पुरूषों की तरह स्त्रियाें के मन में भी विवाह को लेकर कई सवाल और गलतफहमियां होती हैं । उनकी कुछ प्रमुख समस्याओं का समाधान कर रही हैं सब्बरवाल क्लीनिक, गोविदंपुरी की हेल्थ काउंसलर डाॅ. अनीता सब्बरवाल।
 
क्या स्त्रियों द्वारा हस्तमैथुन करना गलत या अप्राकृतिक होता है?
यह सच नहीं है। पुरूषों की तरह स्त्रियां या लड़कियां भी हस्तमैथुन द्वारा अपनी कामोत्तेजना शांत करती हैं। युवावस्था में शादी से पहले ऐसा होना स्वाभाविक है। बस पब्लिक में या दूसरों के सामने ऐसा नहीं किया जाए। यह एक नेचुरल प्रक्रिया है। 
पहली बार सेक्स के दौरान खुन निकलना ही स्त्री के कौमार्य को सिद्ध करता है?
यह कतई सच नहीं है। आजकल की लाइफस्टाइल में महिलाओं के हाइमन (योनि की झिल्ली) खेलकूद के समय या टैम्पून डालते समय या फिर किशोरवस्था के शुरूआती दिनों में किसी भी वजह से फट सकती है। अतः पहली बार सेक्स करते समय खून निकलना कौमार्य सिद्ध नहीं करता है।
 
योनि से सफेद चिपचिपा बदबूदार स्त्राव आना क्या किसी बीमारी का संकेत है?
स्त्राव होना एक सामान्य बात है, पर बदबू आने पर मतलब है यानिमार्ग में इंफेक्शन है। एक बार महिला डाॅक्टर का दिखाएं और नीचे के हिस्से में साफ-सफाई का ध्यान रखें।
 
विवाह पूर्व शारीरिक संबंध बन गए हों और साथ ही गर्भपात भी करवाया जा चुका हो तो क्या शरीर को देखकर यह समझा जाएगा कि विवाह पूर्व संबंध थे?
सबसे पहली बात तो यह कि विवाह पूर्व संबंध बनाने नहीं चाहिए और यदि किसी कारणवश बन भी गए हों तो गर्भपात कराना भी सही नहीं। ऐसा नही होना चाहिए। फिर भी यदि सामान्य तरीके से गर्भपात हुआ हो कोई सर्जरी अथवा कट नहीं आया हो तो पुरूष पता नहीं लगा पाएगा, क्योंकि स्त्री के शरीर की बनावट ऐसी होती है। कि कोई देख कर नहीं भांप सकता। वैसे आगे के लिए ध्यान रहे कि गर्भपात से कई खतरे हो सकते हैं जैसे इंफेक्शन होना, अनक्वालिफाइड डाक्टर द्वारा गर्भपात कराने से गर्भाश्य या ओवरीज को क्षति पहुंचना आदि।
 
स्तनों का एक बराबर न होना कुंठा का कारण होता है?
लड़कियां अक्सर अपने स्तनों के आकार व दोनों के बराबर न होने को लेकर परेशान रहती है। यह एक आम बात है। इसमें घबराने या परेशान होने की जरूरत नहीं।
 
क्या विवाह के आस पास आनेवाले पीरियड की डेट को आगे बढ़ाया जा सकता है या कम किया जा सकता है?
हां, ऐसा संभव है। इसके लिए हार्मोंस दिए जाते हैं पर इस नेचुरल प्रक्रिया को समय से होना ही ठीक है। फिर भी यदि जरूरी हो तो अपने चिकित्सक से मिलें जो बताए, वही दवा लें।
 
देर उम्र में शादी के बाद मां बनने में दिक्कत आती है?
तीस वर्ष की उम्र तक विवाह करने व गर्भधारण करने पर वैसे तो अधिक दिक्कतें आने की संभावना नहीं रहतीं, पर तीस वर्ष के बाद बच्चा प्लान करने पर उचित डाक्टरी देखरेख बहुत जरूरी है। गर्भावस्था के दौरान डाक्टरी सुपरविजन में ही पूरे समय रहना व डिलीवरी कराना उचित रहता है। 
 
सेक्स के बाद खुजली महसूस क्यों होती है?
यदि आपके पार्टनर कंडोम प्रयोग में लाते हैं तो हो सकता है उसकी चिकनाई से एलर्जी हो। अपने डाक्टर से बात करें।
 
पीरियड के दौरान सेक्स करना उचित है या नहीं?
पीरियड के दौरान सेक्स नहीं करना उचित है, क्योंकि पीरियड के समय गर्भाश्य और उसका मुंह काफी संवेदनशील होता है और ऐसी अवस्था में संभोग करने से पुरूष का लिंग स्त्री की योनि में प्रवेश कर गर्भाश्य के मुंह पर आघात करता है, जिससे गर्भाश्य के मंुह पर जख्म हो सकते हैं। इस घाव को सवाईकल इरोजन कहते हैं। इंफेक्शन होने पर इलाज न करने की स्थिति में कैंसर तक होने की संभावना रहती है। 
 
सेक्स के दौरान पुरूष वीर्य बाहर स्खलित होने पर गर्भवती होने से बचा जा सकता है?
ऐसा नहीं है, क्योंकि संबंध के दौरान लिंग से स्त्राव होता है, जिसमें शुक्राणु होते हैं। और ये अंडे से मिलकर गर्भवती बना सकते हैं। 
 
क्या बच्चा होने के बाद स्त्रियों को कष्टदायक सेक्स का सामना करना पड़ सकता है?
सभी महिलाओं को तो नहीं, पर कुछ महिलाओं को यह परेशानी हो जाती है कि उनको चरम सुख का अहसास ही नहीं हो पाता है, जो उनके लिए कष्टप्रद हो जाता है। लेकिन यह समस्या धीरे-धीरे स्वतः ही ठीक हो जाती है। इस समस्या की वैज्ञानिक वजह यह होती है कि इन दिनों उनका शरीर कम इस्ट््रोजन हार्मोन उत्पन्न करता है। यह हार्मोन पेल्विक एरिया में रक्त का दौरा बढ़ाकर काम भावना को उत्तेजित करने में सहायता करता है। 
 
स्तनपान कराने वाली महिलाओं में भी कष्ट प्रद सेक्स की समस्या उत्पन्न हो सकती है?
हां, स्तनपान भी चरम तक पहुंचने में अड़चने पैदा करता है क्योंकि दूध बनाने वाला प्रोलेक्टिन हार्मोन योनि में सूखापन पैदा करता है और शुष्कता के कारण सेक्स में आनंद नहीं आता है और स्त्री के लिए सेक्स कष्टप्रद हो जाता है। लेकिन यह समस्या बच्चे के जन्म के तीन माह के बाद स्वतः ही ठीक हो जाती है। इस दौरान स्त्री को वजाइनल क्रीम, दवाएं उपयोग में लाना चाहिए। इससे सेक्स हार्मोन सक्रिय होते हैं। 
  
 
स्त्री की योनि में पर्याप्त चिकनाई के न होेने पर सहवास पीड़ादायक हो जाता है। इस समस्या से निजात कैसे पाए स्त्री?
योनि में सूखापन का कारण गर्भ निरोधक गोलियों का सेवन हो सकता है। यदि किसी खास किस्म की गर्भरोधक गोलियां लेने से सूखापन महसूस हो रहा है तो दूसरे ब्रांड की गोलियां आजमाना चाहिए। इसके अलावा यदि स्त्री एंटी एलर्जिक दवाएं ले रही है तो याद रखें कि ऐसी दवाएं शरीर मे होने वाले विभिन्न प्रकार के स्त्रावों को रोकती हैं, जिसके कारण चिकनाई का अभाव हो जाता है। इन्हें डाक्टर की सलाह पर ही जरूरी हो तो स्त्री को लेना चाहिए। योनि के सूखेपन को कम करने के लिए वजाइनल जेल या क्रीम भी इस्तेमाल में लाया जा सकता है। 
 
योनि में सूखेपन की समस्या स्त्री के सहवास को पीड़ादायक ही नहीं बनाती बल्कि आॅर्गेज्म का अहसास भी नहीं होने देती है। क्या उम्र के अधिक हो जाने पर भी योनि शुष्क रहने लगती है?
योनि में सूखापन आने के अनेक कारण होते हैं। यह समस्या हार्मोनों में जल्दी-जल्दी आने वाले उतार-चढ़ावों के कारण भी हो जाती है। हां, उम्र बढ़ना भी सूखापन आने का कारण होता है। यह समय से पूर्व रजोनिवृत्ति होने का संकेत भी हो सकता है। लगभग 30 लाख महिलाओं को इस कारण से सेक्स में पीड़ा महसूस होती है। 
 
बढती उम्र की स्त्रियों कीयह शिकायत होती है कि पहले की तरह आॅर्गेज्म की अनुभूति नहीं होती है, जिससे उनका सेक्स जीवन बेमजा व कष्टप्रद हो गया है। क्या कारण है इसका?
 
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, हार्मोन का स्तर घटने लगता है और मांसपेशियों का लचीलापन कम हो जाता है, लेकिन चरम से पहले मांसपेशियों को बहुत तनाव देने की बजाए अपने मन और तन को तनावरहित करने की जरूरत है। 
 
स्त्रियों को मांसपेशियों पर बहुत तनाव नहीं देना चाहिए। जब वे रिलैक्स होकर सेक्स की पूर्णता तक पहुंचेगी तभी चरम को अच्छी तरह महसूस कर पाएंगी। सेक्स के पलों में न तो हड़बड़ी में स्त्रियां रहें और न ही तनाव में, तभी इसका आंनद उन्हें मिल पाएगा।
 
बहुत संवेदनशील अंगों में पुरूष का स्पर्श जब महिला में उत्तेजना पैदा न कर पाता है तब उसे बहुत ही तकलीफ और शर्मिंदगी महसूस होती है। आखिर ऐसा क्यों होता है?
स्त्री कामोत्तेजना के अहसास को न महसूस कर पाने से परेशान है तो उसे यह समस्या बहुत ही बड़ी दिखने लगती है। ऐसा औरत को तब ही महसूस होता है, जब पेल्विक एरिया में खून का बहाब तेज होने से संवेदनशील बढ़ जाती है। वास्तव में हार्मोन का स्तर कम होने के कारण यह सनसनी महसूस होेने में बाधा आती है। इसके अतिरिक्त यह समस्या तब भी आती है, जब इस बात की परवाह न हो कि पार्टनर क्या चाहती है, उसे क्या अच्छा लगता है, जिससे उत्तेजित होती हो। सेक्स में नयापन लाएं। कुछ प्रयोग करें।
 
स्त्री हरदम थकान से चूर रहती है और यौन-संबंधों के दौरान नींद आने की शिकायत करती है तो इसका मतलब जरूर कोई गड़बड़ है। भला वह गड़बड़ क्या हो सकती है?
अगर इस तरह की समस्या है तो स्त्री को टेस्टोस्टेराॅन थेरेपी के लिए डाॅक्टर से मिलना चाहिए क्योंकि सेक्स के समय नींद तभी आती है, जब टेस्टोस्टेराॅन का स्तर कम हो जाता है। स्त्रियों में यह हार्मोन सेक्स इच्छा जागृत करता है। स्त्री अपनी ओर से भी कोशिश करे। ऐसे में पुरूष का स्पर्श मूड में ला सकता है। स्त्री मन से सेक्स को नहीं निकालेगी तो इसका आनंद ले सकेगी और सेक्स के समय नींद भी नहीं आएगी।
 
क्या मोटी स्त्रियों का सेक्स जीवन कष्टप्रद होता है?
हां, मोटापा सेक्स में बाधक है। लेकिन यह आवश्यक भी नहीं है। अक्सर 40-45 की उम्र में वजन बढ़ता है। मोटापा सेक्स के लिए असुविधा जनक होता है। इसकी एक वजह हार्मोनांे में असंतुलन आना भी है। जिससे सेक्स के प्रति लगाव व इच्छा कम हो जाती है। चालीस-पैंतालीस की उम्र में महिलाओं में हार्मोलन असंतुलन आ जाता है। उनकी माहवारी में जाता है। उनकी माहवारी में अनियमितता आने लगती है, मोटापा आता है, सूखापन बढ़ता है और सेक्स में रूचि कम हो जाती है। यदि स्त्री उम्रदराज है और मोटी भी है तो उसका सेक्स जीवन उसके मौजूदा समाज पर निर्भर करता है। 
यदि उस समाज में एक निश्चित उम्र में सेक्स से दूर हो जाने की धारणा बनी हुई हैं तो इच्छा होने पर भी वह पार्टनर से तो कह नहीं पाती, पर यह कुंठा घर कर जाती है कि इस उम्र में इतने मोटापे के बावजूद यह इच्छा है, तो यह बुरी इच्छा है, मेरा मानसिक संतुलन ठीक नहीं है, मुझे पाठ-पूजा की ओर ध्यान देना चाहिए। महिलाएं समाज के रवैए के अनुसार अपनी मानसिकता बनाती है। सेक्स इच्छा सिर्फ मोटापे से ही नहीं, आहार की गड़बड़ी रोगों व खांसी-जुकाम तक से प्रभावित होती है। यदि स्त्री मोटी है और बाकी चीजें उसके पक्ष में हैं तो सेक्स जीवन भी प्रभावित नहीं होता है। यानी मोटापा कष्टप्रद सेक्स की दृष्टि से नहीं हो पाता है। स्त्रियां भले ही मोटी हों, पर रहें फिट तो उनका मोटापा प्लस प्वाइंट हो सकता है। कहने का आशय है कि शरीर को सक्रिय बनाए रखने वाली मोटी स्त्रियों का सेक्स जीवन कष्टमय नहीं हो पाता है। 
 
स्त्री-यौनागं पुरूष के यौनागं से भिन्न होता है और बनावट में भी अंतर होता है, फिर क्या पुरूष-यौनागं की तरह स्त्री-यौनागं संवेदनशील और उत्तेजना पूर्ण होता है?
स्त्री-यौनांग पुरूष -यौनागं से भिन्न ही नहीं होता है, बल्कि अधिक संवेदनशील और उत्तेजक भी होता है। पुरूष एक बार चरम सुख की अनुभूति करने के बाद दोबारा चरम सुख प्राप्त करने की स्थिति में नहीं होता है। जबकि स्त्री एक बार के सहवास में कई बार चरम सुख की अनुभूति कर सकती है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि स्त्री-यौनांग पुरूष-यौनांग से कहीं अधिक संवेदनशील और सेक्स के लिए उपयुक्त होता है। मंथली पीरियड्स, शिशु-जन्म, स्तन पान, गर्भधारण आदि बातें पुरूषों से बिल्कुल भिन्न हैं । पुरूष में ये शक्ति नहीं है। स्त्री-यौनांगों में भग, भगोष्ठ, योनि-द्वार, भगनासा, मूत्र छिद्र तथा योनि-छिद्र आदि सेक्स में विशेष रोल अदा करते हैं ।इनके अलावा योनि, गर्भाशय, अण्डवाहिनियां, अंडाशय, डिंब गंथियां आदि भी सेक्स के आनंद को बढ़ाकर दोगुना कर देते हैं स्त्री को महत्वपूर्ण यौनांग स्तन भी है, जो कुदरत का वरदान है। स्तन शिशु की भूख भी शांत करते हैं और पुरूष की कामोत्तेजना को भी बढ़ा कर शांत करते हैं। 
 
स्त्रियों के बाहरी यौनांग कौन-कौन से हैं और सहवास में वे किस तरह से स्त्री और पुरूष की मदद करते हैं,
भग-दो जांघों के बीच पेडू के नीचे भग होता है और यह दो भागों में बंटा हुआ होता है। युवावस्था में यहां बाल उग आते हैं और यह अंग पुरूषों के आकर्षण का केन्द्र होता है तथा उसे देखकर वह उत्तेजित हुए बिना नहीं रहता है। 
 
भगोष्ठ-भग को एक दरार दो भागों में बांद देती है और ये बंटे हुए भाग ही भगोष्ठ कहलाते हैं पेडू से लेकर गुदा के पास तक दिखाई देने वाले दोनों भगोष्ठों को वृहत् भगोष्ठ कहा जाता है। भगोष्ठ कुछ उठे हुए, मोटे और गुदगुदे होते हैं तथा आपस में सटे रहते हैं लेकिन विवाहित स्त्री के भगोष्ठ फैलकर कुछ चैड़े हो जाते हैं। इन भगोष्ठों के अंदर दो और भगोष्ठ होते हैं ।इन्हें लघु भगोष्ठ कहा जाता है। ये गुलाबी रंग के पतले तथा मुलायम होते हैं । योनि-द्वार पर ये भगोष्ठ सुरक्षा कवच का काम करते हैं तथा अंदर के नाजुक अंगों की रक्षा करते हैं। इन भगोष्ठों के नीचे दो छिद्र होते हैं । उपर वाला छिद्र मूत्र मार्ग होता है तथा आधा इंच नीचे दूसरा योनि-छिद्र होता है। 
भगनासा-भग के अंदर मूत्र-छिद्र से एक इंच उपर एक उभार-सा होता है, जिसे भगनासा कहा जाता है। भगनासा पुरूष शिश्न का अविकसित रूप है। इसमें शिश्न के समान खोखले कोष होते हैं तथा कामोत्तेजना की अवस्था में भगनासा फुलकर सख्त हो जाती है। 
बार्थीलीन ग्रंथियां-ये भगोष्ठों की तह में मटर के दाने के समान होती है। कामोत्तेजना होेने पर इनमें से एक चिकना-सा स्त्राव निकलता है, जो योनि नालिका को गीला करता है ताकि शिश्न आसानी से अंदर जा सके। यह स्त्राव शुक्राणुओं की भी रक्षा करता है। और शुक्राणु आसानी से गर्भाश्य तक पहुंच जाते हैं ।
 
स्त्रियों के सामने एक यह प्राॅब्लम होती है कि पुरूष उनकी पवित्रता को कौमार्य छिद्र से परखता है। यह कौमार्य छिद्र क्या है?
योनि-द्वार एक झिल्लीनुमा परदे से ढका होता है, इसके उपरी भाग में छेद होता है, जिससे मासिक स्त्राव बाहर आता है। प्रथम सहवास में यह परदा फटता है, जिससे रक्त स्त्राव होता है और स्त्री को दर्द भी होता है लेकिन ऐसा सभी स्त्रियों के साथ हो, यहा कोई जरूरी नहीं है। छोटी अवस्था में खेलने-कूदने, उछलने -दौड़ने, साइकलिंग या तैरने आदि से भी यह परदा फट सकता है, इसलिए कौमार्य छिद्र या पर्दा होना पवित्र होने का प्रमाण नहीं है। यह एक गलत धारणा है और पुरूषों को इस अंधविश्वास से उपर उठकर स्त्री पर इस तरह का दोषारोपण न कर उन्हें सस्नेह स्वीकार करना चाहिए।
 
स्त्री-योनि पुरूष के लिए एक पहेली से कम नहीं होती है। वह उसे बार-बार देखता ह,ै फिर भी उसकी बनाबट समझ नहीं पाता है। योनि सेक्स को सफल बनाने में कितनी सहायक है और शिश्न-मुंड के घर्षण से स्त्री को आनंद की प्राप्ति कैसे होती है,
योनि स्त्री का आतंरिक यौनांग है। योनि भग से गर्भाशय -मुख तक जाती है। मासिक स्त्राव इसी मार्ग से बाहर निकलता है ।शिशु भी इसी मार्ग से ही जन्म लेता है। योनि की दीवारें चिकनी और कोमल श्लेष्मा झिल्ली की होती हैं। जो स्त्राव छोड़ती हैं तथा योनि मार्ग को तर रखती हैं। इन विशेषताओं के कारण योनि में फैलने और सिकुड़ने की क्षमता होती है, जिससे उत्तेजित शिश्न प्रवेश कराने में न तो पुरूष को दिक्कत होती है और न ही स्त्री को कोई असुविधा होती है। स्त्री जब उत्तेजना महसूस करती है तब योनि बढ़ आती है। ताकि सहवास के क्षणों में कोई दिक्कत न हो। योनि की विशेषता है-उसका लचीलापन। प्रसव के समय योनि की दीवारें कई गुणा फैलकर बढ़ जाती है। जिससे बच्चा आसानी से बाहर आ जाता है। योनि में शिश्न जब प्रवेश करता है तब शिश्न-मुंड के घर्षण से ही स्त्री को आनंद मिलता है और योनि अपने मार्ग को तर रखकर शिश्न को अंदर-बाहर आने-जाने की क्रिया में सहायता करती है। 
 
गर्भाश्य क्या है और इसकी बनावट किस तरह की होती है। तथा इसका क्या महत्व है?
गर्भाशय स्त्री का भीतरी यौनागं है और सहवास के बाद जो सुखद घटना घटती है। वह गर्भाश्य में ही तो विकसित होती है। गर्भाश्य नाशपाती के आकार का 70 मि.मी. लंबा और 45 मि.मी. चैड़ा एक थैली के समान होता है। यह शरीर में मलाशय और मूत्राशय के बीच में होता है। गर्भ की वृद्धि के साथ-साथ गर्भाश्य का आकार भी बढ़ता रहता है। गर्भाश्य अत्यंत लचीले पेशी-तंतुओं से बना होता है। गर्भ की अवधि में गर्भाश्य फैलकर एक फुट तक हो जाता है। मासिक धर्म की शुरूआत यहीं से होती है। और गर्भस्थ शिशु नौ माह यहीं पर रहता है। सेक्स का अंतिम परिणाम गर्भाश्य में ही पोषित होता है, इसलिए यह नारी यौनांगों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। 
 
डिम्ब ग्रंथिया स्त्री को सबसे अधिक प्रभावित करती हैं और उसके शारीरिक विकास में सहायक भी होती हैं क्या यह सच है?
डिम्ब ग्रंथियों के बिना तो नारी शरीर का विकास ही संभव नहीं है। और मां बनना भी उसके लिए मुश्किल ही है। ये ग्रंथियों गर्भाश्य से बाहर की ओर कुछ दूरी पर स्थित होती हैं। इनका आकार बादाम के सामान होता है। डिम्ब ग्रंथियां अंडे पैदा करने के सामान होता है। डिम्ब  ग्रंथिया  अंडे पैदा करने के साथ-साथ हार्मोंस का भी उत्पादन करती है। ये हार्मोंस इस्ट््रोजन और प्रोजेस्टेरोन दो प्रकार के होते हैं। इस्ट््रोजन हार्मोंस प्रजनन अंगों को विकसित करता है, मासिक धर्म तथा स्त्रियोचित गुणांे को उत्पन्न करता है। इस हार्मोंस की कमी से ही स्त्रियोचित गुणों का विकास रूक जाता है। इसी तरह से प्रोजेस्टेरेन हार्मोन स्तनों में दूध लाता है। और डिम्ब को गर्भाशय में पहुंचने के बाद जो परिवर्तन होता है, उसे सामान्य अवस्था में लाने में मदद करता है।
 
स्त्री-यौनांग भगनासा क्या स्त्री का सबसे अधिक कामोत्तेजक अंग है?
हां, इसे एक तरह से बिजली का स्विच ही समझएि। सहवास से पहले भगनासा को सहलाने, दबाने, छूने या मलने से स्त्री कामातुर हो उठती है। वैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि भगनासा का स्पर्श करने से स्त्री बहुत जल्दी ही सेक्स के लिए तैयार हो जाती है। और सहलाने मात्र से ही भगनासा शिश्न की तरह सख्त और उत्तेजित हो जाता है। सहवास के क्षणों में पुरूष अगर भगनासा पर शिशन फिराता है या उससे घर्षण करता है तो स्त्री कम समय में ही चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाती है और वह सेक्स में पूर्ण संतुष्टि व तृप्ति की अनुभूति करती है। 
 
सेक्सजनित यौन रोगों को पुरूष भी और महिलाएं भी किसी से बताना नहीं चाहते और डाॅक्टर से दिखाने के लिए जल्दी तैयार नहीं होते। ऐसा करके क्या वे अपने साथी और खुद के प्रति अन्याय नहीं करते हैं?
 
सेक्सजनित यौन रोग संक्रामक होते हैं और छुआछुत से बड़ी तेजी से फैलते हैं । अगर स्त्री को पता चल जाए कि उसे यौन रोग है तो पुरूष पार्टनर को बताकर उसे इस रोग से रक्षा करनी चाहिए और साथ ही पर्याप्त उपचार भी शुरू कर देना चाहिए। आजकल सभी यौन रोगों का उचित इलाज है। यौन रोग को छुपाना नहीं चाहिए और पता चल जाने पर सेक्स से भी परहेज करना चाहिए।
सेक्सजनित रोगों को आम स्त्री-आम पहचानें कैसे?
पर-स्त्रीगमन या पर-पुरूषगमन करने वाले स्त्री-पुरूषों को ही सेक्सजनित यौनरोग होते हैं । जो स्त्री-पुरूष एक-दूसरे के प्रति वफादार और ईमानदार हैं, उन्हें यौन रोग बहुत कम ही होते हैं। फिर भी जानकारी के लिए बता दें -शिश्न या योनि में जख्म या छाले पड़ सकते हैं। शिश्न या योनि से मवाद निकल सकता है। मूत्र में जलन व दर्द हो सकता है । यानि व शिश्न में खुजली हो सकती है। इसके अलावा और भी बहुत से लक्षण होते हैं, जो शुरूआती दौर में नजर नहीं आते हैं। 
 
 
सिफलिस (उपदंश) एक खतरनाक यौन रोग है। स्त्री और पुरूष दोनों को ही यह रोग होता है। लेकिन यह किन स्त्री-पुरूषों को होता है? क्या इसका पर्याप्त इलाज संभव है?
 
सबसे पहली बात यह कि सिफलिस उन स्त्री-पुरूषों को होताहै, जो अपने पार्टनर के अलावा भी दूसरे से यौन संबंध बनाने में विश्वास करते हैं। पुरूष को यह रोग तब लगता है, जब वह सिफलिस से पीड़ित स्त्री से सहवास करता है और स्त्री को भी यह रोग तब ही होता है, जब वह सिफलिस से पीड़ित पुरूष से संभोग करती है।
पुरूष के पहले शिश्न पर एक हल्के रंग का दर्दरहित घाव होता है। वह तीन सप्ताह में ठीक हो जाता है। फिर डेढ़-दो माह के बाद त्वचा पर बड़े-बड़े भूरे रंग के उद्भेद निकल आते हैं। यह रोग वंशानुगत भी होता है। यह एक महा भयंकर संक्रामक रोग है, यह रोगी से दूसरे को हो जाता है। उचित इलाज से यह रोग पूरी तरह से ठीक हो जाता है।
 
स्त्रियों में यह रोग योनि द्वार के आस-पास होता है, जो तीन-चार सप्ताह तक रहता है। इसके बाद पूरे शरीर में इस रोग का आक्रमण हो जाता है। समलिंगी रोगियों में यह गुदा के किनारे पर होता है। सिफलिस का संक्रमण हड्डियों में भी पहुंच जाता है। और हड्डियों को विकृत कर देता है। यह रोग धीरे-धीरे पूरे शरीर को बीमार कर रोगी को मौत के मुंह तक पहुंचा देता है। इसका पता चलते ही फौरन इलाज शुरू हो जाना चाहिए।
 
यौन रोगों से ग्रसित व्यक्ति को एड्स होने की संभावना क्यों बढ़ जाती है?
यौन रोगों से ग्रसित स्त्री या पुरूष के जननांग में जख्म हो जाता है। अगर वे एड्स पीड़ित स्त्री या पुरूष से यौन संबंध बनाते हैं। तो आसानी से एड्स के विषाणु रक्त में पहुंच जाते हैं ।एड्स  के विषाणु रक्त में पहुंच जाते हैं। एड्स के विषाणु रक्त में पहंुच जाते हैं ।एड्स के विषाणु खून में आसानी से जख्म के माध्यम से फैल जाते हैं। इसलिए यौन रोग से पीड़ित व्यक्तियों को किसी से यौन-संबंध तब तक नहीं बनाना चाहिए जब तक वे स्वस्थ न हो जाएं। 
 
 
 
सूजाक भी क्या एक यौन रोग है तथा यह अन्य यौन रोगों की तरह ही संक्रामक है?
हां, सूजाक यानी गनोरिया एक संक्रामक रोग है तथा सूजाक पीड़ित स्त्री या पुरूष के साथ संभोग करने पर स्वस्थ व्यक्ति को हो जाता है। सहवास के तीसरे-पांचवे दिन (किसी न किसी को 2-3 सप्ताह के बाद) इस रोग के लक्षण प्रकट होते हैं। मूत्र का छेद लाल होकर सूज जाता है। मूत्र जलन व दर्द के साथ होता है। इसके 3-4 दिनों के बाद रोगी के कष्ट बढ़ जाते हैं । मूत्र रूक जाता है या जलन व दर्द के साथ मूत्र रक्त-मिश्रित आता है। रोगी के शिश्न में असहनीय दर्द होता है। यहां तक कि शिश्न में जरा-सा कपड़ा छू जाने पर भी रोगी तड़प उठता है। जांघों के जोड़ की ग्रंथियां सूज जाती हैं तथा बुखार भी हो जाता है। रोग के प्रारंभ में मामूली-सी खराश और खुजली मूत्र के छेद में होती है और मवाद-सा निकलता है, फिर धीरे-धीरे मूत्र मार्ग सूज जाता है। रात के समय रोगी का शिश्न खड़ा हो जाने पर उसको तड़प देने वाला दर्द होता है। 
इसके बाद यह रोग पूरे शरीर में फैल जाता है। इसका भी उपचार दवाओं से हो जाता है। रोगी कोउपचार कराने में जरा-सा भी विलंब नहीं करना चाहिए।
 
स्त्री या पुरूष के जननांग में किसी भी तरह के छाले, फफोले, खुजली या जख्म की शिकायत हो जाए, तो क्या यौन रोग माना जाएगा?
शिश्न या योनि में पड़ने वाले छाले अगर ठीक न हो रहे हों, खुजली होती हो और मूत्र मार्ग में पेशाब करते समय जलन व दर्द होता हो तो यह यौनजनित रोग हो सकता है। इसमें लापरवाही न बरतते हुए डाॅक्टर से तुरंत दिखा लेना ही बुद्धिमानी है।
 
यौन रोग का पता चल जाने पर सहवास से परहेज करना चाहिए?
यौनजनित जितने भी यौन रोग होते हैं, वे संक्रामक होते हैं पार्टनर से सेक्स संबंध बनाने पर उसे भी संक्रमण हो सकता है। यौन रोगों से पीड़ित व्यक्ति के अन्तर्वस्त्र, तौलिया, बिस्तर सब अलग कर देना बचाव की दृष्टि से अच्छा रहता है। इसके विषाणु स्वस्थ व्यक्ति को भी रोगी बना सकते हैं। 
 
क्या सेक्सजनित रोगों का इलाज साध्य है और इलाज के बाद व्यक्ति पूरी तरह से स्वस्थ हो जाता है?
हां, सभी यौन रोगों का पर्याप्त इलाज है। एड्स ही एक ऐसा रोग है, जिसका कोई उपचार नहीं है। और यह सहवास के अतिरिक्त संक्रमित रक्त, संक्रमित कोई हथियार आदि के स्वस्थ व्यक्ति के रक्त के संपर्क मे आने पर फैलता है। इसका उपचार बचाव ही है। 
 
कंडोम का प्रयोग सहवास के समय करने पर यौनजनित रोगाें से पूरी तरह से बचाव होता है?
हां, कंडोम यौन रोगों से व्यक्ति को सुरक्षित रखता है। इसके साथ ही दूसरा बचाव का उपाय है कि अपने पार्टनर से ही सेक्स संबंध बनाया जाए तथा मर्यादित सेक्स व्यवहार पर ही जोर दिया जाए। पर-पुरूष या पर -स्त्रीगमन से परहेज कर व्यक्ति आजीवन यौन रोगों से बचा रह सकता है। यौन रोग एक नहीं अनेक हैं, अनेक लोगों से यौन संबंध बनाने वालों को तरह-तरह की प्राॅब्लम्स होती ही रहती हैं। एक नारी ब्रह्चारी वाली उक्ति स्वयं पर लागू करें।
 
गर्भावस्था में सेक्स से परहेज कब करना चाहिए?
गर्भावस्था के दूसरे ट््इमेस्टर के अंत में व तीसरे ट््राइमेस्टर के प्रांरम्भ में सेक्स से बचना चाहिए। इस अवस्था में सेक्स करने से गर्भपात की आशंका बढ़ जाती है। 
 
कुछ स्त्री-पुरूषों को यह आशंका रहती है कि सेक्स से गर्भस्थ शिशु को हानि हो सकती है। क्या यह आशंका सही है?
 
गर्भावस्था में सेक्स करने से गर्भपात की आशंका विशेषतः पहले ट््राईमेस्टर में बनी रहती है। सेक्स का गर्भपात से कोई संबंध नहीं है। गर्भपात का कारण भ्रूण की जैनेटिक असामान्यता होती है। कुछ इंफेक्शन के कारण भी गर्भपात होता है, लेकिन यह सेक्स के कारण नहीं होता है। जहां तक सेक्स से बच्चे को हानि सवाल है तो यह निराधार है। क्योंकि सहवास के दौरान शिश्न का भू्रण से कोई शारीरिक संपर्क नहीं होता है। भू्रण तो थैली के अंदर रहता है, साथ ही सर्विक्स पर लगा हुआ सिर्वकल म्यूकस का प्लग बैक्टीरिया या शुक्राणहुओं को गर्भाशय के अंदर जाने से रोकता है। फिर भी दर्द से बचने के लिए शिशन को बहुत अंदर नहीं करना चाहिए।
 
गर्भावस्था में क्या स्त्री के मन में सेक्स को लेकर उत्तेजना और चाहत होती है या पुरूष ही अपनी उत्तेजना शांत करने के लिए सेक्स करता है?
गर्भावस्था के प्रारंभ में सेक्स के प्रति रूचि कम हो जाती है और यह स्त्री के स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा ही होता है लेकिन दूसरे ट््राइमेस्टर में सेक्स के प्रति स्त्री की रूचि में बदलाव आता है। उसके सेक्स अंगों व स्तनों में रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है, जिससे सेक्स के प्रति उसकी रूचि बढ़ जाती है और उसकी सामान्य रूचि बनी रहती है। जब तीसरा ट््राइमेस्टर शुरू हो जाता है। तब स्त्री की रूचि पुनः सेक्स के प्रति कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त स्त्री का पेट बहुत बड़ा हो जाता है, थकान व पीठ दर्द बढ़ जाात है, इसलिए सेक्स स्त्री के लिए कठिन भी हो जाता है। 
 
गर्भावस्था एक बहुत ही नाजुक व संवेदनशील अवस्था है। इस अवस्था में यौन व्यवहार कैसा होना चाहिए?
गर्भावस्था में सेक्स के लिए पहल तभी करनी चाहिए जब सब कुछ नाॅर्मल हो। सब कुछ नाॅर्मल होने पर भी पुरूष को चाहिए कि योनि में शिशन बहुत धीेरे से डाले और धक्का हल्का ही मारे। स्त्री-पेट पर कोई दबाव न डाले और उसे कोई असुविधा हो या योनि या पेडू में दर्द महसूस हो तो फौरन सहवास करना बंद कर दे। इस दौरान स्पर्श, चुम्बन,प्यार भरी बातें पुरूष करे तो स्त्री को मानसिक तृप्ति भी मिलती है और उसके गर्भस्थ शिशु पर अच्छा प्रभाव भी पड़ता है।
शिशु जन्म के कितने दिनों के बाद स्त्री सेक्स के लिए खुद को फिट महसूस करती है?
प्रसव किस तरह से हुआ यह इस बात पर निर्भर करता है। अगर आॅपरेशन से बच्चा हुआ है तब सहवास तभी हो सकता है जब घाव भर जाए और डाॅक्टर इसके लिए अनुमति दे दे। सामान्य प्रसव होेने पर स्त्री दो माह के बाद सेक्स की दृष्टि से खुद को फिट पाती है लेकिन समस्या यह है कि प्रसव के कुछ महीनों तक सेक्स आॅर्गन्स की सफाई का काम जारी रहता है। ब्लडिंग भी होती रहती है। प्रसव के बाद की प्राॅब्लम्स साॅल्व हो जाने के बाद ही सेक्स करना बेहतर रहता है। पहले की तरह स्तनों को मसलना भी प्रसव के बाद ठीक नहीं होता है क्योंकि वे दूध से भरे होते हैं। प्रसव के बाद का सेक्स व्यवहार बहुत ही संयमित और मर्यादित होना चाहिए, नहीं तो स्त्री का आनंद के बदले पीड़ा ही मिलती है। गर्भावस्था में और प्रसव के बाद पुरूष का आक्रामक रवैया महंगा साबित हो सकता है। इसलिए डाॅक्टर की सलाह से सेक्स संबंध बनाना उचित हो सकता है।