भारतीय समाज को उस बड़े वर्ग को साथ लेकर चलना होगा, जिसे सदियों तक प्रगति के अवसर प्राप्त नहीं हुए। स्वतंत्र भारत में इस प्रकार के सामाजिक भेद और असमानता को दूर करने के लिए ही विद्वान संविधान निर्माताओं ने कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण जैसी व्यवस्था को स्वीकार किया था। नि:संदेह आरक्षण बहुसंख्यक जनसंख्या की निराशा से बेहतर है। यदि आरक्षण का प्रावधान नहीं होता, तो 85 प्रतिशत लोग निराश हो जाएंगे और यह निराशा आक्रोश में बदल सकती है। ऐसे समाज में जहां निराशा और आक्रोश जन्म ले ले, वहां लोकतंत्र को खतरा है। लोकतंत्र में 85 प्रतिशत लोगों के हितों उपेक्षा कभी नहीं की जा सकती। जिस देश में किसी भी समूह को अगर यह विश्वास हो जाए कि जब उनके साथ यहां न्याय होना संभव नहीं है, तो वे निराशा में गैरकानूनी कदम उठाते हैं। स्पष्ट है कि लोकतंत्र में नागरिकों को अवसरों की समानता प्राप्त होनी चाहिए। अमेरिका तथा यूरोप के अनेक देशों ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ अपने जन-बल को मानव संसाधन में परिवर्तन कर लिया।

विकसित देशों ने प्रत्येक मनुष्य को उपयोगी मानते हुए उसके लिए उसकी योग्यता, क्षमता और प्रवृत्ति के अनुकूल उसे कार्य और दायित्व प्रदान किया है। विकसित देशों की शिक्षा व्यवस्था ने इसमें सक्रिय भूमिका निभाई है। समाज ने भी इसमें अपनी सहभागिता दी है। अमेरिका ने लंबे समय तक असमानता के शिकार रहे अश्वेतों को जीवन के सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ने के अवसर प्रदान किए हैं। आज अमेरिका के विकास में अश्वेत समाज का बहुत बड़ा योगदान है। ओलंपिक खेलों में अमेरिका को हर बार अधिकतम पदक अश्वेत खिलाड़ी ही देते हैं। हालिवुड से लेकर अमेरिकी राजनीति तक प्रत्येक क्षेत्र में अश्वेतों ने देश के विकास में सक्रिय योगदान दिया है। अमेरिका में अफ्रीकन अमेरिकन के एफर्मेटिव एक्शन का लाभ नहीं मिलता, तो कान्डोलिजा राइस वहां की सेक्रेटरी ऑफ स्टेट नहीं हो पाती।

भारत में हम ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं कर सके हैं। आरक्षण की व्यवस्था लागू होने के बाद भी देश में बहुत रचनात्मक परिवर्तन नहीं आ सका है। सामाजिक समरसता लागू करने के लिए हमें अपने आचरण को बदलना होगा। केवल प्रतीकात्मक प्रयासों से समाज में कुछ विशेष बदलने वाला नहीं है। जातिभेद भारतीय सामाजिक व्यवस्था का कैंसर है। यह कैंसर हजारों वर्ष पुराना है। यह इतनी आसानी से जाने वाला नहीं है। इसके लिए समाज की संपूर्ण सर्जरी की आवश्यकता होगी। इस शल्य क्रिया से गुजरे बिना भारतीय समाज बदलने वाला नहीं है। यह सर्जरी सफल हो सके, इसके लिए संपूर्ण देश में एक निर्णायक अलख जगाने और जातिभेद के विरूद्घ अंतिम युद्घ छेड़ने की आवश्यकता है।

यह दु:खद विषय है कि इस आंदोलन को गति देने की जिम्मेदारी जिन धर्माचार्यों, मठों, धार्मिक संस्थाओं और समाज की है, वह प्राय: सुस्त अथवा मौन दिखाई पड़ता है। अनेक प्रयासों और विकास प्रक्रियाओं के बावजूद यदि भारतीय समाज अंदर और बाहर से स्वस्थ नहीं हो पा रहा है, तो इसका कारण यह विकराल जाति-भेद और सामाजिक असमानतारूपी पुराना कैंसर ही है। यह कैंसर इससे पहले कि इस राष्ट रूपी शरीर को गलाकर नष्ट कर दे, हमें इस कैंसर को ही नष्ट करना होगा।

हम हजारों वर्षों से जातिवाद रूपी कैंसर से पीड़ित और प्रताड़ित है। इस कैंसर ने भारत को कभी भी स्वस्थ और सम्मानजनक जीवनयोग्य नहीं रहने दिया है। अब हमारे पास और अधिक समय और अवसर शेष नहीं है। संपूर्ण भारत के à¤°à¤¾à¤·à¥à¤Ÿà¥à¤°à¥€à¤¯à¤¤à¤¾ à¤•ी एक ही पहचान और सम्मान से युक्त करने की आवश्यकता है। भारतीय नागरिकों की केवल एक ही पहचान होनी चाहिए। यह पहचान एकमात्र à¤°à¤¾à¤·à¥à¤Ÿà¥à¤°à¥€à¤¯à¤¤à¤¾ à¤ªà¤° अधारित होनी चाहिए, न कि किसी प्रकार के जाति और धर्म के संकीण आधार पर।

यह भी पढ़ें –हस्तरेखा और आपकी समृद्घि