ऑफिस में पुरुष और रसोई में महिलाएं हमारे देश में एक असुरक्षित कानून की तरह लगती हैं। लगता है कि हमारी प्रणाली में लिंग अंतर बहुत कठोर हो गया है। मुझे जो अनुचित लगता है वह यह है कि महिलाओं को घर का सारा काम क्यों करना पड़ता है और पुरुष घर के भीतर आराम फरमाते हैं। एक विकसित भारतीय समाज में विभिन्न जाति या धर्म की महिलाओं द्वारा ऐसी चिंताओं को आमतौर पर महसूस किया जाता है।
इच्छाओं का बलिदान
हमारा सामाजिक समूह यह निर्धारित कर चुका है कि हम पुरुषों और महिलाओं से कैसे लिबास पहनने, कार्य करने और खुद को प्रस्तुत करने की मांग करते हैं। यदि एक महिला एक खुशहाल वैवाहिक जीवन जीने की इच्छा रखती है, तो उसे अपने करियर को ताक पर रखना होगा और एक अच्छी पत्नी और मां होने के दायित्व निभाने के
अधीन खुद को समर्पित करना होगा।
ऑफिस के साथ घर की जिम्मेदारी
यदि कोई महिला नौकरी करने के लिए घर से बाहर जा रही है, तब भी उसे, घर लौटकर अपने घर के सभी कामकाज को निपटाना होता है तथा परिवार के सदस्यों की देखभाल की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। हमारे समाज में तमाम ऐसी महिलाएं हैं जो पेशेवर रूप से काम करने में बहुत सक्षम हैं लेकिन परिवार के बड़ों या उनके पति ने उन्हें समाज और अपने व्यक्तिगत अहंकार को संतुष्ट करने के लिए उनकी महत्वाकांक्षा को पूरा करने से रोक दिया।
शारीरिक और मानसिक समस्याएं
एक शानदार करियर वाली महिलाएं शादी करने या बच्चे पैदा करने के लिए सबकुछ छोडऩे को मजबूर हो जाती हैं, इसके अलावा जिन महिलाओं को लगता है कि वे घर पर नहीं रहती हैं, वे अन्य समस्याओं (जैसे कि अवसाद और अन्य अनियंत्रित बीमारियों) की ओर आकर्षित हो जाती हैं, जो स्थिति को और खराब कर देती हैं। समाज का पक्षपाती रवैया गृहकार्य के लिए कभी भी एक पूर्व निर्धारित लिंग नहीं था, तो महिलाओं को इसे करने के लिए क्यों बाध्य किया गया। यहां तक कि बच्चों के रूप में,
लड़कियों को तो घर के कामकाज में मदद करने के लिए कहा जाता है, जबकि लड़कों को जैसा वे चाहें वैसा समय व्यतीत करने की स्वतंत्रता दी जाती है। शुरुआत से ही दोनों लिंगों के लिए यह संदेश दिया गया है कि घर के कामकाज को लड़कियों को अपने कंधों पर लेना पड़ेगा।
आलोचनाओं की शिकार
लोग कामकाजी महिलाओं की यह कहकर आलोचना करना शुरू कर देते हैं कि वे अपने परिवार या बच्चों की देखभाल नहीं करती और उन जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करती है, जो उन्हें करना चाहिए। वास्तव में कामकाजी महिलाओं को एक ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ता है जिसे मैं दोहरा बोझ कहना पसंद करूंगी। महिलाएं जब
काम से घर लौटती हैं, तो उन्हें घर का कामकाज करने के लिए दूसरी शिफ्ट शुरू करनी होती है। महिलाओं द्वारा किये गये काम को अहमियत नहीं दी जाती है, या बहुत हल्के में लिया जाता है।
आज की नारी के समाज से हैं ये सवाल
- क्या महिलाओं को केवल घर का कामकाज संभालने और खाना पकाने के लिए ही शादी करनी चाहिए?
- उसके व्यक्तिगत लक्ष्यों एवं काम के लिए जुनून का क्या?
- जब वह उस परिवार में विवाहित होकर नहीं आयी थी, तो ये सारे कामकाज नहीं किये जाते थे? जो अब केवल उसकी ही जिम्मेदारी बन कर रह गये हैं?
- क्या पुरानी संस्कृति को पीछे छोड़ते हुए, एक नई, संतुलित, विकास-उन्मुख नजरिया नहीं अपनाया जाना चाहिए?
- जहां किसी तरह का बदलाव होता है, वहां सक्रिय प्रतिरोध भी होता है। लेकिन हमें बदलाव को स्वीकार करने और अपने सोचने के तरीके में बदलाव लाने की जरूरत है। महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकार प्रदान करने में सक्षम न होकर और उनकी आर्थिक सुरक्षा या सामाजिक क्रम को सुनिश्चित न करना, देश की एक बड़ी असफलता है।
- पुरुषों और उनके परिवार को यह समझने की जरूरत है कि महिलाओं को काम करने और करियर बनाने के अधिकार दिये जायें और घर के कामकाज की जितनी जिम्मेदारी महिला की है, उतनी पुरुष की भी है। अब समय आ गया जब महिलाओं के साथ हो रहे इस पक्षपात पर सवाल उठाया जाए। आज की महिलाएं भी करियर बनाने के अपने
- सपने को साकार करने में जी जान से मेहनत करती हैं। तो क्या हमें हक है कि हम किसी के सपने को यं ही चकनाचूर कर दें?

