स्वामी विवेकानंद धर्म की कट्टरता के खिलाफ थे। वे चाहते थे कि मनुष्य पूरी धरती को अपने प्रेम व करुणा के बल पर जीते। इस पृथ्वी को हिंसा के बल पर अपना नहीं बनाया जा सकता। धर्म का मुख्य उद्देश्य यही है कि यह मनुष्य के जीवन का कल्याण करे। यदि कोई धर्म ऐसा नहीं करता तो उसे धर्म नहीं माना जा सकता।
जो धर्म मनुष्य को सुखी करने की क्षमता रखता है। उसे ही इस समय के लिए उपयुक्त धर्म माना जा सकता है। हम धर्म को आने वाले जन्मों के लिए सुख देने का माध्यम नहीं मान सकते। धर्म वही है, जो इसी मुहूर्त में सुखी होना सिखाता है।

वे कहते थे कि सभी धर्मों में अच्छाईयां मौजूद हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह उन्हें पहचान कर अपने जीवन में स्थान दे। यदि कोई पूछता कि समाज को धर्म से क्या लाभ है तो वे उसे कहते कि समाज कभी अपने-आप में संपूर्ण नहीं होता । यह हमेशा विकास की अवस्था में रहता है और धर्म इसे विकसित होने में मदद करता है।

मनुष्य को स्वयं आगे बढ़ने का साहस करना चाहिए। यहां वे अपने गुरुदेव के वचन कहा करते-
तुम स्वयं अपने कमल के फूल को खिलने में सहायता क्यों नहीं देते ? भौंरे तब अपने-आप आएंगे।

