India’s unnamed railway station with blank yellow board
A station without identity challenges how we define place

Summary : इस स्टेशन की सबसे अहम और ख़ास बात

न उस पर स्टेशन का नाम लिखा है, न ही किसी दिशा की घोषणा। ट्रेनें यहाँ रुकती हैं, यात्री उतरते-चढ़ते हैं, सीटी बजती है, पर स्टेशन अपनी पहचान को लेकर चुप बना रहता है।

Unnamed Railway Station India: भारतीय रेल की विशाल और शोरभरी दुनिया में एक ऐसा भी स्टेशन है जहाँ सबसे अहम चीज़ नाम ही ग़ायब है। यह है रैनागढ़ रेलवे स्टेशन, जिसे लोग उसके नाम से नहीं, बल्कि उसकी अनाम पहचान से जानते हैं। यहाँ प्लेटफॉर्म पर खड़ा पीला बोर्ड आज भी कोरा है। न उस पर स्टेशन का नाम लिखा है, न ही किसी दिशा की घोषणा। ट्रेनें यहाँ रुकती हैं, यात्री उतरते-चढ़ते हैं, सीटी बजती है, पर स्टेशन अपनी पहचान को लेकर चुप बना रहता है। यह जगह किसी विस्मृति का परिणाम नहीं बल्कि व्यवस्था की उस दरार की तरह है जहाँ इतिहास, भूगोल और प्रशासन एक-दूसरे से नज़रें चुरा लेते हैं।

Nameless board speaks silence louder than written identity
Nameless board speaks silence louder than written identity

इस स्टेशन की सबसे बड़ी पहचान उसका खाली पीला बोर्ड है। भारतीय रेलवे में पीला बोर्ड आमतौर पर पहचान का प्रतीक होता है पर यहाँ वही बोर्ड चुप्पी का प्रतीक बन गया है। यह खालीपन किसी कमी से ज़्यादा एक सवाल है- क्या हर जगह का नाम होना ज़रूरी है, या कुछ स्थान सिर्फ़ मौजूद रहकर ही अपना अर्थ रच लेते हैं?

रैनागढ़ जैसे स्टेशन बताते हैं कि भारतीय रेल केवल बड़े जंक्शन और चमकदार टर्मिनल तक सीमित नहीं है। यह उन छोटे, अनदेखे ठहरावों का भी नेटवर्क है, जो गाँवों और कस्बों की धड़कन से जुड़े हैं। यहाँ रुकने वाली ट्रेनें अक्सर लोकल या पैसेंजर होती हैं, जिनके यात्री रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए रेल पर निर्भर रहते हैं।

Stories travel orally where stations refuse official names
Stories travel orally where stations refuse official names

इस स्टेशन को जानने का सबसे विश्वसनीय तरीका बोर्ड नहीं, लोग हैं। यात्री इसे पास के गाँव, नदी, या किसी पुराने ज़मींदार के नाम से पहचानते हैं। कोई कहता है “यहीं उतरना है, जहाँ बोर्ड खाली है।” नाम की जगह संकेत और अनुभव ने ले ली है। यह मौखिक पहचान आधुनिक मानचित्रों से ज़्यादा सजीव है।

कई जानकारों के अनुसार ऐसे स्टेशन या तो औपनिवेशिक दौर में अस्थायी रूप से बने, या फिर बाद में किसी प्रशासनिक अस्पष्टता में फँस गए। नाम तय होना, अधिसूचना जारी होना और बोर्ड लगना- यह सब काग़ज़ी प्रक्रियाएँ हैं। रैनागढ़ उन्हीं प्रक्रियाओं के बीच अटका हुआ प्रतीत होता है।

Existence thrives beyond labels names maps and recognition
Existence thrives beyond labels names maps and recognition

आज के दौर में, जब हर चीज़ ब्रांड और पहचान से तय होती है, यह स्टेशन एक प्रतिरोध जैसा लगता है। यह बताता है कि अस्तित्व के लिए हमेशा नाम ज़रूरी नहीं। यहाँ रुकने वाली हर ट्रेन, हर यात्री और हर सुबह-शाम का सन्नाटा इस स्टेशन को अर्थ देता है।

रैनागढ़ रेलवे स्टेशन किसी पर्यटन स्थल की तरह सजाया नहीं गया, न ही यह सोशल मीडिया पर मशहूर है। फिर भी इसका खाली पीला बोर्ड भारतीय रेल की कहानी का एक अनकहा अध्याय है। यह स्टेशन हमें याद दिलाता है कि भारत केवल नामों और नक्शों से नहीं बनता, बल्कि उन अनाम जगहों से भी बनता है, जो चुपचाप देश की गति को आगे बढ़ाती रहती हैं।

संजय शेफर्ड एक लेखक और घुमक्कड़ हैं, जिनका जन्म उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में हुआ। पढ़ाई-लिखाई दिल्ली और मुंबई में हुई। 2016 से परस्पर घूम और लिख रहे हैं। वर्तमान में स्वतंत्र रूप से लेखन एवं टोयटा, महेन्द्रा एडवेंचर और पर्यटन मंत्रालय...