसे अपने नाम के सिवा कुछ भी याद नहीं रहता। अपनी आंखो के सपने, अपना व्यक्तित्व, अपना अस्तित्व, शिक्षा-दीक्षा, सब भूल गई। बस नाम याद है क्योंकि नाम से दिन भर लोग पुकारते जो हैं। जैसे पौधे के विकास के लिए धूप, हवा, मिट्टी, खाद और पानी की आवश्यकता होती है, उसी तरह मनुष्य को भी चलने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा अतीत की सुहानी यादों से मिलती है। विचारों की इन श्रृंखलाओं से निकलकर रीता अपने कमरे में आकर दरवाजा बन्द कर लेती है और अतीत मे डूबकर अंजुलि भर-भर कर अमृत पीने लगती है।

बर्तन वाली खड़-भड़ खड़-भड़ करके बर्तनों की सफाई कर रही थी। दरवाजे की घंटी कई बार बजाकर कोई चला गया। सास का आवाज देना प्रारंभ हो गया किन्तु रीता की ध्यान मुद्रा भंग नहीं हुई। वो सहस्रार से झरता हुआ अमृत जो पी रही थी। कानों में अंगूठा डाले और आंखो पर कोमलता से उंगलियां रख (भ्रामरी मुद्रा में) वो अलौकिक संसार में खोई थी। उस संसार में ढाई आखर प्रेम का मेह वर्षण हो रहा था और पास में ही हवा में लहराते हुए रेशमी रुमाल को अपलक देख रही थी।

हवा में लहराता हुआ रेशमी रुमाल रीता को अनंत ऊर्जा से भर देता है। जीवन के दुष्कर मार्गों को पुष्पों और पल्लवों से आच्छादित कर देता है। कोल्हू के बैल की तरह दिन-रात खटने के लिए जिस शक्ति की आवश्यकता होती है, उसे वह शक्ति इसी रुमाल से मिलती है। पहले तो वर्ष मे कभी-कभार उसने यह रुमाल देखा। समय व्यतीत होने के साथ-साथ यह रुमाल प्रतिपल रीता के आस-पास उड़ने लगी। उम्र और समय के साथ रुमाल उड़ने की पुनरावृत्ति कम होने के स्थान पर बढ़ती ही गई। कभी-कभी तो रात को जब उसकी नींद टूट जाती, तो दौड़कर बालकनी में चली जाती है। विह्वल होकर उसी रुमाल को शून्य में हवा के साथ लहराते हुए ढूंढती। आंखे बन्द करके अंतर्मन में झांकती है। सचमुच वहां वही रुमाल हवा मे उड़ने लगता है।

दरअसल जिन दिनों रीता कॉलेज में पढ़ती थी, अठारह-उन्नीस वर्ष की रही होगी तो होली, दीवाली, दशहरा की छुट्टियों मे वो ट्रेन से अपने गांव जाया करती थी। सामने की सीट पर एक युवक भी आकर चुपचाप बैठ जाता था। कभी-कभी सामने की सीट खाली न रहने पर उसे रीता के बगल बैठना पड़ता था। पूरे सफर मे वो अपना चेहरा दूसरी तरफ ही किए रहता था। खुद मे खोया-खोया सा जाने क्या सोचता रहता था। उसकी आंखों में कुछ जिज्ञासा थी किन्तु वो अपने भीतर के उठते कौतूहल को शान्त रखता था। जब उसका स्टॉपेज आता था, वह चुपचाप अपना सामान लेकर उतर जाता था। रीता चुपचाप उसे खिड़की से जाते हुए देखा करती थी। थोड़ी दूर जाकर वह पलट कर अपना रुमाल लहराता था और आगे बढ़ जाता था। ट्रेन धीरे-धीरे स्टेशन छोड़ने लगती थी।

वो सफर भी कितना सुहाना सफर था। एक दूसरे का नाम भी नहीं पता था। डर, भय, लज्जा, शील, संकोच के साथ अंतस में एक सघन अपनापन भर जाता था। छुट्टियों का इन्तजार रहता था और उस अपरिचित का भी जिसे नजरें चोरी-चोरी देखा करती थीं और कभी-कभार अकस्मात मिल जाने पर इधर-उधर घूम जाती थीं। इस तरह यह मौन सफर तीन साल तक चलता रहा। ग्रेजुएशन के बाद शहर बदल गया, उसका भी और रीता का भी। कौन, कहां गया कुछ पता नहीं।

इस मौन सफर को काटे हुए लगभग 30 साल हो चुका है किन्तु, जब भी रीता इस स्टेशन से गुजरती है उसे वही रुमाल हवा में लहराती हुई दिखती। कई बार सोचती है कि क्या मुझे ही ये रूमाले दिखती हैं या उस अपरिचित को भी। मुझे जो लहर आज तक छू रही है, वो उसे भी छूती ही होगी। ऐसा नहीं हो सकता कि नदी में लहर उठे और वहीं विलीन हो जाए। लहरें दो
नों किनारों को छूती हैं। लहर दूसरे किनारे खड़े उस अपरिचित को अपने होने का एहसास जरूर कराती है।

आज रीता फिर उसी ट्रेन में थी, अकेली नहीं अपने दो बच्चों के साथ। सामने बर्थ पर एक भद्र पुरुष सपरिवार बैठा था। स्मृतियों में कुछ टटोलता हुआ सा। दूर दूर तक अपने आप में अकेला-सा चलता हुआ, मन ही मन कुछ बुदबुदाता हुआ-सा, किसी मौन सफर को जी रहा था। अपने हाथ के सफेद रुमाल को बार-बार उंगलियों में लपेट रहा था, खोल रहा था। थोड़ी देर बाद बड़े संकोच के साथ पूछ ही लिया… “क्या आप इसी ट्रेन से कभी वर्षों पहले छुट्टियों मे घर जाती थीं? कोई और भी आपके साथ खामोश सफर करता था? अपना स्टेशन आने पर उतर जाता था और थोड़ी दूर जाकर रुमाल लहराकर चुपचाप बाय करता था?”

रीता मुस्कुराई और सहमति में सर हिलाकर बोली- “क्या आज मैं आपका नाम जान सकती हूं?”

“अनिल…” उन्होंने कहा और आपका?

“रीता” – रीता ने जबाब दिया

“क्या आज भी वो दो आंखें आपका पीछा करती हैं, जिनसे विदा होते समय आप दूर जाकर रुमाल लहराते थे” रीता ने पूछा।

उनका चेहरा विवर्ण हो गया और कई उच्छवास छोड़ने के पश्चात बोले “कहां ढूंढता उन तरंगों को, जो मुझे अब तक किसी अदृश्य संसार से शीतल सुखद संदेश देती रहीं, मुझे पल-पल अपने होने का अहसास कराती रहीं। लेकिन मुझे उन तरंगों का पता ही नहीं मालूम था।”

उनकी पत्नी रीता के पास आई और बोली- “बहुत याद करते रहे आपको अनिल। इस स्टेशन पर आते ही जैसे कहीं खो जाते थे। बेचैनी में बार-बार रुमाल खोलते थे, फैलाते थे। किसी पीड़ा के समुद्र में डूब जाते थे। वर्षो बाद हमारी इनसे मुलाकात हुई, फिर शादी और अब मेरा यह परिवार है।”

किर्र-कीर्र घिर्र-घिरी चों-चों करके ट्रेन रुकती है। सभी उतर जाते हैं। बच्चे बाय-बाय करते हैं। एक-दूसरे को अपना पता देते हैं और फोन नंबर शेयर करते हैं। वो चुपचाप खड़े रहते हैं। उनकी पत्नी हाथ हिलाती हैं, अपना रेशमी रुमाल लहराती हैं। एक क्षण बाद कई रुमालें हवा में उड़ने लगती हैं।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’