अनाड़ी जी, पति हमेशा पत्नी की हां में हां क्यों मिलाता है, इसकी वजह उसका डर है या पत्नी की खुशामद?
– मीरा यादव, कानपुर
पति हां में हां मिलाता है,
ना में ना भी मिलाता है।
पत्नी किसी बात को ना कर दे
तो उसकी क्या मजाल!
इस स्त्री-उत्थान युग में
अपनी चलाई तो जी का जंजाल।
अगर वह विग्रह नहीं चाहता
और मद में कामद है,
तो डर और खुशामद
उसकी स्वाभाविक आमद है।
अनाड़ी जी, कहते हैं जीवन बगिया महकेगी जितना हो प्यार, बतलाएं कि फिर क्यूं पर-स्त्री पर-पुरुष से प्यार पर बिठा देते हैं सब पहरा?
-कुनिका शर्मा, राजस्थान
यदि इस तरह से किया गया
प्यार का विस्तार,
तो होने लगेंगी
छोटी-छोटी सिविल वार।
एक बगिया महकेगी,
दूसरी दहकेगी।
एक बगीचा सींचेगा,
दूसरा तलवार खींचेगा।
अगर इसके लिए तैयार हो,
तो फिर दनादन प्यार हो।
कैसा बंधन मर्यादा कैसी,
पर समाज कर देगा ऐसी की तैसी।
क्योंकि वह जानता है कि
प्राय: प्यार नहीं रहता
एक जैसा ठहरा,
इसीलिए बिठा देता है पहरा।
अनाड़ी जी, सावन अपने साथ क्या-क्या लाता है?
अनीता, जम्मू
सावन अपने साथ लाता है
रिमझिम बरसात,
भीगे जज़्बात।
प्रेम के गीत,
जीवन संगीत।
झूलों की उमंगें,
उड़ानों की तरंगें।
कल्पनाओं के घोड़े
और गर्मागर्म पकौड़े।
अनाड़ी जी, इंतजार के पल काटना मुश्किल क्यों होता है?
तारादेवी, नई दिल्ली
गर्दन काटने के लिए तलवार है
जेब काटने के लिए ब्लेड की धार है
याचना काटने के लिए अस्वीकार है
दंभ काटने के लिए टंकार है
संबंध काटने के लिए तिरस्कार है
पेड़ काटने के लिए कुल्हाड़ी धारदार है
अरमान काटने के लिए फटकार है
अधिकार काटने के लिए सरकार है
माल काटने के लिए भ्रष्टाचार है
मेहनताना काटने के लिए बेगार है
मर्यादा काटने के लिए कुविचार है
दाम्पत्य काटने के लिए तकरार है
पर इंतज़ार के पल काटने के लिए
अब तक नहीं बना कोई औज़ार है।
अनाड़ी जी, सुना है आपका यह उपनाम अनाड़ी- आपकी पत्नी ने दिया है। चांद, जान, सूरज, फूल दे देती, यूं आपकी कमी जगजाहिर करने की क्या आवश्यकता थी?
कुसुम ढौंडियाल, नोएडा
‘चांद में सबको दिखनेवाला दाग है
‘जान को हमेशा खटराग है
‘सूरज में बेहद आग है
‘फूल में ज़रा सा पराग है
उन्हें ‘अनाड़ी ही ठीक लगा
क्योंकि उसमें अनंत और आज्ञाकारी दिमाग है।
मेकअप पर महिलाओं से ज्यादा खर्च आजकल पुरुष स्वयं पर कर रहे हैं। ऐसा क्यों अनाड़ी जी?
महारानी बेरी, फरीदाबाद
पहले बहुत गलत धारणा थी कि
सिर्फ पुरुष ही मोहित होता है,
धूलधूसरित
लेकिन शरीर से लोहित होता है।
कन्याएं मिट्टी की मनभावन मूरत होती हैं,
कामनाविहीन लेकिन खूबसूरत होती हैं।
मेकअप कराके दिखाई जाती हैं,
तभी तो वर-पक्ष की सहमति पाती हैं।
जाती हैं पराई दहलीज,
होती हैं सिर्फ दान की चीज़।
उसको यही सिखाते थे घर के तात,
कि प्यार होता है विवाह पश्चात।
दूल्हा कैसा भी हो ऐंचकताना,
उसे तो कन्या के साथ दहेज भी पाना।
जब से कन्याएं चाहने लगी हैं
मिस्ट परफैक्ट,
नहीं मिलता तो कर देती हैं रिजैक्ट।
तब से पुरुष भी स्वयं को निखारते हैं,
मेकअप करते हैं, संवारते हैं।
फेशल, ब्लीचिंग स्पेशल
पैडीक्योर, मैनीक्योर।
व्हाई नॉट, श्योर!!
