दूल्हन-गृहलक्ष्मी की कविता
Dulhan

दूल्हन बैठी थी , घर के आँगन में
मेहंदी आलता और हाथी दांत का चूड़ा पहन के
बारात आयी थी दरवाजे पर, दो सो बारातियों को ले कर
दूल्हे राजा सज रहे थे, शेरवानी पहन कर के, गले मे गानी डाले हुए
घोड़ी पर बैठे थे, द्वार पर हुआ था, पिता का पिता से मिलन ,
भाई का भाई से मिलन हुआ था,
साखियों और बहनों ने मिल कर, रिबन कटवाया और नेक लिया था
दुल्हन बैठी थी, घर के आँगन में
 मेहंदी, आलता और हाथी दांत का चूड़ा पहन कर
हँसी ख़ुशी का समय था, सब चारचित सी बातें कर रहे थे
जोड़ी है कमाल की,सब अच्छा चल रहा था बाहर , अन्दर दुल्हन का बाप ,
सिर की पगड़ी, दुल्हे के बाप के पैरों में रखे था , यह नहीं पता चला देर तक
दुल्हन बैठी थी घर ऑगन में, मेहंदी आलता और हाथी दांत का चूडा पहन कर ,
रस्म थी फेरो की अन्दर से आवाज़ आयी मुन्ना फेरो पर मत बैठना
मुझ से पूछे बिना , ख़ुशियों को लग गया ग्रहण, सब चुपचाप हो गये
दुल्हन बैठी थी घर ऑगन में, मेहंदी,आलता और हाथी दांत का चूड़ा पहन कर ,
दोनों के भाई थे दोस्त अब गये अन्दर , अपने अपने पिता के पास ,
पता चला दहेज की रकम माँग रहा है दुल्हे का बाप ,कह रहे नगद या घर दो
दोनों भाईयो ने पगड़ी बाप की उठाई और दूल्हे दुल्हन का हाथ पकड कर फेरो की रस्म कराई
औलाद के आगे झुक गये अच्छे अच्छे,सब विदाई कराई लक्ष्मी गयी अपने घर में ,
छोड़ गए क़र्ज़ की रकम ,वापस कर दीजिए क़र्ज़ की रकम
दोनों भाईयो ने मिल कर कसम दिलाई आज के बाद किसी की पगड़ी नही उतरवाई जाएगी
क़र्ज़ वाली दुल्हन। ले कर नही जायेंगे