……………. सहसा उसे याद आया, इसी कमरे के द्वार से वह एक बार, यहां के रंगमहल में प्रविष्ट हुई थी। एक ओर जहां ऊंचा चबूतरा-सा बना हुआ है और जहां कभी शाही कुर्सी पर राजा-महाराजा विराजते थे, उसी के पीछे एक पत्थर का दरवाज़ा भी था। कुछेक सीढ़ियां उतरकर पग अपने आप ही उस ओर उठ गए। वह सीढ़ियां उतरी तो सामने एक दरवाज़ा था‒पत्थर का बड़ा दरवाज़ा। समीप ही कल पर नज़र पड़ते ही उसने उसे पकड़ लिया और पूरी ताकत से घुमाया। दरवाज़ा अपने आप ही खुल गया। सूर्य की किरण का प्रभाव अंदर तक पहुंच रहा था। अंदर एक हल्का-सा, धुंधला-सा वातावरण दिखाई पड़ा, ख़ामोश‒बिलकुल ख़ामोश। ऐसा जान पड़ता था मानो अंधकार में कुछेक जिन्नात इधर-उधर टहल रहे हों या सफ़ेद परियां थिरक रही हों। भय से उसका दिल कांप गया, परंतु वह साहस नहीं छोड़ना चाहती थी। लपककर वह पहले कमरे में फिर आई। खिड़की के समीप की मोटी मोमबत्ती ढलकी पड़ी थी। माचिस की तीलियां बिखरी हुई थीं। सिगार के कई अधजले टुकड़े पड़े हुए थे। उसने झट मोमबत्ती उठाई। तीलियां उठाकर माचिस के बाक्स पर रगड़ा। एक प्रकाश-सा फैला, शमा जलाए वह सीढ़ियों द्वारा रंगमहल में उतर गई।

उसने अनुभव किया अगणित आंखें उसके ऊपर लगी हुई हैं, उसे घूर रही हैं, अकारण ही। शायद यह सब उसका भ्रम है‒जब दिल कड़ा करके अंदर पहुंची तो नज़र ठिठककर पथरा गई, पत्थर की अगणित मूर्तियां एक कतार में खड़ी उसका स्वागत कर रही थीं। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। दिल की धड़कनों के साथ उसने अनुभव किया कि इन मूर्तियों का दिल भी चीख़-चीख़कर ठहाका लगा रहा है, उसकी बदनसीबी पर‒उसके स्वाभिमान का मज़ाक उड़ा रहा है, अट्टहास कर रहा है। गांव की एक साधारण गोरी की एक राजा से घृणा। ऐसी घृणा जो वह कभी क्षमा नहीं कर सकी। आख़िर किस अभिमान में डूबकर? किस बात का गर्व है उसे? दीवारों पर बड़े-बड़े दर्पण बने हुए थे, शमा की लौ से इनकी चमक कांप-कांप जाती थी। इनके प्रतिबिम्ब में मूर्तियां इंसानी ढांचे में परिवर्तित होकर जीती-जागती तथा थिरकती हुई अपनी कहानी आप ही दुहरा रही थीं, रो-रोकर, गा-गाकर उसके दिल की धड़कनों के ताल पर।

वह मूर्तियों के और समीप गई। फटी-फटी आंखों से इन्हें घूरने लगी। कान फाड़कर इनकी बेज़ुबान कथा सुनने लगी। यह क्या? यह…यह मूर्तियां! यहां!! यहां पर ये मूर्तियां कैसे आईं? इन मूर्तियों को तो उसके बाबा ने बनाया था। अपने हाथों से…. आज से लगभग बाईस वर्ष पहले, इन मूर्तियों के तो एक-एक अंग से वह परिचित है। फिर भी उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। इन मूर्तियों को तो उसके बाबा ने एक बड़े व्यापारी को बेचा था, बहुत कीमती दामों में। वह तो इन मूर्तियों की और अधिक कीमत देना चाहता था, परंतु उसके बाबा ने ही मना कर दिया था। हां‒ क्या नाम था उसका? याद आया, राजेश हां, राजेश ही उस व्यापारी का नाम था। वह मूर्तियां यहां कैसे आईं और वह व्यापारी कौन था? कौन था वह जिसका मुखड़ा सदा ही एक मोटे चश्मे से ढका रहता था? जिसकी घनी मूंछों तथा दाढ़ी के पीछे भी एक जानी-पहचानी-सी सूरत झलकती थी।

गंभीर…कुछ खोई-खोई-सी। कौन था वह दयालु जो निस- दिन ही उसके पास आने की इच्छा रखता था? उससे बातें करता था तो खो जाता था। उसके बच्चे को इतना प्यार करता था कि कभी-कभी राधा भी कारण ढूंढने पर विवश हो जाती थी। क्यों उसे देखते-देखते उस व्यापारी का मुखड़ा अचानक ही उदास हो जाता था।

राधा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। शरीर बुरी तरह कांप रहा था। ऐसा लगता था मानो शमा उसके हाथों से छूटकर गिर पड़ेगी‒यहां अंधकार छा जाएगा और वह इस अंधकार में सदा के लिए डूब जाएगी, उसके शरीर का सारा रक्त जमता चला जा रहा था। उसे यह भी महसूस नहीं हुआ कि शमा पिघलकर उसकी अंगुलियों पर गिर रही है। वहां फफोले पड़ते जा रहे हैं। वह मूर्तियों को एक के बाद एक देखने लगी, बाबा ने यह मूर्ति बस्ती पर बनाई थी। यह संध्या पर हुए जुल्म की तस्वीर है। यह चम्पा की कहानी है, यह चम्पा की बड़ी बहन फूलवती है जिसे शादी के बाद भी राजा विजयभान सिंह ने नहीं छोड़ा था।

यह तारा है जो वासना की भेंट चढ़ाने के बाद निछावर की हुई दौलत को इसलिए स्वीकार करने पर विवश हो गई थी क्योंकि उसे अपनी छोटी बहन का विवाह करना था, परंतु विवाह से पहले गांव के चौधरी ने उसे भी उठवाकर राजा विजयभान सिंह को इनाम की आशा में सौंप दिया था। यह रही उसकी छोटी बहन…नन्हीं-सी जान, कली अभी फूटी भी नहीं थी कि भंवरे ने उसकी पत्तियां निचोड़कर एक-एक बूंद चूस ली थी। अपनी बहन का प्रतिबिम्ब देखकर उसकी आंखों का रुका तूफान फिर तेज हो गया, परंतु इस समय वह राजा विजयभान सिंह से घृणा नहीं कर सकी। इस जालिम के लिए उसकी चाह बढ़ती ही गई, जिसने गांव की सुंदरियों को ही नहीं, उसकी बहन को ही नहीं, वरन् उसके अपने व्यक्तित्व को भी लूटा था।

वह आगे बढ़ती चली गई, हाथ में शमा लिए, जिसकी लौ में उसका गंभीर मुखड़ा स्वयं इन मूर्तियों का एक भाग दिखाई पड़ रहा था। सहसा वह चौंक पड़ी, अरे! वह मूर्ति‒यह भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति यहां कैसे आ गई? इसे तो बाबा ने समीप के गांव कृष्णानगर में एक बूढ़े को दो रुपयों में बेचा था ताकि खाने को कुछ मिल सके। यह यहां कैसे पहुंची? और‒यह मूर्ति प्रभु यीशु मसीह की मूर्ति, इस मूर्ति की तो एक-एक रेखा, आंखों का भाव, मुखड़े से टपकती हुई पीड़ा, जो उन्हें मानव जाति ने दी, सब कुछ वह भलीभांति पहचानती है।

इसे तो उसके बाबा ने फादर जोजफ को भेंट किया था, वह यहां कैसे आई? उसके विचारों की कड़ियां इस प्रकार उलझती जा रही थीं कि वह किसी भी एक बात का गहराई से अर्थ नहीं निकाल सकी। आख़िर यह पहेली क्या है? अचानक अगली मूर्ति के चरणों में रखी चकाचौंध ने उसकी दृष्टि अपनी ओर खींच ली तो उसके पग थोड़ा और आगे बढ़ गए। एक मूर्ति के चरणों में अगणित गहने बिखरे पड़े थे। शमा किनारे रखकर उसने झट से उठा लिए। चांदी के गहने? माथे का मुकुट, कानों के बड़े-बड़े झुमके, गले का हार, कंगन, कुछेक छल्ले, करधनी, पायल‒एक ही दृष्टि में वह उन्हें पहचान गई। यह तो उसकी सुंदरता के अंग थे, उसके यौवन के चार चांद थे। आज से लगभग बाईस बरस पहले जब हाथों में मेहंदी और आंखों में कजरा लगाकर उसने इन गहनों को पहना था तो सभी जवान तथा बूढ़ी औरतें उसे देखने को टूट पड़ी थीं।

गांव के नवयुवक भोला के भाग्य पर डाह कर बैठे थे। तब इन गहनों की चमक इतनी मद्धिम नहीं थी, फिर भी उसकी सुंदरता के सामने इनकी चकाचौंध धीमी पड़ गई थी। सहसा उसे याद आया, इन गहनों में उसकी एक अंगूठी नहीं है‒वह अंगूठी, जिस पर राधा लिखा हुआ था। वह सिसक पड़ी। सिसकते हुए इन गहनों को चूम लिया। फूट-फूटकर रो पड़ी। रोते हुए इन गहनों को उसने अपनी आंखों से लगा लिया, उसके आंसू इनकी चमक को धोकर ताज़ा करने का प्रयत्न करने लगे और वह देख रही थी‒ स्पष्ट…बाईस साल पहले का पृष्ठ जो उसके जीवन की पुस्तक पर लिखा हुआ था।

राजा विजयभान सिंह कह रहे हैं, ‘यह अंगूठी अब तभी मेरी अंगुली से उतरेगी जब तुम मुझे क्षमा कर दोगी और जब इसे वापस स्वीकार करके तुम अपनी अंगुली में पहन लोगी तो मैं समझूंगा कि तुम्हारे दिल में मेरे लिए प्यार का स्थान बन चुका है। बाएं हाथ की अंगुली में मैंने इसलिए पहन रखी है क्योंकि यह मेरा सीधा हाथ है, सारा काम मैं इसी हाथ से करता हूं, इसलिए इस अंगुठी को भी महत्त्व दे रहा हूं। तुम्हारे बाकी सभी गहने मेरे पास सुरक्षित हैं। मेरे लिए वे देवी की मूर्ति से भी अधिक पवित्र हैं।’

 देवी की मूर्ति! राधा की भीगी पलकें सामने की मूर्ति पर पड़ीं जिसके चरणों में ये गहने बिखरे पड़े थे। उसके दिल पर मानो किसी ने बरछियां चला दीं। आंखों पर विश्वास नहीं हुआ, वह मूर्ति, वह अधूरी मूर्ति जिसे बाबा पूर्णतया बना भी नहीं पाए थे तथा जिसे उस व्यापारी ने सबसे पहले ख़रीदा था, आज इस मंदिर में मूर्ति समान सम्मानित थी। उसका अपना ही तो प्रतिबिम्ब, अपनी ही तो कहानी छिपी है इसके अधूरे रूप में। उस मूर्ति को राधा ने झट से उठा लिया। देखा चारों ओर से, भलीभांति देखा और फिर अपना मस्तक इस पर दे मारा। रक्त की धारा फिर उसी जगह से निकल पड़ी, जहां लगभग बाईस वर्ष पहले एक घाव ने अपना चिह्न अब तक नहीं छोड़ा। अपने दिल को संतोष देने के लिए वह अब भी इस वास्तविकता पर विश्वास नहीं करना चाहती थी। विश्वास कर लेगी तो उसका दिल फट जाएगा। सांस अटक जाएगी। दम निकल जाएगा परंतु वह देख रही थी‒ सब कुछ फटी-फटी आंखों से, और विश्वास करना पड़ रहा था, एक ऐसी जीती-जागती वास्तविकता पर जिससे दिल इनकार नहीं कर सकता था।

उसका दिल फट रहा, सांस सचमुच अटक रही थी, परंतु उसका दम नहीं निकला। दिल पर अंगारे लोट रहे थे, शोले दहक रहे थे। यह कैसे हो सकता है? यह सब कैसे संभव है? इतना प्यार…इतना अधिक प्यार भी कोई किसी को करता है। इतना बड़ा तूफान उसके सिर पर से बीत गया और वह एक मछली के समान नदी की तह में बैठी कुछ भी नहीं जान सकी। उसकी हिचकियां बंध गईं। आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उसका मन कहता था, यह हवेली उसके अस्तित्व को अपनी शरण में छिपा ले।

अपने दिल को संतोष देने के लिए उसने प्रयत्न करके एक बार फिर सोचा कि यह असंभव है। ऐसा कभी नहीं हो सकता। कुछ पल ठहरकर उसने गहरी-गहरी सांसों के साथ पूरे रंगमहल का निरीक्षण किया, जहां-जहां भी शमा का प्रकाश पहुंच सकता था, धुंधल या स्पष्ट उसने सभी जगह अपनी दृष्टि वहीं से खड़े-खड़े दौड़ाई। हर तरफ़ ख़ामोशी थी‒सन्नाटा। वह केवल अपनी ही गहरी सांसों की आवाज़ सुन रही थी और दूसरा वहां कोई भी नहीं था, जिसकी उसे तलाश थी, तमन्ना थी और जिसके द्वारा वह इन सारी पहेलियों को बहुत आसानी के साथ सुलझा सकती थी।

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