एक था राजा रंगप्पा। वह बड़ा शौकीन मिजाज था। एक बार किसी ने कहा, ”फारस के फूलदान बहुत खूबसूरत होते हैं।” सुनकर राजा ने फौरन एक दरबारी को फारस भेजा और काँच के दो खूबसूरत फूलदान मँगवाए। वे महल में राजा के सिरहाने रखे रहते थे।
सेवक भूलाराम राजा के महल की सफाई करता था। राजा ने उसे आदेश दिया था कि वह रोजाना ध्यान से झाड़ू लगाए, ताकि फूलदान टूटें नहीं। पर फिर भी एक दिन भूलाराम से चूक हो गई। वह झाड़ू लगा रहा था कि तभी हाथ लगने से एक फूलदान जमीन पर गिरा और टूट गया।
भूलाराम के हाथ-पैर काँपने लगे, अब क्या करे? उसे पता था कि राजा को ये बेशकीमती फूलदान बहुत पसंद हैं। भूलाराम समझ गया कि उसे फाँसी की सजा होगी और सचमुच हुआ भी वही। राजा ने गुस्से में आकर कहा, ”भूलाराम को आज से तीन दिन बार फाँसी पर चढ़ा दिया जाए।”
अब तो भूलाराम के घर कोहराम मच गया। भूलाराम की हालत यह थी, जैसे शरीर से अभी प्राण निकल रहे हों।
भूलाराम के परिवार के लोग राज्य के मंत्री मायादास से आकर मिले। मायादास चतुर था। दीन-दुखियों का दर्द भी समझता था। उसने भूलाराम की पत्नी से कहा, ”जाकर जेल में अपने आदमी से मिलो। मेरा नाम लेना, तो पहरेदार तुम्हें रोकेगा नहीं। जैसे ही भूलाराम मिलने आए, उसके कान में मेरा संदेश कह देना।”
आखिर वह दिन भी आ गया, जब भूलाराम को फाँसी पर लटकाया जाना था। फाँसी की सजा देने से पहले उससे अंतिम इच्छा पूछी गई। भूलाराम ने कहा, ”मैं सिर्फ राजा को यह बता सकता हूँ।”
आखिर राजा रंगप्पा वहाँ आया। उसने कहा, ”बोल भूलाराम, तेरी अंतिम इच्छा क्या है? मैं उसे जरूर पूरा करूँगा।”
भूलाराम ने कहा, ”महाराज, दो फूलदानों में से एक टूटा था, मैं दूसरा भी तोड़ना चाहता हूँ।”
सुनकर राजा रंगप्पा चकरा गया। अचकचाकर बोला, ”क्यों भूलाराम, ऐसा क्यों?”
”महाराज, इसलिए कि ऐसा करके मैं एक सीधे-सादे बेकसूर आदमी का जीवन बचा लूँगा।” भूलाराम ने कहा, ”क्योंकि दूसरा फूलदान तोडऩे पर भी मुझे तो एक ही फाँसी मिलेगी न! जबकि सफाई करते समय अगर किसी दूसरे से टूट गया, तो वह तो फाँसी पर चढ़ेगा ही, उसके घर वाले भी मेरे परिवार की तरह दुर्दशा झेलेंगे।”
सुनते ही राजा रंगप्पा का गुस्सा काफूर हो गया। उसने भूलाराम की फाँसी की सजा माफ कर दी। फिर कहा, ”सच-सच बताओ, तुमने जो कुछ कहा, इसके पीछे किसका दिमाग था? किसने तुम्हें सलाह दी थी!”
जब भूलाराम ने मायादास का नाम लिया, तो राजा के चेहरे पर मुसकान आ गई। उसने मायादास को बुलाकर कहा, ”मंत्रीजी जी, आपके कारण आज एक बेकसूर की जान बच गई। आज मैं समझता, भले ही राजा मैं हूँ, पर आप जैसे बुद्धिमान मंत्री की सूझ-बूझ से ही यह राज्य चल रहा है।”
