भारत में शुरू से ही यह मान्यता रही है कि काम वाला मनुष्य छोटा और काम न करने वाला मनुष्य बड़ा और भाग्यशाली होता है। इस प्रकार की तुच्छ मानसिकता से बाहर आये बिना समाज का कल्याण संभव नहीं है। इससे समाज में असंतोष, अलगाव और वैमनस्य उत्पन्न होता है। यह कैसे स्वीकार किया जा सकता है कि समाज का परिश्रमी और कामगार वर्ग पीड़ित, उपेक्षित और सभी प्रकार के अवसरों से वंचित रहे। ऐसी अवस्था में भारत वैश्विक मंच पर न तो सम्मान प्राप्त कर सकता है और न ही एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित हो सकता है।
