Hindi Story: सज्जन सेठ के बेटे को ट्यूशन पढ़ाने वाले टीचर ने उनसे हाथ जोड़ कर कहा कि मैं आपके बेटे को अब और नहीं पढ़ा सकता। सेठजी ने कहा कि ऐसा क्या हो गया जो एक ही सप्ताह में हिम्मत हार गये हो। बेटे की पढ़ाई शुरू करने से पहले तो तुम बहुत बड़े-बड़े दावे करते थे कि यह किस खेत की मूली है।
मैं तो हर तरह के बच्चों को चंद दिनों में सीधा करके रख देता हूं। टीचर ने कहा कि आपके बेटे को पिछले कई दिनों से इतिहास का एक अध्याय पढ़ा रहा हूं। आज जब मैंने उससे पूछा कि तुम इतने समय से इतिहास पढ़ रहे हो, आखिर आज तक तुमने इतिहास से क्या सीखा। जानते हो इसने मुझ से कहा कि मुझे तो आज तक इतिहास पढ़ते-पढ़ते यही समझ आया है कि हम इतिहास से कुछ नहीं सीख सकते। मैंने इसे प्यार से समझाते हुए कहा कि इतिहास बहुत ही रोचक विषय है, इससे हमें अपने अतीत के साथ घटित हर जरूरी घटना के बारे में पता लग जाता है। इस पर आपके बेटे का कहना था, लेकिन इतिहास को पढ़ते-पढ़ते हमारा भविष्य तो खराब हो जाता है।
कल जब मैंने इसको कहा कि ’मैं करोड़पति बन गया हूं’ इस विषय पर निबंध लिख कर दिखाओ तो इसका कहना था जब मैं करोड़पति बन ही गया हूं तो फिर यह सारे काम मैं खुद थोड़े ही करूंगा। हर बात पर इस तरह के टके से जवाब देकर मेरी टोपी उछालता रहता है। आज तो आपके बेटे ने हद ही कर दी। जब मैंने ठीक से पाठ याद न करने पर इसे थोड़ा-सा डांटा तो इसने बहुत ही बदतमीजी से मुझे कहा-‘ओये जरा तमीज से बात कर, अपने ग्राहक से ऐसे बात करते हैं क्या?’
सज्जन सेठ ने उसी समय अपने बेटे को सारी बात साफ करने के लिये बुलाया। सेठ जी ने जब बेटे से टीचर की शिकायत के बारे में कहा तो उसने कहा कि पता नहीं यह कैसा टीचर आपने ढूंढा है। इन्हें खुद तो कुछ आता नहीं, बस सारा दिन मेरे से ही सवाल पूछते रहते हैं। कल मुझ से कहने लगे कि मेरे सामने ज्यादा होशियार बनने की कोशिश मत करना, मैं तो उड़ती हुई चिड़िया के पर गिन लेता हूं। अब इनसे कोई पूछे कि इसमें क्या मुश्किल बात है। यह तो हर कोई जानता है कि हर चिड़िया के दो पर होते हैं। कल इन्होंने मेरा टेस्ट पेपर देखने पर मुझ से कहा कि सदा ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया करो कि एक बेवकूफ आदमी को भी आसानी से समझ आ सके। मैंने इनसे पूछ लिया कि आप पहले मुझे यह बताओ कि आपको मेरे पेपर में क्या समझ नहीं आ रहा? बस इसी बात को लेकर मुझ पर गुस्सा होने लगे। सेठजी ने बेटे को डांटते हुए कहा कि घरवालों की नाक में तो पहले से ही तुमने दम किया हुआ है, अब टीचर का भी बुरा हाल करने लगे हो। मुझे तुम्हारे बारे में कुछ और ही सोचना पड़ेगा। क्योंकि तुम्हारे जैसे लातों के भूत बातों से नहीं समझने वाले। सेठजी के लगातार भाषण से बोर होकर उनका बेटा वहां से जब खिसकने लगा तो सेठजी ने उसे डांटते हुए कहा-‘रुक जाओ।’ बेटे ने इस माहौल में भी सेठजी से मज़ाक करते हुए कहा कि कम से कम आप तो ठीक से बता दो कि मैं आपके रुक जाऊं का क्या मतलब समझूं कि मुझे रुकना है या जाना है। इतना सुनते ही सेठजी का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा और वो बेटे को थप्पड़ मारने के लिये उठे।
जैसे ही सेठजी बेटे की ओर बढ़ने लगे तो पीछे से उनकी अम्मा जी ने आवाज देकर कहा कि मेरे पोते को कुछ मत कहना। सज्जन सेठ ने अपनी अम्मा जी की ओर मुड़कर देखा तो वो बोली कि बचपन तो कोमल और नादान होता है। आप लोग ही छल, फरेब और दिखावे की दलदल में फंसे हुए हो। नई पीढ़ी को दोषी ठहराने से पहले हमें अपने अंदर भी एक बार झांकना चाहिए कि हम किस राह पर चल रहे हैं। तुम मेरे पोते को डांटने से पहले क्या यह दावे के साथ कह सकते हो कि तुम्हारे और इस टीचर के अंदर कोई अवगुण नहीं है। यदि हम लोगों में इस प्रकार की कमियां न होती तो नई पीढ़ी में इतने दोष कभी नहीं आ सकते थे। इतना कहने के साथ ही अम्मा जी ने सज्जन सेठ का हाथ पकड़ लिया और उनसे बोली कि जरा ताली बजा कर दिखाओ। सज्जन सेठ बोले कि मेरा एक हाथ तो आपने पकड़ा हुआ है, मैं एक हाथ से ताली कैसे बजा सकता हूं। इस पर अम्मा जी ने कहा कि मैं भी यही कहना चाहती हूं कि बेटा ताली कभी भी एक हाथ से नहीं बजती। वहां खड़े सभी लोगों की ओर देखते हुए अम्मा जी ने कहा कि नई पीढ़ी तो उस घड़ी के समान होती है जिसे ढंग से संभाला जाये तो अनेक बरसों तक भी ठीक से काम कर सकती है। परंतु यदि इसे ठीक से संभाला न जाये तो कुछ ही दिनों में यह बिगड़ जाती है।
सज्जन सेठ ने अपनी अम्मा जी से कहा कि आप तो इतनी समझदार होकर भी न जाने कैसे इस शैतान की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ जाती हो। अगर मैं भी आप की तरह इसे ढील दे दूं तो यह मेरी सारी उम्र की गाढ़ी कमाई कुछ ही दिनों में उजाड़ कर रख देगा। आप मुझे एक बार तो इस बदमाश के कान कतरने दो ताकि इसकी अक्ल ठिकाने आ सके। सेठजी की धमकी भरी बातें सुन कर उनके बेटे के चेहरे का रंग फ़क पड़ गया। अम्मा जी ने सज्जन सेठ से कहा कि तू क्यूं खामख्वाह राई का पहाड़ बनाने पर तुला है। इस समय तू बहुत क्रोध में है और क्रोध में कोई भी मनुष्य समुद्र की तरह बहरा एवं आग की तरह उतावला हो जाता है। किसी को कुछ भी कहने से पहले अपने अंदर ज्ञान की सभी विशेषताओं को पैदा करना सीख, तभी इन्हीं विशेषताओं का दूसरों पर भी अपने आप प्रभाव पड़ेगा। मेरी बात मान कर एक बार इस विधि का प्रयोग करके देख तू भी यही कहेगा कि यही सर्वोतम विधि है। जौली अंकल अभी तक तो यही समझ रहे थे कि अम्मा जी ने जिंदगी भर सिर्फ चूल्हे-चौके की ही जिम्मेदारी निभाई है, परंतु आज उनकी बातें सुनकर नई पीढ़ी को यह सन्देश देना चाहते हैं कि यदि आप बुराइयों का कचरा छोड़ देते हैं तो लोग आप पर कभी भी कीचड़ उछालने की कोशिश नहीं कर सकते। नई पीढ़ी को सदा यह याद रखना चाहिये कि अच्छी भावनाओं की कद्र तभी होती है जब उन्हें अच्छे कर्मो में ढ़ाल दिया जाये।
ये कहानी ‘कहानियां जो राह दिखाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं–
