नन्ही गोगो कई बार परेशान होकर सोचती है, ‘ये परिंदे बेचारे प्यासे होते हैं तो इन्हें पानी कहाँ से मिलता है? भूख लगती है तो खाने को दाना मिल जाता होगा?’ गोगो ने मम्मी से पूछा, तो मम्मी समझ गईं उसके दिल की बात। बोलीं, “गोगो, तुम हर सुबह छत पर कबूतरों के लिए दाने डाल दिया करो। मिट्टी के सकोरे में उनके पीने के लिए पानी रख दिया करो।”
मम्मी ने अगले ही दिन कुम्हार के पास जाकर मिट्टी की एक छोटी-सी तश्तरी ले ली, साथ ही एक छोटा-सा सकोरा भी। गोगो रोजाना मिट्टी की तश्तरी में दाना डालती और सकोरा पानी से भरकर रख देती।
गोगो देखती कि सामने वाले पुरंग अंकल कबूतरों को दाना खिलाते हैं। उनकी छत पर बाँस का बना एक जाल भी है, जिस पर दाना चुगने के बाद कबूतर मजे में बैठ जाते हैं और प्यार से भरकर ‘गुटर-गूँ, गुटर-गूँ’ करना शुरू कर देते हैं।
नन्ही गोगो सोचने लगी, ‘पता नहीं, मेरे यहाँ आकर कबूतर दाना खाएँगे या नहीं?’ इसलिए उसने दाने से भरा कटोरा उठाकर जोर-जोर से पुकारना शुरू किया, “कबूतर आ-आ-आ…कबूतर आ-आ-आ!”
नन्ही गोगो को ‘कबूतर आ-आ’ की पुकार लगाते देख, पुरंग अंकल को इतना मजा आया कि उनकी लंबी-लंबी मूँछें फड़कने लगीं। हँसते हुए बोले, “ऐसे ही थोड़े आ जाएँगे कबूतर! बिटिया, ये तो मेरे पले हुए हैं, बरसों-बरस से यहीं रह रहे हैं।”
पर पुरंग अंकल यह देखकर हैरान रह गए कि अभी उनकी बात पूरी हुई भी न थी कि उनके जाल पर से उड़कर दो-तीन कबूतर गोगो की छत पर आ गए। गोगो ने झट अपने हाथ में पकड़ी हुई बाजरे के दानों से भरी तश्तरी नीचे रखी और दूर पत्थर की बेंच पर जाकर बैठ गई कि देखूँ ये कबूतर दाने चुगते हैं कि नहीं?
गोगो की खुशी का कोई ठिकाना न रहा, जब उसने देखा कि उन तीनों कबूतरों ने बड़े मजे से पहले थोड़ा पानी पिया, फिर दाना चुगने लगे।
अभी ये तीन कबूतर दाना चुग ही रहे थे कि देखते-देखते पाँच-सात कबूतर और आ गए। और फिर तो थोड़ी ही देर में कबूतरों का एक बड़ा झुंड गोगो की छत पर नजर आने लगा।
दूर पत्थर की बेंच पर बैठी गोगो मजे में तालियाँ बजा रही है। उसने घूमकर देखा, पुरंग अंकल के बाँस वाले जाल पर कबूतरों की संख्या अब आधी भी नहीं रह गई थी। देखते ही देखते पुरंग अंकल का चेहरा लटक गया। भला अपनी छत से जाते हुए कबूतरों को वे कैसे रोकें?
अब तो गोगो का रोजाना का ही यह नियम बन गया। वह मिट्टी की बड़ी-सी तश्तरी में ढेर सारे बाजरे के दाने रखती और सकोरे में पानी भरकर रखती। फिर उसी तरह पुकार लगाती, ‘कबूतर आ-आ-आ…कबूतर आ-आ-आ!’
गोगो की आवाज में न जाने कैसा जादू था कि पुरंग अंकल की छत से कबूतर उड़ते और देखते ही देखते गोगो की छत पर नजर आने लगते। वे बाजरे के दाने खाते, पानी पीते। इधर-उधर बैठकर मजे में गुटर-गूँ करते और फिर उड़ जाते।
पुरंग अंकल हैरान, कुछ-कुछ परेशान भी थे। वे रोजाना देखते कि उनके यहाँ से कबूतर ढेर सारा दाना रखने के बावजूद उड़कर गोगो के यहाँ चले जाते हैं। कोई घंटे भर के लिए उनकी छत एकदम सुनसान हो जाती है और गोगो की छत गूँजने और चहचहाने लगती है। अब तो कबूतर गोगो के चारों ओर घेरा बनाकर बैठ जाते थे। कुछ उसके कंधों पर भी बैठ जाते थे। मानो सारे के सारे कबूतर गोगो से बातें करना चाहते हों!
पुरंग अंकल अकेले अपनी छत पर टहलते हुए यह देखते रहते और कुढ़ते रहते।
फिर गोगो का स्कूल जाने का टाइम हो जाता। कबूतरों को ‘टा-टा’ करके वह छत से नीचे आती और नहा-धोकर स्कूल जाने की तैयारियों में लग जाती। इस पर कुछ कबूतर तो उड़कर वापस पुरंग अंकल की छत पर चले जाते। लेकिन बहुत-से कबूतर ऐसे थे कि जिन्हें गोगो से प्यार हो गया था। गोगो के जाने के बाद भी वे उसकी छत पर मँडराते और ‘गुटर-गूँ, गुटर-गूँ’ करते रहते।
गोगो को भी यह देखकर दुख होता था कि पुरंग अंकल तो बेचारे बिल्कुल अकेले रह गए। ये कबूतर उनके पास जाना ही नहीं चाहते। एक दिन कबूतरों को दाना चुगाने के बाद वह बोली, “पुरंग अंकल, आप ही बताइए, मैं क्या करूँ? ये कबूतर तो वापस जा ही नहीं रहे हैं।”
पुरंग अंकल हँसकर बोले, “बिटिया, जैसे तुम ‘कबूतर आ-आ-आ’ करती हो, वैसे ही ‘कबूतर जा-जा-जा’ भी कहा करो। तब शायद ये वापस मेरे पास आ जाएँ।”
नन्ही गोगो को बात जँच गई। जैसे ही कबूतरों का दाना खत्म हुआ, उसने खाली तश्तरी दिखाकर, हाथ हिलाते हुए सभी कबूतरों से कहा, “कबूतर जा-जा-जा…कबूतर जा-जा-जा!” और सचमुच नन्ही गोगो के जा-जा कहते ही सभी कबूतर उड़ते हुए पुरंग अंकल की छत पर जा पहुँचे और उनके बाँस के जाल पर जा बैठे।
यह देखकर पुरंग अंकल का कुम्हलाया चेहरा खिल गया। इस पर नन्ही गोगो को बड़ी हँसी आई।
उसे लगा, उसकी छत से पुरंग अंकल की छत पर उड़कर जाते हुए कबूतर भी धीरे-धीरे हँसते हुए गुटर-गूँ, गुटर-गूँ करते जा रहे हैं।
अब तो यह रोजाना का ही चक्कर चल गया। गोगो का यह मजेदार खेल था। शुरू में दाने से भरी हुई तश्तरी दिखाकर वह कबूतर आ-आ कहती और सारे कबूतर उसकी छत पर आ जाते और बाद में जा-जा कहती, तो सारे कबूतर पुरंग अंकल की छत पर जा बैठते।
फिर नन्ही गोगो बड़े मजे में तैयार होकर स्कूल की ओर चल देती।
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